तेरे खुशबू में बसे ख़त को मैं जलाता कैसे… ल‍िखने वाले रहबर

राजेंद्र नाथ रहबर उर्दू के प्रमुख शायरों में से एक हैं, रहबर साहिब को देश विदेश की सैंकड़ों संस्थानों द्वारा विभिन्न सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। वर्ष 2010 में पंजाब सरकार द्वारा रहबर साहिब को पंजाब का सर्वोच्च सम्मान शिरोमणि साहित्यकार सम्मान से नवाज़ा गया।

उनका जन्म 05 नवम्बर 1931 को पंजाब के शकरगढ़ में हुआ, जो विभाजन के बाद पाकिस्तान को मिल गया। तथा रहबर साहिब का परिवार पठानकोट आकर बस गया।

रहबर साहिब ने हिन्दू कॉलेज अमृतसर से बी.ए., खालसा कॉलेज पंजाब से एम.ए.(अर्थशास्त्र) और पंजाब यूनिवर्सिटी से एल.एल.बी की। बचपन में शायरी का शौक़ पल गया, बड़े भाई ईश्वरदत्त अंजुम भी शायर थे। रहबर साहिब ने शायरी का फन रतन पंडोरवी से सीखा।

रहबर साहिब की नज़्म तेरे खुशबू में बसे ख़त को विश्वव्यापी शोहरत मिली। इस नज़्म को जगजीत सिंह ने लगभग 30 सालों तक अपनी मखमली आवाज़ में गाया। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा रहबर साहिब को लिखे ख़त के लिए भी वो चर्चा में रहे। रहबर साहिब अपने जीवन के तकरीब 70 साल उर्दू साहित्य की सेवा में समर्पित किये हैं और अब भी निरंतर साहित्य सेवा में लगे हैं।

रहबर की पुस्तकें
कलश (1962)
मल्हार (1975)
और शाम ढल गई (1978)
जेबे-सुख़न (1997)
तेरे खुशबू में बसे ख़त (2003)
याद आऊंगा (2006)
उर्दू नज़्म में पंजाब का हिस्सा (2017)
तेरे खुशबू में बसे ख़त (2017) (द्वितीय संस्करण)

उनकी प्रस‍िद्ध गजलें … सबसे पहले पूरी नज़्म तेरी खुश्बू में बसे खत…

प्यार की आख़िरी पूँजी भी लुटा आया हूँ

अपनी हस्ती को भी लगता है मिटा आया हूँ

उम्र-भर की जो कमाई थी गँवा आया हूँ

तेरे ख़त आज मैं गँगा में बहा आया हूँ

आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ

तू ने लिख्खा था जला दूँ मैं तिरी तहरीरें

तू ने चाहा था जला दूँ मैं तिरी तस्वीरें

सोच लीं मैं ने मगर और ही कुछ तदबीरें

तेरे ख़त आज मैं गँगा में बहा आया हूँ

आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ

तेरे ख़ुशबू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे

प्यार में डूबे हुए ख़त मैं जलाता कैसे

तेरे हाथों के लिखे ख़त मैं जलाता कैसे

तेरे ख़त आज मैं गँगा में बहा आया हूँ

आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ

जिन को दुनिया की निगाहों से छुपाए रक्खा

जिन को इक उम्र कलेजे से लगाए रक्खा

दीन जिन को जिन्हें ईमान बनाए रक्खा

जिन का हर लफ़्ज़ मुझे याद है पानी की तरह

याद थे मुझ को जो पैग़ाम-ए-ज़बानी की तरह

मुझ को प्यारे थे जो अनमोल निशानी की तरह

तू ने दुनिया की निगाहों से जो बच कर लिक्खे

साल-हा-साल मिरे नाम बराबर लिक्खे

कभी दिन में तो कभी रात को उठ कर लिक्खे

तेरे रूमाल तिरे ख़त तिरे छल्ले भी गए

तेरी तस्वीरें तिरे शोख़ लिफ़ाफ़े भी गए

एक युग ख़त्म हुआ युग के फ़साने भी गए

तेरे ख़त आज मैं गँगा में बहा आया हूँ

आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ

कितना बेचैन उन्हें लेने को गँगा-जल था

जो भी धारा था उन्हीं के लिए वो बेकल था

प्यार अपना भी तो गँगा की तरह निर्मल था

तेरे ख़त आज में गँगा में बहा आया हूँ

आग बहते हुए पानी में लगा आया हूँ ।

अन्य गजलें – (1)

क्या क्या सवाल मेरी नज़र पूछती रही
लेकिन वो आंख थी कि बराबर झुकी रही

मेले में ये निगाह तुझे ढूँढ़ती रही
हर महजबीं से तेरा पता पूछती रही

जाते हैं नामुराद तेरे आस्तां से हम
ऐ दोस्त फिर मिलेंगे अगर ज़िंदगी रही

आंखों में तेरे हुस्न के जल्वे बसे रहे
दिल में तेरे ख़याल की बस्ती बसी रही

इक हश्र था कि दिल में मुसलसल बरपा रहा
इक आग थी कि दिल में बराबर लगी रही

मैं था, किसी की याद थी, जामे-शराब था
ये वो निशस्त थी जो सहर तक जमी रही

शामे-विदा-ए-दोस्त का आलम न पूछिये
दिल रो रहा था लब पे हंसी खेलती रही

खुल कर मिला, न जाम ही उस ने कोई लिया
‘रहबर` मेरे ख़ुलूस में शायद कमी रही।

(2)
जिस्मो-जां घायल, परे-परवाज़ हैं टूटे हुये
हम हैं यारों एक पंछी डार से बिछुड़े हुये

आप अगर चाहें तो कुछ कांटे भी इस में डाल दें
मेरे दामन में पड़े हैं फूल मुरझाये हुये

आज उस को देख कर आंखें मुनव्वर हो गयीं
हो गई थी इक सदी जिस शख्स़ को देखे हुये

फिर नज़र आती है नालां मुझ से मेरी हर ख़ुशी
सामने से फिर कोई गुज़रा है मुंह फेरे हुये

तुम अगर छू लो तबस्सुम-रेज़ होंटों से इसे
देर ही लगती है क्या कांटे को गुल होते हुये

वस्ल की शब क्या गिरी माला तुम्हारी टूट कर
जिस क़दर मोती थे वो सब अर्श के तारे हुये

क्या जचे ‘रहबर` ग़ज़ल-गोई किसी की अब हमें
हम ने उन आंखों को देखा है ग़ज़ल कहते हुये।

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