गंगा दशहरा: ऋग्वेद के नदी सूक्त में सबसे पहले की गई गंगा की स्तुति

धार्मिक व ऐत‍िहास‍िक दृष्टि से लाखों हिंदू भक्तों को मोक्ष प्रदान करने वाली गंगा दुनिया का सबसे बड़ा तीर्थ है। आध्यात्मिक क्षेत्र में गीता का स्थान वही है जो धार्मिक क्षेत्र में गंगा का स्थान है। ‘गंगा’ के विषय में धर्मग्रंथों ने साथ-साथ ऋषि-मुनियों और साधु संतों द्वारा की गई स्तुति के साथ हिंदुओं के जीवन में गंगोदका के स्थान और गंगा जल के महत्व, प्रदूषण और उपचार के बारे में जानकारी दी गई है।

धर्मग्रंथों में वर्णन किया हुआ गंगा का महिमा अर्थात गंगा का महत्व-
*ऋग्वेद में प्रसिद्ध नदी सूक्त में सबसे पहले गंगा का आह्वान और स्तुति की गई हैं।

*पद्मपुराण में विष्णु सभी देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं और गंगा विष्णु का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसमें गंगा के महत्व का वर्णन किया गया है यदि पिता, पति, मित्र और संबंधी व्यभिचारी, भ्रष्ट, दुष्ट, चांडाल और गुरुघाती हो गए हैं, तो पुत्र, पत्नी, मित्र और रिश्तेदार क्रमशः उनका परित्याग कर देते हैं लेकिन गंगा उन्हें कभी नहीं छोड़ती।

*महाभारत में, ‘देवताओं के पास अमृत है, जैसे मनुष्य के पास गंगाजल (अमृत) है।’

*भगवद् गीता में कहा गया है कि भगवान कृष्ण ने अर्जुन को विभूति योग का पाठ करते हुए (अध्याय 10, श्लोक 31) कहा, ‘श्रोतसमास्मि जाह्नवी।’, यानी ‘मैं सभी धाराओं में गंगा हूं’।

गंगा सभी संप्रदायों के लिए वंदनीय है। भारत में सभी संतों, शिक्षकों और महापुरुषों के साथ-साथ सभी संप्रदायों ने गंगा जल की पवित्रता को मान्यता दी है। चूंकि शिव ने गंगा को मस्तक पर धारण किया है, शिव और वैष्णव इसे सबसे पवित्र मानते हैं क्योंकि गंगा की उत्पत्ति विष्णु के चरण कमलों से हुई थी। आदिशक्ति के रूप में गंगा की पूजा करते हैं।

महापुरुषों द्वारा गंगा स्तुति –

*वाल्मीकि ऋषि द्वारा रचित ‘गंगाष्टक’ ये प्रसिद्ध स्तोत्र है। भक्त स्नान करते समय इसका पाठ करते हैं।

*आदिशंकराचार्य ने गंगा स्तोत्र की रचना की। इसमें वे कहते हैं- वरमिह नीरे कमठो मीनः किं वा तीरे शरटः क्षीणः
अथवा श्वपचो मलिनो दीनस्तव न हि दूरे नृपतिकुलीनः ।। (श्लोक 11)
अर्थ: हे गंगा, इस जल में कछुआ या मछली होना अपने से दूर एक कुलीन राजा बनने, या अपने तट पर रहने वाला एक छोटा सरीसृप या एक गरीब चांडाल बनने से बेहतर है।

*गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी ‘कवितावली’ के उत्तरकांड में ‘श्रीगंगामहात्म्य’ का तीन श्लोकों में वर्णन किया है। इसमें मुख्य रूप से गंगादर्शन, गंगास्नान, गंगाजल सेवन आदि के महत्व का उल्लेख है।

*पंडित राज जगन्नाथ (1590 से 1665) ने ‘गंगालहारी’ (‘पीयूषलहारी’) नामक 52 छंदों की एक कविता लिखी। यह गंगा के विभिन्न गुणों का वर्णन करता है, और अपने स्वयं के उद्धार के लिए उत्साहपूर्वक प्रार्थना करता है।

हिंदू जीवन दर्शन में गंगोदक का स्थान –
दैनिक जीवन में गंगा सहित पवित्र नदियों को नित्य स्नान करते समय याद किया जाता है। चूंकि उनमें से अधिकांश के लिए गंगोदक में स्नान करना असंभव था, महाराष्ट्र में वे ‘गंगल’ नामक बर्तन में स्नान करते थे जो तांबे या पीतल से बना होता था और जिसका मुंह चौड़ा होता था।

धार्मिक जीवन में महत्व –
लाखों हिंदू अपने जीवन में कम से कम एक बार गंगा स्नान करना चाहते हैं।
तीर्थयात्री हरिद्वार, प्रयाग (इलाहाबाद) आदि तीर्थ स्थलों से गंगाजल को घर लाते हैं और उसकी पूजा करते हैं। वे रिश्तेदारों को बुलाकर तीर्थ देते हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार महत्व –
गंगा जल का उपयोग स्थान शुद्धि के लिए किया जाता है। नए खोदे गए कुएं में जल शुद्धि के लिए गंगा जल डाला जाता है। हाथ में गंगाजल लेकर शपथ लेते हैं। नवविवाहित जोड़ों पर भी गंगाजल का अभिषेक किया जाता है।

मृत्यु और मृत्यु के बाद की प्रक्रिया और महत्व –
मृत्यु के बाद सद्गती प्राप्त करने के लिए, मृत्यु के समय व्यक्ति के मुंह में गंगाजल डाला जाता है, ये संभव ना हो तो मृत्यु के बाद मृत व्यक्ति के मुंह में गंगाजल डाला जाता है इसलिए हर घर में गंगाजल रखा जाता है। (यदि नहीं हैं तो तुलसी के पानी का प्रयोग करते है।)

मृतदेह पर अग्नि संस्कार करना –

‘गंगा के तट पर जिस मृत व्यक्ति का दहन होता है वे मृत आत्मा स्वर्ग को जाते है ऐसे कहा जाता है इसलिए दूर-दूर से श्रद्धालु मृत लोगों को यहां दाह संस्कार के लिए लाते हैं।

अस्थि विसर्जन और गंगा का महत्व –
अस्थियों का गंगा में विसर्जन एक महत्वपूर्ण अंत्येष्टि संस्कार है। पद्मपुराण, नारदीय पुराण, स्कंद पुराण और अग्निपुराण के साथ-साथ महाभारत में भी कहा गया है कि जब तक गंगा में विसर्जित अस्थियां गंगा में रहती हैं तब तक मृत आत्मा स्वर्ग में निवास कर सकती है।

श्राद्ध कर्म में गंगा का महत्व –
पितरों की मुक्ति के लिए गंगातट पर श्राद्ध किया जाता है।

देवनदी गंगा की रक्षा करें –
भारत में सबसे महत्वपूर्ण नदियाँ गंगा और यमुना हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक ये सबसे ज्यादा प्रदूषित हैं। औद्योगिक प्रतिष्ठानों और उद्योगों द्वारा छोड़ा गया रासायनिक अपशिष्ट, धर्म के नाम पर लोगों द्वारा प्लास्टिक की थैलियों से फेंके गए अन्य अपशिष्ट और पूजा सामग्री गंगा नदी के प्रदूषण के दो मुख्य कारण हैं। 1985 से 2000 तक, भारत सरकार ने गंगा नदी को प्रदूषित करने के लिए कार्य योजना के तहत 1000 करोड़ रुपये खर्च किए। फिर भी भारत की सबसे पवित्र नदी गंगा अभी भी प्रदूषित है। योजना आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक अकेले गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए 7,000 करोड़ रुपये की जरूरत है।

गंगा को स्वच्छ रखना और उसका प्रवाह अक्षुण्ण रखना/अखंडित रखना, इसका आग्रह करना, यह हमारा मानवीय, सामाजिक, राष्ट्रीय और धार्मिक कर्तव्य है। गंगा नदी की आध्यात्मिक धरोहर जतन करने के लिए उसकी निर्मलता, प्रवाह और पवित्रता संभालना अनिवार्य हैl इस दृष्टि से कितने आंदोलन खड़े रहे परंतु आज भी इस में उदासीनता दिखाई देती है।

रामराज्य जैसे आदर्श राष्ट्र की स्थापना करना ही पवित्र गंगा नदी के रक्षण का मार्ग है। गंगा भक्तों के साथ सभी भारतीय गंगा रक्षण के लिए प्रयत्न करें और हिन्दू राष्ट्र के स्थापना के लिए कृतशील योगदान दें, यही गंगा देवी के चरणों में प्रार्थना है।

  • कु. कृतिका खत्री,
    सनातन संस्था, दिल्ली

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