विश्व की महान संस्कृति का ध्वजवाहक है हिन्‍दू नववर्ष

जैसा आप सभी जानते हैं वैदिक धर्म संसार का एकमात्र सबसे पुराना धर्म है जिसका साक्ष्य है ‘वेद’। वेद दुनिया की प्रथम पुस्तक ही नहीं बल्कि यह मानव सभ्यता का सबसे पुराना लिखित प्रथम दस्तावेज है । चैत्र मास सनातन वैदिक धर्म के संवत्सर का प्रथम मास है और इसका आरम्भ कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से ही होता है। इसके बाद चैत्र मास का शुक्ल पक्ष आरम्भ होता है और प्रतिपदा के दिन नवसंवत्सर मनाया जाता है।

अब सवाल उठता है कि जब चैत्र मास का प्रारम्भ कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से होता है तो नवसंवत्सर चैत्र मास के शुक्ल पक्ष वाली प्रतिपदा को क्यों ? इस सन्दर्भ में आप जैसा जानते हैं सभी मासों में दो पक्ष होते हैं यानि पहला कृष्ण पक्ष एवं दूसरा शुक्ल पक्ष । और आप यह भी जानते हैं कि कृष्ण पक्ष में अंधेरी रातें होती हैं और शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा की चांदनी से युक्त रातें होती हैं यानि कृष्ण पक्ष की उपमा रात्रि जबकि शुक्ल पक्ष की उपमा दोपहर । इसे हम ऐसे भी कह सकते हैं कि कृष्ण का अर्थ काला और शुक्ल का अर्थ स्वच्छ व उज्जवल । इसी सन्दर्भ में जैसा आप सभी ने पाया होगा कि हम अपने सभी मुख्य कार्य यथा बच्चों के नामकरण, मुण्डन संस्कार, वेदारम्भ, विवाह, उपनयन आदि संस्कार शुक्ल पक्ष में ही प्रायः किया करते हैं। चूँकि प्रभु ने अमैथुनी मानव सृष्टि में ऋषियों व मनुष्यों को जन्म सृष्टि के आरम्भ में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही दिया था और इसके साथ इसी दिन परमात्मा से हमारे चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा को एक-एक वेद का ज्ञान दिया था, इसलिये ही संवत्सर की गणना एवं नव संवत्सर पर उत्सव का आयोजन चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ही किया जाता है। इस प्रकार यह दिन कल्प, सृष्टि, युगादि का प्रारंभिक दिन है।

आपकी जानकारी के लिये बता दूँ कि विश्व की सभी काल गणनाओं में सबसे प्रमाणिक, ज्योतिष विज्ञान द्वारा निर्मित अनुसार सत्ययुग, जो युगों में प्रथम है , का प्रारम्भ भी इसी तिथि को हुआ था । इसके अलावा आधुनिक वैज्ञानिक भी सृष्टि की उत्पत्ति का समय पौने दो अरब वर्ष से अधिक मानते हैं। हमारे वेद के विद्वानों व ऋषियों को सृष्टि के आरम्भ से ही वर्ष, महीनों, पक्ष, सप्ताह एवं सात दिनों रविवार से शनिवार तक के नामों का ज्ञान था । इसी कारण उन्होंने संवत्सर का प्रचलन गणितीय और खगोलशास्त्रीय संगणना के अनुसार आरम्भ कर, काल गणना आरम्भ कर दी थी और आज तक इसी का यानि वर्ष, महीनों, पक्ष, सप्ताह एवं सात दिनों रविवार से शनिवार तक का अनुकरण समस्त संसार व मत-मतान्तरों द्वारा किया जा रहा है । इस कड़ी में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भारतीय कालगणना के प्रारंभ से लेकर आज तक सैकंड के सौवें भाग का भी अंतर नहीं आया है यानि आज भी जनमानस से जुड़ी हुई यही शास्त्रसम्मत कालगणना व्यवहारिकता की कसौटी पर खरी उतरी है । इसलिये ही हम सनातनी गर्व से इस दिन को राष्ट्रीय गौरवशाली परंपरा का प्रतीक मानते है ।

यह सर्वविदित है कि पूरे विश्व में धर्मानुसार अलग-अलग दिन नव वर्ष मनाते हैं। अब यदि हम भारत की बात करें तो यहाँ भी अलग अलग राज्यों में नव वर्ष चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को नवसंवत्सर वहीं असम में इसे रोंगली बिहू, महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा, पंजाब में वैशाखी, जम्मू कश्मीर में नवरेह, आंध्र प्रदेश में उगादिनाम, केरल में विशु और सिंध में चेटीचंड कह कर बुलाते हैं।

आपकी जानकारी के लिये बता दूँ कि चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा वाले दिन अनेकों ऐसी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक व सामाजिक घटनाएं हुई हैं जिसके कारण इस दिन का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।आइये अब यहाँ आपके लिये इस दिन से सम्बन्धित कुछ सामाजिक एवं ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख कर देता हूँ —

1. ब्रह्मपुराण के अनुसार त्रिदेवों में से एक पितामह ब्रह्मा ने इसी दिन सूर्योदय से सृष्टिनिर्माण प्रारम्भ किया था, इसलिए यह सृष्टि का आरम्भ दिवस यानि भारतीय नववर्ष का पहला दिन चैत्र प्रतिपदा से भारतीय नव वर्ष प्रारंभ होता है ।

2. इसी तिथि को रेवती नक्षत्र में विष्कुम्भ योग में दिन के समय भगवान के आदि अवतार मत्स्य रूप का प्रादुर्भाव भी माना जाता है।

3. त्रेता युग में इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम ने बालि के अत्याचारी शासन से प्रजा को मुक्ति दिलाई थी और लंका विजय के बाद अयोध्या लौटने पर मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ ।

4. यह दिन ही वास्तव में असत्य पर सत्य की विजय दिलाने वाला है । द्वापर युग में इसी दिन महाराज युधिष्ठर का भी राज्याभिषेक हुआ और राजसूय यज्ञ के साथ युधिष्ठर संवत् प्रारम्भ हुआ ।

5. कलयुग में इसी दिन सम्राट विक्रमादित्य ने अपना राज्य स्थापित किया। इस दिन ही से इन्हीं के नाम पर विक्रमी संवत् का पहला दिन प्रारंभ होता है ।

6. माँ दुर्गा की साधना चैत्र नवरात्रि का प्रथम दिवस यानि शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात नवरात्री की भी शुरुआत इसी दिन से होती है ।

7. गुरुमुखी के रचनाकार सिखों के द्वितीय गुरू श्री अंगद देव जी का जन्म भी इसी दिन हुआ था ।
8. स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने इसी दिन आर्य समाज की स्थापना की एवं ‘कृणवंतो विश्वमआर्यम’ का संदेश दिया।

9. सिंध प्रान्त के प्रसिद्ध समाज रक्षक वरूणावतार भगवान झूलेलाल इसी दिन प्रगट हुए।

10. विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु यही दिन चुना।

11. वहीं सम्पूर्ण हिन्दू समाज को संगठित करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक, प्रखर देशभक्त डॉ केशवराव हेडगेवार जी का जन्म दिवस भी है ।

12. प्रभु राम के भी पूर्ववर्ती महान शिवभक्त श्री महर्षि गौतम का भी प्राकट्य दिवस है ।

13. हालाँकि वसंत ऋतु तो आ जाती है फाल्गुन में ही, पर पूरी तरह से व्यक्त होती है, चैत्र में क्योंकि सारी वनस्पति और सृष्टि प्रस्फुटित होती है इस महीने में । इसलिये इस माह का वैदिक नाम है – मधु मास ।

14. चैत्र माह में खेतों में हलचल देखने को मिलती है क्योंकि फसलों की कटाई चालू हो जाती है जिसके चलते नई फसल घर में आनी शुरू हो जाती है।

15. प्रकृति में उष्णता बढ्ने लगती है, जिससे पेड़-पौधे, जीव-जन्तु में नव जीवन आ जाता है।पेड़-पोधों में फूल, मंजर, कली इसी समय आना शुरू होते हैं, वातावरण मे एक नया उल्लास होता है जो मन को आह्लादित कर देता है।

16. गणगौर [ गण (शिव) तथा गौर (पार्वती) ] पर्व चैत्र माह में बड़े ही श्रध्दा से कुँवारी लड़कियों द्वारा मनपसंद वर पाने की कामना जबकि विवाहित महिलायें अपने लिए अखंड सौभाग्य,अपने पीहर और ससुराल की समृद्धि की कामना के लिये मनाती हैं । यह पर्व आस्था, प्रेम और पारिवारिक सौहार्द का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है।

आयुर्वेद के अनुसार इस दिन नीम की पत्तियाँ खाने का विशेष महत्व है, लिखा है

पारिभद्रस्य पत्राणि कोमलानि विशेषत:। सुपुष्पाणि समानीय चूर्णंकृत्वा विधानत: ।।
मरीचिं लवणं हिंगु जीरणेण संयुतम्। अजमोदयुतं कुत्वा भक्षयेद्रोगशान्तये ।।

अर्थात यदि आज के दिन हम नीम के कोमल पत्ते, पुष्प, काली मिर्च, नमक, हींग, जीरा मिश्री और अजवाइन मिलाकर चूर्ण बनाकर सेवन करते हैं तो संपूर्ण वर्ष रोग से मुक्त रहते हैं।इस प्रकार उपरोक्त वर्णित सभी तथ्यों से यह स्पष्ट है कि सही मायने में / वास्तव में ये वर्ष का सबसे श्रेष्ठ दिवस है। इसलिये ही चैत्र प्रतिपदा का यह प्रथम दिन अनेक मायनों में महत्वपूर्ण है।

ज्योतिर्विदों के अनुसार, दशकों बाद बन रहा है अजीब संयोग, 90 वर्ष में पड़ने वाला संवत्सर विलुप्त नाम का संवत्सर ‘आनंद’ का उच्चारण नहीं किया जाएगा। इसलिये इस बार 13 अप्रैल 2021 से शुरु होने वाला विक्रम सम्वत 2078 ‘राक्षस’ नाम से जाना जाएगा ।

उपरोक्त वर्णित तथ्यों से स्पष्ट है कि यह राष्ट्रीय स्वाभिमान और सांस्कृतिक धरोहर को बचाने वाला पुण्य दिवस है । इसलिये ऎसे हमारे सनातन एवं गौरवपूर्ण नववर्ष को हमें परस्पर अभिनन्दन और शुभकामना, मंगलकामना, नववर्ष मधुर मिलन आदि के साथ धूमधाम से मनाना चाहिये।

अन्त में आज नववर्ष के प्रथम दिवस वाले अवसर पर आप सभी प्रबुद्ध पाठकों को मैं अपने अंतर्हृदय से विपुल मंगलकामनायें देता हूँ ।

– गोवर्धन दास बिन्नाणी ‘राजा बाबू’,
जय नारायण ब्यास कालोनी,
बीकानेर.

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