18 जुलाई को राजस्थान के झुंझुनूं में पैदा हुए थे गजल गायक मेहदी हसन

राजस्थान के झुंझुनूं जिले के लूणा गांव में 18 जुलाई 1927 को जन्मे मेहदी हसन का परिवार संगीतकारों का परिवार रहा है। मेहदी हसन के अनुसार कलावंत घराने में उनसे पहले की 15 पीढ़ियां भी संगीत से ही जुड़ी हुई थीं। संगीत की आरंभिक शिक्षा उन्होंने अपने पिता उस्ताद अजीम खान और चाचा उस्ताद ईस्माइल खान से ली। दोनों ही ध्रुपद के अच्छे जानकार थे। भारत-पाक बंटवारे के बाद उनका परिवार पाकिस्तान चला गया। वहां उन्होंने कुछ दिनों तक एक साइकिल दुकान में काम की और बाद में मोटर मेकैनिक का भी काम उन्होंने किया लेकिन संगीत को लेकर जो जुनून उनके मन में था, वह कम नहीं हुआ।
1950 का दौर उस्ताद बरकत अली, बेगम अख्तर, मुख्तार बेगम जैसों का था, जिसमें मेहदी हसन के लिये अपनी जगह बना पाना सरल नहीं था। एक गायक के तौर पर उन्हें पहली बार 1957 में रेडियो पाकिस्तान में बतौर ठुमरी गायक पहचान मिली। उसके बाद मेहदी हसन ने मुड़ कर नहीं देखा। फिर तो फिल्मी गीतों और गजलों की दुनिया में वो छा गये।
1957 से 1999 तक सक्रिय रहे मेहदी हसन ने गले के कैंसर के बाद पिछले 12 सालों से गाना लगभग छोड़ दिया था। उनकी अंतिम रिकार्डिंग 2010 में सरहदें नाम से आयी, जिसमें फ़रहत शहज़ाद की लिखी “तेरा मिलना बहुत अच्छा लगे है” की रिकार्डिंग उन्होंने 2009 में पाकिस्तान में की और उस ट्रेक को सुनकर 2010 में लता मंगेशकर ने अपनी रिकार्डिंग मुंबई में की। इस तरह यह युगल अलबम तैयार हुआ।
मेहदी हसन को गायकी के लिये दुनिया भर में कई सम्मान मिले। हजारों ग़ज़लें उन्होंने गाईं, जिनके हजारों अलबम दुनिया के अलग-अलग देशों में जारी हुये। पिछले 40 साल से भी अधिक समय से गूंजती शहंशाह-ए-ग़ज़ल की आवाज की विरासत अब बची हुई है।
मेहदी हसन ने आवाज़ की खनक से सरहद के सारे पुल पार किए। उन्होंने कई ग़ज़लकारों के कलामों को अपने सुरों से सजाकर नया आयाम दिया। स्वयं सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने उनके बारे में कहा कि ‘ऐसा लगता है कि मेहदी हसन के गले में भगवान बोलते हैं।’ पेश हैं उनकी गायी हुई कुछ मशहूर ग़ज़लों से ख़ास शेर-

अब के भी वो दूर रहे
अब के भी बरसात चली
– ख़ातिर ग़ज़नवी

क्या टूटा है अन्दर अन्दर, क्यूँ चेहरा कुम्हलाया है
तन्हा तन्हा रोने वालों, कौन तुम्हें याद आया?
– फ़रहत शहज़ाद

ज़रूर उसके तसव्वुर की राहत होगी
नशे में था तो मैं अपने ही घर गया कैसे
– कलीम चाँदपुरी

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ
– अहमद फ़राज़

देख तो दिल कि जाँ से उठता है
ये धुआँ सा कहाँ से उठता है
– मीर तक़ी मीर

मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है
सर-ए-आईना मिरा अक्स है पस-ए-आईना कोई और है
– सलीम कौसर

रफ़्ता रफ़्ता वो हमारे दिल के अरमाँ हो गए
पहले जाँ फिर जान-ए-जाँ फिर जान-ए-जानाँ हो गए
– अज्ञात

दुनिया किसी के प्यार में जन्नत से कम नहीं
इक दिलरुबा है दिल में जो हूरों से कम नहीं
– अज्ञात

हमसे तन्हाई के मारे नहीं देखे जाते
बिन तेरे चाँद-सितारे नहीं देखे जाते
– फ़रहत शहज़ाद

जब भी आती है तिरी याद कभी शाम के बाद
और बढ़ जाती है अफ़्सुर्दा-दिली शाम के बाद
– कृष्ण अदीब
-Legend News

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