अफ्रीकी जनजाति, जिसके लिए सब-कुछ आहार है

अफ्रीकी महाद्वीप पर कई प्रीहिस्टॉरिक जनजातियां रहती हैं जिनमें से एक है ‘बुशमैन’ जनजाति। यह करीब 20 हजार साल से दक्षिणी अफ्रीकी भूभाग नामीबिया, कालाहारी मरुस्थल, बोत्सवाना, जिंबॉब्वे और अंगोला में बेहद प्राचीन समय से रहती है।
पेशे से जियोफिजिसिस्ट रत्नेश पांडे ने इस जनजाति के बारे में बताते हैं कि यह आदिम जनजाति ‘बुशमैन’ स्वभाव से घुमंतु है। ये लोग लंगोटी पहनते हैं और अपने कंधों पर तीर-कमान लिए एक जगह से दूसरी जगह खाने की तलाश में घूमते रहते हैं। इस यात्रा के दौरान जब भी कोई जानवर इनका शिकार बन जाता है, तब ये लोग उसका मांस खाते हैं। बुशमैन लंबे समय तक एक स्थान पर नहीं रहते हैं। वे दिनभर शिकार की खोज में भटकते रहते हैं और शाम को रहने के लिए जगह चुनते हैं। बुशमैन न केवल जड़ों और फलों को खाते हैं बल्कि लगभग सब-कुछ खाते हैं जैसे टिड्डियां, दीमक, छिपकली, कैटरपिलर और मिलीपेड।
हर जानवर है आहार
इस प्रजाति के लोगों की संख्या करीब 10,000 है। बुशमैन की इतनी कम जनसंख्या के पीछे कारण ये है कि कई बार इनके साथ नृशंसता बरती गई और नरसंहार कर दिया गया। बुशमैन इतने भोले होते थे कि इनको हर जानवर अपना भोजन दिखाई देता था और ये जंगली या पालतू जानवरों में कोई अंतर नहीं कर पाते थे। जब किसी गैर-जनजाति की पालतू गायों का कोई झुंड भटककर बुशमैन के इलाके में चला आता था, तो ये उन गायों को अपना खाना समझकर उनका शिकार कर लेते थे। इसका बदला लेने के लिए बुशमैन लोगों की हत्या कर दी जाती थी। बुशमैन लोगों के समूह में परंपरागत रूप से 20 या कम सदस्य होते हैं। इनका प्रमुख काम आखेट और खाने की चीजें जुटाना है। ये लोग अपने बच्चों को हर शिकार में साथ रखते हैं ताकि बच्चों में डर खत्म हो सके। यहां के लोग आज भी पत्थरों से उपकरण और हथियार बनाते हैं।
छिपकली से लेकर भेड़ तक, सब है खाना
ये अपने शिकार को मारने के लिए तीर-कमान, कटार या कुल्हाड़ी का इस्तेमाल करते हैं। जिर्राफ, जेब्रा, खरगोश, एंटीलोप, बत्तख से लेकर ये मेंढक, छिपकली, मछली और कीड़े तक खाते हैं। पौधे की जड़ें, बेर और शहद इनके खाने का अहम हिस्‍सा होते हैं। यह जनजाति लंबे समय के लिए खाना जमा नहीं करती है क्योंकि कालाहारी की गर्मी के कारण खराब होने का डर बना रहता है। ये लोग रेगिस्तानी जमीन के नीचे उगने वाले पौधों की जड़ों और खरबूजों, यहां तक कि शुतुरमुर्ग के अंडे में पानी जमा कर लेते हैं। बुशमैन प्रजाति के लोग लंबी घास और शाखाओं से बनी झोपड़ियों में रहते हैं। कालाहारी रेगिस्तान में शेर, लकड़बग्घा, हिरण और कई तरीके जीव पाए जाते हैं। बुशमैन प्रजाति के लोग तीर-कमान और भाले से शिकार करते हैं। वे बड़े शिकार को जाल में फंसाने के लिए अलग-अलग तरीके काम में लेते हैं, जैसे शिकार को कीचड़-फंदे में फंसाकर, गड्ढों में गिराकर, जहरीला पानी पिलाकर। एक बुशमैन आधी भेड़ को एक बार में खा जाता है।
जानवरों की बोली से शिकार
बुशमैन जनजाति जहरीले तीर कमान, नुकीले डंडे, भाले, बरछा और अग्निदंड हथियारों का इस्तेमाल शिकार करने के लिए करते हैं। यहां तक कि तीरों के आगे के हिस्से पर शतुरमुर्ग और जिराफ के पैरों की हड्डियों को घिसकर बनाए गए नुकीले टुकड़े लगाते हैं। इससे लगभग 60 मीटर की दूरी पर स्थित शिकार को भी आसानी से मार गिराते हैं। शिकार को मारने के बाद बुशमैन उसे बांधने के लिए पेड़ की छाल से रस्से बनाते हैं। बुशमैन जनजाति में हर परिवार अपने खाने की व्यवस्था करता है। ये लोग आपस में संवाद के लिए ‘खिसान’ भाषा बोलते हैं। इस भाषा में बोलने के दौरान स्वर की जगह व्यंजन इस्तेमाल किए जाते हैं। ये लोग जानवरों की बोली की नकल भी कर लेते हैं। इनके आवाज देने पर जानवर जब जवाब देते हैं तो उनकी लोकेशन इन्हें पता चल जाती है। इससे उनका शिकार आसान हो जाता है।
अंडे से बनते हैं बर्तन, आभूषण
बुशमैन जनजाति के पास बर्तन बहुत कम होते हैं। वे पानी रखने के लिए शतुरमुर्ग के अंडे का इस्तेमाल करते हैं। यहां तक कि इस समुदाय की महिलाएं इसके अंडे से आभूषण तक बनाती हैं। ये लोग चीजों को इकट्ठा करने या लाने-लेजाने के लिए हिरण की खाल से थैली बनाते हैं। वे खाने के लिए प्याले और दूसरे बर्तन लकड़ी से बनाते हैं। ये चट्टानी गुफाओं में रहते हैं। कालाहारी रेगिस्तान में सबसे महत्वपूर्ण धन पानी होता है। अनुभवी लोग ऐसी जगहें जानते हैं, जहां पानी हो। वहां नवयुवक या तो कुएं खोदते हैं या पौधे के तनों की मदद से पानी निकालते हैं। हर बुशमैन जनजाति का एक गुप्त कुआं होता है, जिसे सावधानीपूर्वक पत्थरों से या रेत से ढका गया होता है। इनके समुदाय का कोई आधिकारिक मुखिया नहीं होता है। बुजुर्ग लोगों से ही राय ली जाती है। बुजुर्ग ही अपने अनुभव के आधार पर बीमारियों का इलाज भी करते हैं।
-एजेंसियां

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