ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया…

‘ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया…’ जैसी मशहूर ग़ज़लों के अलावा भी बेगम अख़्तर की संगीतमय विरासत के कई पहलू हैं.
बेगम अख़्तर को ग़ज़ल की मलिका कहा जाता था और आज अगर वे होतीं तो 103 साल की होतीं.
तीस के दशक में बेगम अख़्तर ने कोलकाता में स्टेज पर पहली बार अपना गायन पेश किया था.
यह कार्यक्रम बिहार के भूकंप पीड़ितों की मदद के लिए आयोजित किया गया था. उस दिन उन्हें सुनने वालों में भारत कोकिला सरोजिनी नायडू भी थीं.
वह उनसे इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने स्टेज के पीछे आ कर उन्हें न सिर्फ़ बधाई दी बल्कि बाद में एक खादी की साड़ी भी उन्हें भेंट में भिजवाई.
पांच फ़ुट तीन इंच लंबी बेगम अख़्तर हाई हील की चप्पलें पहनने की भी शौक़ीन थीं. यहाँ तक कि वो घर में भी ऊँची एड़ी की चप्पलें पहना करती थीं.
घर पर उनकी पोशाक होती थी मर्दों का कुर्ता, लुंगी और उससे मैच करता हुआ दुपट्टा.
बेगम की शिष्या शांति हीरानंद कहती हैं कि रमज़ान में बेगम अख़्तर सिर्फ़ आठ या नौ रोज़े ही रख पाती थीं क्योंकि वो सिगरेट के बग़ैर नहीं रह सकती थीं.
इफ़्तार का समय होते ही वो खड़े-खड़े ही नमाज़ पढ़तीं, एक प्याला चाय पीतीं और तुरंत सिगरेट सुलगा लेतीं. दो सिगरेट पीने के बाद वो दोबारा आराम से बैठ कर नमाज़ पढ़तीं.
उनको नज़दीक से जानने वाले प्रोफ़ेसर सलीम क़िदवई बताते हैं कि एक बार उन्होंने उनसे पूछा था कि क्या तुम सिगरेट पीते हो. मैंने जवाब दिया था, ‘जी हाँ, लेकिन आपके सामने नहीं पीऊँगा.’
“एक बार वो मेरे वालिद को अस्पताल में देखने आईं. वो इंटेंसिव केयर यूनिट में भर्ती थे. वह इनके लिए फलों का बहुत बड़ा बास्केट भी लाईं. फलों के बीच में सिगरेट के चार पैकेट भी रखे हुए थे.”
“उन्होंने धीरे से मुझसे कहा, ‘फल तुम्हारे वालिद के लिए हैं और सिगरेट तुम्हारे लिए. अस्पताल में तुम्हें कहाँ पीने के लिए मिल रही होगी!’
अल्लाह मियाँ से लड़ाई
उनको खाना बनाने का भी ज़बरदस्त शौक़ था. बहुत कम लोग जानते हैं कि उनको लिहाफ़ में गांठें लगाने का हुनर भी आता था और तमाम लखनऊ से लोग गांठें लगवाने के लिए अपने लिहाफ़ उनके पास भेजा करते थे.
वो अक्सर कहा करती थीं कि ईश्वर से उनका निजी राबता है. जब उन्हें सनक सवार होती थी तो वो कई दिनों तक आस्तिकों की तरह कुरान पढ़तीं लेकिन कई बार ऐसा भी होता था कि वो कुरान शरीफ़ को एक तरफ़ रख देतीं.
जब उनकी शिष्या शांति हीरानंद उनसे पूछतीं, ‘अम्मी क्या हुआ?’ तो उनका जवाब होता, ‘लड़ाई है अल्लाह मियाँ से!’
एक बार वो एक संगीत सभा में भाग लेने मुंबई गईं. वहीं अचानक उन्होंने तय किया कि वो हज करने मक्का जाएंगी.
उन्होंने बस अपनी फ़ीस ली, टिकट ख़रीदा और वहीं से मक्का के लिए रवाना हो गईं. जब तक वो मदीना पहुंची उनके सारे पैसे ख़त्म हो चुके थे.
उन्होंने ज़मीन पर बैठ कर नात (हजरत मोहम्मद की शान में पढ़ा जाने वाला गीत) पढ़ना शुरू कर दिया. लोगों की भीड़ लग गई और लोगों को पता चल गया कि वो कौन हैं.
तुरंत स्थानीय रेडियो स्टेशन ने उन्हें आमंत्रित किया और रेडियो के लिए उनके नात को रिकॉर्ड किया.
बेगम अख़्तर का सॉफ़्ट कॉर्नर
कहा जाता है कि शायर जिगर बेगम अख़्तर के करीबी दोस्तों में थे.
बहुत कम लोगों को पता है कि उन्होंने सत्यजीत राय की फ़िल्म ‘जलसाघर’ में शास्त्रीय गायिका की भूमिका भी निभाई थी.
उर्दू के मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी से बेगम अख़्तर की गहरी दोस्ती थी. जिगर और उनकी पत्नी अक्सर बेगम के लखनऊ में हैवलौक रोड स्थित मकान में ठहरा करते थे.
शांति हीरानंद बताती हैं कि किस तरह बेगम अख़्तर जिगर से खुलेआम फ़्लर्ट किया करती थीं.
एक बार मज़ाक में उन्होंने जिगर से कहा, “क्या ही अच्छा हो कि हमारी आपसे शादी हो जाए. कल्पना करिए कि हमारे बच्चे कैसे होंगे. मेरी आवाज़ और आपकी शायरी का ज़बरदस्त सम्मिश्रण!”
इस पर जिगर ने ज़ोर का ठहाका लगाया और जवाब दिया, “लेकिन अगर उनकी शक्ल मेरी तरह निकली तो क्या होगा.”
कुमार गंधर्व और फ़िराक़ से दोस्ती
बेगम के दोस्तों में जाने माने शास्त्रीय गायक कुमार गंधर्व भी थे. जब भी वो लखनऊ में होते थे वो अक्सर अपना झोला कंधे पर डाले उनसे मिलने आया करते थे. वह शाकाहारी थे.
बेगम अख़्तर नहा कर अपने हाथों से उनके लिए खाना बनाया करती थीं. एक बार वो उनसे मिलने उनके शहर देवास भी गई थीं. तब कुमार ने उनके लिए खाना बनाया था और दोनों ने मिल कर गाया भी था.
फ़िराक़ गोरखपुरी भी उनके क़द्रदानों में थे. अपनी मौत से कुछ दिन पहले वो दिल्ली में पहाड़गंज के एक होटल में ठहरे हुए थे. बेगम उनसे मिलने गईं. फ़िराक़ गहरी गहरी सांस ले रहे थे लेकिन उनके चेहरे पर मुस्कान थी.
उन्होंने अपनी एक ग़ज़ल बेगम अख़्तर को दी और इसरार किया कि वो उसी वक़्त उसे उनके लिए गाएं.
ग़ज़ल थी, ‘शाम-ए-ग़म कुछ उस निगाहें नाज़ की बातें करो, बेख़ुदी बढ़ती चली है, राज़ की बातें करो’, जब बेगम ने वो ग़ज़ल गाई तो फ़िराक़ की आंखों से आंसू बह निकले.
ट्रेन में दिए ग़ज़ल को सुर
बेगम की मशहूर ग़ज़ल ‘ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया…’ के पीछे भी दिलचस्प कहानी है.
उनकी शिष्या शांति हीरानंद बताती हैं कि एक बार जब वो मुंबई सेंट्रल स्टेशन से लखनऊ के लिए रवाना हो रही थीं तो उनको स्टेशन छोड़ने आए शकील बदांयूनी ने उनके हाथ में एक चिट पकड़ाई.
रात को पुराने ज़माने के फ़र्स्ट क्लास कूपे में बेगम ने अपना हारमोनियम निकाला और चिट में लिखी उस ग़ज़ल पर काम करना शुरू किया.
भोपाल पहुंचते-पहुंचते ग़ज़ल को संगीतबद्ध किया जा चुका था. एक हफ़्ते के अंदर बेगम अख़्तर ने वो ग़ज़ल लखनऊ रेडियो स्टेशन से पेश किया और पूरे भारत ने उसे हाथों हाथ लिया.
एक बार बेगम अख़्तर जवानों के लिए कार्यक्रम करने कश्मीर गईं. जब वो लौटने लगीं तो फ़ौज के अफ़सरों ने उन्हें विह्स्की की कुछ बोतलें दीं.
कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री शेख़ अबदुल्लाह ने श्रीनगर में एक हाउस बोट पर उनके रुकने का इंतज़ाम करवाया था.
जब रात हुई तो बेगम ने वेटर से कहा कि वो उनका हारमोनियम हाउस बोट की छत पर ले आएं.
उन्होंने उनके साथ गईं रीता गांगुली से पूछा, “तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा अगर मैं थोड़ी सी शराब पी लूँ?” रीता ने हामी भर दी. वेटर गिलास और सोडा ले आया.
बेगम ने रीता से कहा, “ज़रा नीचे जाओ और देखो कि हाउस बोट में कोई सुंदर गिलास है या नहीं? ये गिलास देखने में अच्छा नहीं है.”
रीता नीचे से कट ग्लास का गिलास ले कर आईं. उसे धोया और उसमें बेगम अख़्तर के लिए शराब डाली. उन्होंने चांद की तरफ़ जाम बढ़ाते हुए कहा, “अच्छी शराब अच्छे गिलास में ही पी जानी चाहिए.”
रीता याद करती हैं कि उस रात बेगम अख़्तर ने दो घंटे तक गाया. ख़ासकर इब्ने इंशा की वो ग़ज़ल गाकर तो उन्होंने उन्हें अवाक कर दिया.
‘कल चौदहवीं की रात थी, शब भर रहा चर्चा तेरा… कुछ ने कहा ये चांद है, कुछ ने कहा चेहरा तेरा….’
पीर की सलाह
जब अख़्तरी 11 साल की थीं तो उनकी माँ मुश्तरी उन्हें अपने साथ बरेली के पीर अज़ीज़ मियाँ के पास ले कर गईं. उनके हाथ में एक नोटबुक थी जिसमें तमाम ग़ज़लें लिखी हुई थीं.
पीर ने नोटबुक के एक पन्ने पर हाथ रखा और कहा कि इसे पढ़ो. अख़्तरी ने बहज़ाद लखनवी की उस ग़ज़ल को ऊँची आवाज़ में पढ़ा,
”दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे… वरना कहीं तक़दीर तमाशा न बना दे… ऐ देखने वालों, मुझे हंस हंस के न देखो… तुमको भी मोहब्बत कहीं मुझ सा न बना दे…”
पीर साहब ने कहा, अगली रिकॉर्डिंग में इस ग़ज़ल को सबसे पहले गाना. अख़्तरी कलकत्ता पहुंचते ही अपनी रिकॉर्डिंग कंपनी के पास गईं… और दीवाना बनाना है… गाया.
सारंगी पर उनकी संगत के उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खाँ ने (दोनों पटियाला घराने से थे). 1925 की दुर्गा पूजा के दौरान वो रिकॉर्ड रिलीज़ किया गया और उसने पूरे बंगाल में तहलका मचा दिया. उसके बाद से अख़्तरी फ़ैज़ाबादी उर्फ़ बेग़म अख़्तर ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा.
सिगरेट की तलब
बेगम अख़्तर चेन स्मोकर थीं. एक बार वो ट्रेन से सफ़र कर रही थीं. देर रात महाराष्ट्र के एक छोटे से स्टेशन पर ट्रेन रुकी. बेगम प्लेटफ़ॉर्म पर उतरीं.
उन्होंने वहाँ मौजूद गार्ड से कहा, “भैया मेरी सिगरेट ख़त्म हो गईं है. क्या आप सड़क के उस पार जाकर मेरे लिए कैपस्टन का एक पैकेट ले आएंगे.” गार्ड ने सिगरेट लाने से साफ़ इंकार कर दिया.
बेगम अख़्तर ने आव देखा न ताव. फ़ौरन गार्ड के हाथों से उसकी लालटेन और झंडा छीना और कहा कि ये तभी उसे वापस मिलेगा जब वो उनके लिए सिगरेट ले आएंगे.
उन्होंने सौ का नोट उस गार्ड को पकड़ाया. ट्रेन उस स्टेशन पर तब तक रुकी रही जब तक गार्ड उनकी सिगरेट ले कर नहीं आ गया.
सिगरेट की वजह से ही उन्हें ‘पाकीज़ा’ फ़िल्म छह बार देखनी पड़ी थी. हर बार वो सिगरेट पीने के लिए हॉल से बाहर आतीं और जब तक वो लौटतीं फ़िल्म का कुछ हिस्सा निकल जाया करता. अगले दिन वो उस हिस्से को देखने दोबारा मेफ़ेयर हॉल आतीं. इस तरह से उन्होंने ‘पाकीज़ा’ फ़िल्म छह बार में पूरी की.
सुंदर चेहरे से प्रेरणा
उनकी एक और शिष्या रीता गांगुली याद करती हैं कि जब बेगम अख़्तर मुंबई आतीं तो संगीतकार मदनमोहन से मिले बिना न लौटतीं.
मदन मोहन उनसे मिलने उनके होटल आते और हमेशा अपनी गोरी महिला मित्रों को साथ लाते.
आधी रात के बाद तक बेगम अख़्तर और मदन मोहन के संगीत के दौर चलते और बीच में ही वो गोरी लड़कियां बिना बताए होटल से ग़ायब हो जातीं.
कई बार बेगम मदन मोहन से पूछतीं, “तुम उन चुड़ैलों को लाते क्यों हो? उनको तो संगीत की भी समझ नहीं है.”
मदन मोहन मुस्कराते और कहते, “ताकि आप अच्छा गा सकें. आप ही तो कहतीं हैं कि आपको सुंदर चेहरों से प्रेरणा मिलती है.”
बेगम अख़्तर का जवाब होता, “बेकार में अपनी तारीफ़ मत कराइए. आपको पता है कि आपका चेहरा मुझे प्रेरित करने के लिए काफ़ी है.”
-BBC