Friends not Masters: आज ही लगा था पाकिस्तान के इतिहास का पहला मार्शल लॉ

पाकिस्तान के पहले राष्ट्रपति जनरल इसकंदर मिर्ज़ा के बारे में अयूब खान ने अपनी किताब Friends not Masters में लिखा सच,  

नई दिल्ली। अधिकतर विश्लेषक मानते हैं कि मार्शल लॉ लगाने का वो ‘अपरिहार्य’ फ़ैसला था जिसने देश पर ऐसी काली रात थोप दी जिसके काले साये साठ साल बाद भी पूरी तरह से नहीं छंट सके हैं.

Friends not Masters में लिखा पाकिस्तान के पहले राष्ट्रपति जनरल इसकंदर मिर्ज़ा के परदादा थे मीर जाफर
Friends not Masters में लिखा पाकिस्तान के पहले राष्ट्रपति जनरल इसकंदर मिर्ज़ा के परदादा थे मीर जाफर

पाकिस्तान के पहले राष्ट्रपति जनरल इसकंदर मिर्ज़ा के बारे में अयूब खान ने अपनी किताब Friends not Masters में लिखा कि-

“मैं पांच अक्तूबर को कराची पहुंचा और सीधा जनरल इसकंदर मिर्ज़ा से मिलने गया. वो लॉन में बैठे हुए थे. तल्ख़, फ़िक्रमंद और मायूस. मैंने पूछा- क्या आपने अच्छी तरह सोच-विचार कर लिया है?”

‘हां.’

‘क्या इसके सिवा कोई और चारा नहीं?’

‘नहीं. इसके सिवा कोई और चारा नहीं.’

‘मैंने सोचा कि कितनी बदक़िस्मती की बात है कि हालात ऐसे मोड़ तक पहुंच गए हैं कि ये सख़्त क़दम उठाना पड़ रहा है. लेकिन ये अपरिहार्य था. ये देश को बचाने की आख़िरी कोशिश थी.’

इस बातचीत के दो दिन बाद सात और आठ अक्तूबर की दरमियानी शाम पाकिस्तान के पहले राष्ट्रपति जनरल इसकंदर मिर्ज़ा ने संविधान को निलंबित कर दिया, असेंबली भंग कर दी और राजनीतिक पार्टियों को प्रतिबंधित करके पाकिस्तान के इतिहास का पहला मार्शल लॉ लगा दिया और उस वक़्त के सेना प्रमुख जनरल अयूब ख़ान को मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर बना दिया.

चूंकि पहली-पहली कोशिश थी, इसलिए पहले मार्शल लॉ में ‘मेरे प्यारे देशवासियों’ वगैरा जैसा कोई भाषण रेडियो पर (टीवी तो ख़ैर अभी आया ही नहीं था) नहीं दिया गया.

बस टाइपराइटर पर लिखा गया और एक फ़ैसला रात के साढ़े दस बजे साइक्लोस्टाइल कर अख़बारों के दफ़्तरों और दूतावासों को भेज दिया गया.

अलबत्ता ये ज़रूर हुआ कि चंद फ़ौजी दस्ते एहतियात के तौर पर रेडियो पाकिस्तान और टेलीग्राफ़ की इमारत को घेरे में लेने के लिए भेज दिए गए ताकि सनद रहे और ज़रूरत पर काम आ सकें.
अधिकतर विश्लेषक मानते हैं कि वो ‘अपरिहार्य’ फ़ैसला था जिसने देश पर ऐसी काली रात थोप दी जिसके काले साये साठ साल बाद भी पूरी तरह से नहीं छंट सके हैं.

‘चांद से लोग नहीं आएंगे’

इसकंदर मिर्ज़ा के लिखे हुए फ़ैसले की साइक्लोस्टाइल कॉपियां आने वाली नस्लों में बार-बार बंटती रहीं, बस किरदार बदलते रहे, कहानी वही पुरानी रही.

मिसाल के तौर पर देखें कि उस रात बांटे जाने वाले फ़ैसले में लिखा था-

‘मैं पिछले दो साल से गंभीर चिंता के हालात में देख रहा हूं कि देश में ताक़त की बेरहम रस्साकशी जारी है, भ्रष्टाचार और हमारी देशभक्त, सादी, मेहनती और ईमानदार जनता के शोषण का बाज़ार गरम है. रख-रखाव की कमी है और इस्लाम को सियासी मक़सद के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.’

राजनीतिक पार्टियों की मानसिकता इस हद तक गिर चुकी है कि मुझे यक़ीन नहीं रहा कि चुनाव से मौजूदा आंतरिक अराजकता के हालात बेहतर होंगे और हम ऐसी स्थिर सरकार बना सकेंगे जो आज हमारे सामने मौजूद बेशुमार और पेचीदा मसलों को हल कर सकेगी. हमारे लिए चांद से नए लोग नहीं आएंगे.’

‘यही लोग जिन्होंने पाकिस्तान को तबाही के मुहाने तक पहुंचा दिया ह,. अपने मक़सद हासिल करने के लिए चुनावों में धांधली से भी बाज़ नहीं आएंगे. ये लोग वापस आकर वही हथकंडे इस्तेमाल करेंगे जिन्हें इस्तेमाल करके इन्होंने लोकतंत्र का मज़ाक बनाकर रख दिया है.’

आपने देखा होगा कि बाद में आने वाले मार्शल लॉज़ में यही स्क्रिप्ट बदल-बदल कर इस्तेमाल होती रही.

‘लोकतंत्र को अंतरिक्ष रवाना कर दें’

इसकंदर मिर्ज़ा के मुताबिक लोकतंत्र मज़ाक़ बन कर रह गया है. लेकिन असल मज़ाक़ ये था कि जब ये मार्शल लॉ लगा, उसके तीन महीने बाद चुनाव तय थे. ऐसा लग रहा था कि उस वक़्त के प्रधानमंत्री मलिक फ़िरोज़ ख़ान का सत्ताधारी गठबंधन चुनाव जीत जाएगा और ये भी नज़र आ रहा था कि पार्टी के नेता शायद इसकंदर मिर्ज़ा को दोबारा देश का राष्ट्रपति न बनाएं.

तो राष्ट्रपति को भलाई इसी में दिखाई दी कि लोकतंत्र को ही रॉकेट में बिठा के अंतरिक्ष में रवाना कर दें.

बाहरी स्रोत भी इसका समर्थन करते हैं. मार्शल लॉ लगाए जाने से कुछ ही वक़्त पहले ब्रितानी हाई कमिश्नर सर एलेक्ज़ेंडर साइमन ने अपनी सरकार को जो ख़ुफ़िया जानकारी भेजी उस में दर्ज था कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने उन्हें बताया है कि अगर चुनाव के बाद सत्ता में आने वाली सरकार में नापसंदीदा लोग हुए तो वो इसका विरोध करेंगे.

सर एलेक्ज़ेंडर मिर्ज़ा ने इसी दस्तावेज़ में लिखा था कि नापसंदीदा लोगों का मतलब वो सांसद हैं जो इसकंदर मिर्ज़ा को दोबारा राष्ट्रपति बनाने के लिए वोट नहीं देंगे.

इसकंदर मिर्ज़ा को लोकतंत्र और संविधान का किस क़दर ख़याल था इसकी एक मिसाल उनके सेक्रेटरी क़ुदरतउल्ला शहाब की ज़बानी मिल जाती है.

शहाब अपनी आपबीती ‘शहाबनामा’ में लिखते हैं कि 22 सितंबर 1958 को पाकिस्तान के राष्ट्रपति इसकंदर मिर्ज़ा ने उन्हें बुलाया. उनके हाथ में पाकिस्तान के संविधान की एक कॉपी थी. उन्होंने उनसे किताब की ओर इशारा करते हुए कहा कि तुमने इस कचरे को पढ़ा है?

‘जिस संविधान की शपथ लेकर वो पाकिस्तान के राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठे थे उसके लिए ‘ट्रैश’ शब्द का इस्तेमाल सुन कर मेरा मुंह खुला का खुला रह गया.’

23 मार्च 1956 को लागू होने वाले जिस संविधान को मिर्ज़ा साहब ने कूड़ा क़रार दिया था वो संविधान पाकिस्तान की संसद ने उन्हीं के नेतृत्व में तैयार किया था. इस संविधान के तहत पाकिस्तान ग्रेट ब्रिटेन की डोमिनियन से निकल कर एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक देश की हैसियत से उभरा था और इसी संविधान ने पाकिस्तान को इस्लामी लोकतंत्र घोषित किया था.

लेकिन एक अड़चन ये थी कि इसी संविधान के तहत राष्ट्रपति के पद को प्रधानमंत्री के पद से बेहतर क़रार दिया गया था और इस में 58 (2 बी) क़िस्म की कुछ ऐसी बातें डाली गई थीं कि राष्ट्रपति प्रधानमंत्री को किसी भी वक़्त बस यूं ही निकाल बाहर कर सकते थे.

इसकंदर मिर्ज़ा ने शक़ की तलवार का वो इस्तेमाल किया कि उसके मुक़ाबले में 58 (2बी) कुंद छुरी दिखाई देती है.

उन्होंने जिन प्रधानमंत्रियों का शिकार किया ज़रा उनकी फ़ेहरिस्त देखें-

मोहम्मद अली बोगराः 17 अप्रैल से 12 अगस्त 1955. उनका इस्तीफ़ा संविधान लागू होने से पहले लिया गया था.

चौधरी मोहम्मद अलीः 12 अगस्त 1955 से 12 सितंबर 1956

हुसैन शहीद सोहरावर्दीः 12 अक्तूबर 1956 से 17 सितंबर 11957

इब्राहिम इस्माइल चुंद्रीगरः 17 अक्तूबर 1957 से 16 दिसंबर 1957

फ़िरोज़ ख़ान नूनः 16 दिसंबर 1957 से 7 अक्तूबर 1958

साज़िशों की झलक

पाकिस्तानी प्रधानमंत्रियों की इस म्यूज़िकल चेयर के बारे में भारतीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से जुड़ा ये क़िस्सा दोहराया जाता है कि ‘मैं तो इतनी जल्दी धोतियां भी नहीं बदलता जितनी जल्दी पाकिस्तान अपने प्रधानमंत्री बदल लेता है.’

इसकंदर मिर्ज़ा की ‘महलाती साज़िशों’ की एक झलक एक बार फिर शहाबनामा के पन्नों से देखें,

‘इसकंदर मिर्ज़ा को गवर्नर जनरल बने हुए तीन माह हुए थे कि शाम के पांच बजे मुझे घर पर मिस्टर सोहरावर्दी ने टेलीफ़ोन करके पूछा, प्रधानमंत्री के तौर पर मेरी शपथ के लिए कौन-सा दिन तय हुआ है?’

‘ये सवाल सुनकर मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ क्योंकि मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी. यही बात मैंने उन्हें बताई तो मिस्टर सोहरावर्दी ग़ुस्से से बोले, तुम किस तरह के निकम्मे सेक्रेट्री हो? फ़ैसला हो चुका है, अब सिर्फ़ विस्तृत विवरण का इंतज़ार है. फ़ौरन गवर्नर जनरल के पास जाओ और शपथ लेने की तारीख़ और समय पता करके मुझे ख़बर दो, मैं इंतज़ार करूंगा.’

‘मजबूरन मैं इसकंदर मिर्ज़ा साहब के पास गया. वो अपने चंद दोस्तों के साथ ब्रिज खेल रहे थे. मौका पाकर मैं उन्हें कमरे से बाहर ले गया और उन्हें मिस्टर सोहरावर्दी वाली बात बताई. ये सुन कर वो ख़ूब हंसे और अंदर जाकर अपने दोस्तों से बोले, तुमने कुछ सुना? सोहरावर्दी प्रधानमंत्री की शपथ लेने का वक़्त पूछ रहा है.’

‘इस पर सबने ताश के पत्ते ज़ोर-ज़ोर से मेज़ पर मारे और बड़े ऊंचे फ़रमाइशी क़हक़हे बुलंद किए. कुछ देर अच्छी ख़ासी हुड़दंग जारी रही. इसके बाद गवर्नर जनरल ने मुझे कहा, ‘मेरी तरफ़ से तुम्हें इजाज़त है कि तुम सोहरावर्दी को बता दो कि शपथग्रहण का वक़्त परसों के लिए तय हुआ है और चौधरी मोहम्मद अली प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे.’

‘वहां से मैं सीधा मिस्टर सोहरावर्दी के यहां पहुंचा और उनको ख़बर सुनाई. ऐसा दिखाई देता था कि उनके साथ कुछ वादे हो चुके थे. उस नए सूरत-ए-हाल पर वो बहुत झल्लाए और मेरे सामने उन्होंने बस इतना कहा- अच्छा फिर वही पड़ोस की साज़िश.’

लेकिन जैसा कि होता आया है, देश के राष्ट्रपति की ‘पड़ोस की साज़िशें’ ख़ुद उन्हीं पर भारी पड़ गईं. इसकंदर मिर्ज़ा ने न सिर्फ़ सिफ़ारिश करके जूनियर अफ़सर अयूब ख़ान को आर्मी चीफ़ बनवाया था बल्कि मार्शल लॉ से सिर्फ़ तीन महीने पहले उनके कार्यकाल को दो साल के लिए और बढ़ा दिया था.

उन्हीं अयूब ख़ान ने मार्शल लॉ के बीस दिन के अंदर-अंदर इसकंदर मिर्ज़ा को जहाज़ में लदवाकर, अंतरिक्ष में तो नहीं, पहले क्वेटा और फिर ब्रितानिया भेज दिया.

आपने देखा होगा कि ये स्क्रिप्ट भी पाकिस्तान में इतनी चली है कि घिस-पिट गई है. जो जिस आर्मी चीफ़ को लगाता है वही उसके क़दमों तले से क़ालीन खींच लेता है.

कौन थे ये इसकंदर मिर्ज़ा जिन्होंने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के पद को धोती बना कर रख दिया था?
इनकी तारीफ़ में सबसे पहले जो बात कही जाती है वो ये है कि इसकंदर मिर्ज़ा मीर जाफ़र के पड़पोते हैं. वही मीर जाफ़र जिन्होंने 1757 में प्लासी की लड़ाई में बंगाल के हुक्मरान सिराजुद्दोला की अंग्रेज़ों के हाथों हार में अहम किरदार अदा किया था और जिनके बारे में अल्लामा इक़बाल कह गए थे-

‘जफ़र अज़ बंगाल ओ सादिक़ अज़ दकन

नंग आदम, नंग दी, नंग वतन’

इन्हीं इसकंदर मिर्ज़ा के बेटे हुमायूं मिर्ज़ा ने एक किताब लिखी है, ‘फ्रॉम प्लासी टू पाकिस्तान’ जिसमें उन्होंने हैरतअंगेज़ तौर पर कुछ और ही कहानी बयान की है.

किताब के लेखक ने सिराजुद्दोला को बदमिज़ाज और बेरहम ठहराते हुए लॉर्ड क्लाइव के हाथों हार का ज़िम्मेदार ख़ुद उन्हें ही क़रार दिया तो दूसरी तरफ़ ये अजीबोग़रीब बात भी ढूंढी कि जिन लोगों ने सिराजुद्दोला को तख़्त पर बिठाया था (उनका मतलब अपने बुज़ुर्ग मीर जाफ़र से है) उन्हीं के साथ इस नौजवान हुक्मरान ने बेवफ़ाई की.

वो आगे चल कर लिखते हैं कि उस लड़ाई से तकरीबन ठीक 200 साल बाद बंगाल का इतिहास कराची में दोहराया गया और मीर जाफ़र के पड़पोते इसकंदर मिर्ज़ा ने जिस अय्यूब ख़ान को परवान चढ़ाया था, उसी ने अपने मोहसिन के सिर से ताज-ए-सदारत नोच लिया.

इसकंदर मिर्ज़ा भारतीय उपमहाद्वीप के ऐसे पहले सैन्य अफ़सर थे जिन्होंने ब्रितानिया के इंपीरियल मिलिट्री कॉलेज से प्रशिक्षण लिया था. लेकिन देश लौटने के बाद उन्होंने सिविल लाइन को तरजीह दी और नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रांत में पॉलिटकल अफ़सर भर्ती हो गए.

पाकिस्तान बनने के बाद लियाक़त अली ख़ान ने उन्हें देश का रक्षामंत्री बनाया. गवर्नर जनरल ग़ुलाम मोहम्मद ने ख़राब सेहत की वजह से इस्तीफ़ा दे दिया तो इसकंदर मिर्ज़ा उनकी जगह गवर्नर जनरल बन गए. इसके बाद जो कुछ भी हुआ वो पाकिस्तान के इतिहास का हिस्सा है.

इतिहास का हिस्सा ये भी है कि सात अक्तूबर को मार्शल लॉ लगाने के बाद इसकंदर मिर्ज़ा को जल्द ही एहसास हो गया कि संविधान को रद्द करके और संसद भंग करके उन्होंने वही डाल काट डाली है जिस पर वो बैठे थे.

इसकंदर मिर्ज़ा के सात अक्तूबर और 27 अक्तूबर के बीच के बीस दिन बड़े व्यस्त गुज़रे. इस दौरान पहले तो उन्होंने सेना के भीतर अय्यूब ख़ान के विरोधी धड़े को शह देकर पहले तो अय्यूब ख़ान का पत्ता साफ़ करने की कोशिश की. जब उसमें नाकामी हुई तो 24 अक्तूबर को अयूब ख़ान को चीफ़ मार्शल लॉ एडमिनिस्ट्रेटर के पद से हटा कर प्रधानमंत्री बना डाला.

लेकिन अयूब ख़ान को बराबर इसकंदर मिर्ज़ा की ‘महलाती साज़िशों’ की ख़बर मिलती रही. वो Friends not Masters में लिखते हैं,

‘हमें सूचना मिली कि उनकी बीवी (बेग़म नाहीद मिर्ज़ा) उनसे हर वक़्त लड़ती झगड़ती रहती हैं कि जब तुमने एक ग़लती कर ही दी है तो अब अयूब ख़ान का भी सफ़ाया कर दो.’

‘मैं उनके पास गया और कहा, आप चाहती क्या हैं? सुना है आप फ़ौजी अफ़सर की गिरफ़्तारी का हुक़्म देती फिर रही हैं?’

उन्होंने कहा, आपको ग़लत ख़बर मिली है.

‘मैंने कहा, देखिए ये अय्यारी और चालबाज़ी ख़त्म कीजिए. होशियार रहें, आप आग से खेल रहे हैं. हम सब आपकी वफ़ादारी का दम भरते हैं, फिर आप ऐसी शरारत क्यों कर रहे हैं?’

अयूब ख़ान ने भी भांप लिया था कि अगर संविधान ही नहीं है तो फिर राष्ट्रपति के पद का क्या मतलब है? संविधान की डाल ही नहीं रही तो उस पर राष्ट्रपति पद का घौंसला कैसे रहेगा?

27 अक्तूबर की रात जनरल बर्की, जनरल आज़म और जनरल ख़ालिद शेख़ इसकंदर मिर्ज़ा के घर पहुंच गए. नौकरों ने कहा कि साहब इस समय आराम कर रहे हैं, लेकिन जनरल इतनी आसानी से कहां टलते हैं. उन्होंने गाउन में ही राष्ट्रपति से पहले टाइप किए गए इस्तीफ़े पर दस्तख़त लिए और कहा कि अपना सामान उठा लें, आपको अभी इसी वक़्त राष्ट्रपति निवास से निकलना होगा.

इसकंदर मिर्ज़ा ने अपने ओहदे के बारे में कुछ बहस करने की कोशिश की, लेकिन बेग़म नाहीद एक फिर ज़्यादा समझदार साबित हुईं और उन्होंने सिर्फ़ इतना पूछा, मगर मेरी बिल्लियों का क्या होगा?

-बीबीसी

 

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