मानो या ना मानो: आखिर भाजपाई भी बोले, “हमारा नेता कैसा हो… टीपू भैया जैसा हो”

कोई माने या ना माने लेकिन यह सोलह आना सही है कि आज ‘समाजवादियों’ और उनके ‘हमसफर’ दलों को छोड़कर सभी पार्टियों के नेता मन ही मन यह नारा जरूर लगा रहे होंगे कि “हमारा नेता कैसा हो… टीपू भैया जैसा हो”।
अगर बात करें खालिस विपक्षी पार्टियों की तो भाजपाई निश्‍चित ही बल्‍लियों उछल उछल कर अपने-अपने कुल देवताओं से मनौती भी मान चुके होंगे कि हर चुनाव में उनकी पार्टी के सामने टीपू भैया जैसा नेता ही मुक़ाबिल हो।
भाजपाइयों का अपने लिए ऐसी मनौती मानना बनता भी है। भला टीपू भैया जैसा कौन सा दूसरा नेता उन्‍हें मिलेगा जो सत्ताधारी दल को ‘लाल टोपी’ दिखा दिखाकर अपने ही उस एमएलसी के ठिकानों पर ‘रेड’ पड़वा दे जिस बेचारे ने चंद दिनों पहले समाजवादी बगिया में परफ्यूम छिड़क कर प्रदेशभर को महका दिया था।
पीयूष जैन भाजपाई है या सपाई, इसकी तो अभी जांच होना बाकी है लेकिन ‘पम्‍पी’ तो घोषित समाजवादी हैं। टीपू भैया के एमएलसी हैं, फिर उन्‍हें लेकर ऐसी ‘कालीदासाना’ हरकत करने के पीछे आखिर कौन सी राजनीति हो सकती है।
टीवी डिबेट में अक्‍सर ‘नमूदर’ होने वाले राजनीतिक विश्‍लेषकों की मानें तो टीपू भैया चुनावों के लिए बेशक अपना प्रमुख प्रतिद्वंदी भाजपा को मानते हों किंतु जब बात ‘बुद्धि’ के प्रदर्शन की आती हो तो वो अपने पुराने पार्टीबंध साथी ‘पप्‍पू’ से प्रतिस्‍पर्धा करना पसंद करते हैं।
यही कारण है कि उन्‍होंने यूपी में चुनावों से ठीक पहले यह साबित करने की पूरी कोशिश की है कि बल, बुद्धि और विद्या के मामले में ‘पप्‍पू’ पर ‘टीपू’ पहले भी भारी था, आज भी भारी है और शायद आगे भी रहेगा।
लाल टोपी उनके ‘बल’ का प्रतीक है तो ‘टोंटी’ की चोरी का खुला प्रदर्शन और अपने एमएलसी के यहां रेड डालने की चुनौती देना, ‘बुद्धि’ के क्षेत्र में उनके कालिदास होने का प्रत्‍यक्ष प्रमाण है।
‘विद्या’ के बाबत कुछ कहने सुनने की जरूरत स्‍वत: समाप्‍त हो जाती है क्‍यों कि ‘दोनों लड़के’ भले ही विदेशी डिग्री धारी हों किंतु एक ‘क्‍वालीफाइड’ है जबकि दूसरा एजुकेटेड। मतलब कि एक पढ़ा-लिखा होकर भी अशिक्षित सा लगता है और दूसरा आचार-व्‍यवहार में अशिक्षित जान पड़ता है किंतु मतलब में इतना चौकस है कि लगता है सारी डिग्रियां घोलकर पी चुका है।
एक प्रदेश की कमान संभाल चुका है और दूसरे ने अब तक किसी विभाग तक की कमान नहीं पकड़ी। एक से पार्टी की कमान नहीं संभली लिहाजा न चाहते हुए ‘अम्‍मी जान’ को संभालनी पड़ रही है और दूसरे ने ‘अब्‍बाजान’ को किनारे कर पार्टी की कमान छीन ली और अब भी कस कर पकड़े हुए है। चचाजान को ‘चाबी’ की जगह ‘स्‍टूल’ थमा कर परमानेंट वेट एंड वॉच’ की मुद्रा में बैठा दिया है।
दूर से देखो तो टीपू के ये रे कारनामे बहुत बुद्धि वाले लगते हैं लेकिन हैं बड़े आत्‍मघाती। पैरों पर कुल्‍हाड़ी मारने वाले। ठीक उस ‘कालीदास’ की तरह जो पेड़ की उसी डाल को काट रहा था, जिस पर बैठा था। ऐसा न होता तो वो अपनी ‘रारनीति’ के लिए उस पम्‍पी को मुश्‍किल में नहीं डालता जो न सिर्फ तन, मन धन से समाजवादी है बल्‍कि परफ्यूम के जरिए समाजवादी कुनबे को महकाने में लगा था।
तभी तो आज भाजपाई भी यह कहने पर मजबूर हैं कि “हमारा नेता कैसा हो… टीपू भैया जैसा हो”।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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