हिंदू और हिंदुत्‍व: एक नेता ने कही… दूसरे नेता ने मानी… दोनों हैं ज्ञानी…बस इतनी ही है कहानी…बाकी सब बेमानी

पिछले दिनों अपनी पार्टी के ‘एक नेता’ की ‘किताब’ के समर्थन में ‘दूसरे नेता’ ने जुबानी जमा खर्च करते हुए ‘कुतर्क’ पेश किया कि हिंदू और हिंदुत्‍व यदि एक ही हैं तो इनके नाम अलग-अलग क्यों हैं।
पहली नजर के प्‍यार की तरह समझें तो इन ‘दूसरे नेताजी’ की बात विद्योत्तमा और कालीदास के बीच हुए कथित शास्‍त्रार्थ से उपजे ज्ञान सरीखी लगती है किंतु गहराई में झांकें तो साफ-साफ दिखाई देता है कि ये भी आलू से सोना निकालने की तकनीक सा कोई ऐसा कारनामा था जिसे स्‍क्रिप्‍ट राइटर की शह पर पार्टी के राष्‍ट्रीय ट्रेनिंग कैंप में कार्यकर्ताओं के समक्ष परोस दिया गया ताकि बात निकले तो दूर तक जाए और उसे कार्यकर्ता भी इसी ‘ज्ञानमार्ग’ पर आगे बढ़ा सकें क्योंकि एक ने कही… दूसरे ने मानी… दोनों ज्ञानी।
लेकिन परेशानी तब खड़ी हो गई जब कार्यकर्ताओं के इस कैंप में किसी नौसिखिए चाटुकार ने मंच की ओर कुछ गंभीर प्रश्‍न उछाल दिए।
प्रश्‍न कुछ यूं थे कि सर… हिंदू व हिंदुत्‍व की तरह यदि गांधी, नेहरू एवं वाड्रा भी अलग-अलग हैं तो फिर ये एक क्यों हैं? फिरोजी पीछे कैसे छूट गए, और क्या कोई फिरोजी अब तक शेष है?
नेहरू, गांधी कैसे हो गए…और वाड्रा अब तक गांधी कैसे बने हुए हैं?
बहुत कन्‍फ्यूजन है सर… कुछ स्‍पष्‍ट कीजिए…हिंदू और हिंदुत्‍व की तरह कुछ इन पर भी प्रकाश डालिए।
ये भी बताइए कि नेहरू कब विलुप्‍तप्राय हुए और देखते-देखते विलुप्‍त कैसे हो गए, उन्‍हें बचाने का कोई प्रयास किसी स्‍तर पर क्यों नहीं किया गया?
क्या इस देश में अब भी कोई नेहरू शेष है, और है तो वो कहां पाया जाता है?
भविष्‍य में वाड्रा बचेंगे या नहीं, और उन्‍हें संरक्षित करने का गांधियों द्वारा क्या कोई उपाय किया जा रहा है?
साथ ही सर ये भी बताइए कि पप्‍पू और मूर्ख अगर एक दूसरे के पर्यायवाची हैं तो इनके नाम अलग-अलग क्यों हैं, यदि ये अलग-अलग शब्‍द हैं तो इन्‍हें कब से तथा क्यों एक ही मान लिया गया?
गधे को वैशाखनंदन क्यों कहा जाता है और उसका ‘वैशाख’ से क्या ताल्‍लुक है?
चाटुकार की चपलता भांप नेताजी ने तत्‍काल प्रभाव से पाला बदला और कहने लगे, मैंने उपनिषद् भी पढ़े हैं इसलिए मुझसे तर्क मत कीजिए। यहां आप तर्क करने नहीं ‘कुतर्क’ सुनने के लिए लाए गए हैं।
चूंकि कार्यकर्ता नया-नया था और चाटुकारिता में पूरी तरह दक्ष नहीं हो सका था अत: उसकी जिज्ञासा इतने से शांत नहीं हुई।
उसने पिछले प्रश्‍नों का उत्तर न मिलने की झुंझलाहट में एक और प्रश्‍न दाग दिया। पूछ लिया- सर… सर… आपने तो उपनिषद् पढ़े ही हैं, तो इतना ही बता दीजिए कि क्या वो सिर्फ पढ़ने से समझ में आ जाते हैं?
क्या कोई भी किताब जिसे हम पढ़ते हों, वो समझ में आ जाती है, और आ जाती है तो बहुत से लोगों को पांच दशक तक पढ़ने के बावजूद ‘पॉलिटिकल साइंस’ समझ में क्यों नहीं आई?
नेता जी अब तक समझ चुके थे कि उनकी समझदानी में इतने सारे सवाल एकसाथ नहीं समा सकते। वो हिंदू और हिंदुत्‍व की किसी स्‍क्रिप्‍ट राइटर द्वारा मनगढ़ंत व्‍याख्‍या तो उछाल सकते हैं लेकिन उससे उपजे प्रश्‍नों को नहीं झेल सकते इसलिए उन्‍होंने डाइस पर साथ बैठे पूर्ण दक्ष चाटुकार के कान में कोई मंत्र फूंका।
फिर धीरे से शर्ट के ऊपर पहना हुआ जनेऊ ठीक किया और उठ खड़े हुए किसी ऐसे नए मुद्दे को हथियाने जिससे पार्टी के पेड़ की उस साख पर आरी चलाई जा सके जिससे अब तक लटक कर काम चला पा रहे हैं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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