डॉ. निर्विकल्‍प अपहरण कांड: मुठभेड़, या फिर फिरौती पचाने और सफेदपोशों को बचाने का मुकम्‍मल इंतजाम

यूपी STF ने कल एक लाख रुपए के इनामी बदमाश अनूप चौधरी को भी एक मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार दिखाकर डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण से फिरौती में वसूले गए पूरे 52 लाख रुपए पचाने और उन सफेदपोश अपराधियों को बचा ले जाने का मुकम्‍मल इंतजाम कर लिया जिनमें कुछ वर्दीधारी तो कुछ बिना वर्दी वाले शामिल रहे थे।
मथुरा जनपद के ही थाना नौहझील अंतर्गत गांव कोलाहार निवासी अनूप चौधरी को पुलिस शुरू से डॉ. निर्विकल्‍प अपहरण केस का मास्‍टर माइंड बताती रही किंतु सब जानते हैं कि इस अपहरण में मास्‍टर माइंड कोई था तो वो थी पुलिस और उसके सहयोगी ऐसे सफेदपोश जिन्‍होंने डॉक्‍टर को आसान शिकार बताकर 52 लाख रुपए की मोटी रकम चंद मिनटों में वसूल कर ली।
कथित मास्‍टर माइंड अनूप चौधरी से कल हुई मुठभेड़ की कहानी के मुताबिक उसे STF ने नोएडा में दिल्‍ली बॉर्डर पर पकड़ा और जब यमुना एक्‍सप्रेस वे के रास्‍ते मथुरा के थाना हाईवे लेकर आ रही थी तब उसने सुरीर कोतवाली क्षेत्र में एक सिपाही की पिस्‍टल छीनकर पुलिस पर फायरिंग करते हुए भागने का प्रयास किया। जवाबी कार्यवाही में अनूप चौधरी घायल हो गया, जिसके बाद उसे जिला अस्‍पताल मथुरा में उपचार के लिए भर्ती करा दिया गया।
पुलिस और बदमाशों के बीच मुठभेड़ की हर कहानी यूं तो लगभग एक जैसी होती है इसलिए सतही तौर पर इसमें भी कुछ गलत नहीं है परंतु बारीकी से देखेंगे तो पता लगेगा कि ये ‘विशेष मुठभेड़’ दरअसल फिरौती की उस पूरी रकम को पचाने के साथ-साथ उन बावर्दी और सफेदपोश अपराधियों को साफ बचा ले जाने के लिए की गई जिन्‍होंने डॉ. निर्विकल्‍प को अगवा कराया।
यहां यह जान लेना जरूरी है कि STF को प्रदेशभर में कहीं से भी गिरफ्तारी करने का अधिकार प्राप्‍त है लिहाजा STF नोएडा ने अनूप चौधरी को दिल्‍ली बॉर्डर पर पकड़ लिया लेकिन नोएडा में गिरफ्तारी नहीं दिखाई। आखिर क्‍यों?
इसी एक सवाल से खड़े हो जाते हैं बहुत से सवाल
जैसे STF चाहती तो नोएडा में ही उससे चौबीस घंटे तो कानूनन पूछताछ कर सकती थी और इस दौरान यह जान सकती थी कि डॉ. निर्विकल्‍प को उठाने का आइडिया किसने तथा क्‍यों दिया?
अनूप चौधरी को इस बात की गारंटी किसने दी थी कि डॉ. निर्विकल्‍प इतनी बड़ी फिरौती देने के बावजूद अपना मुंह नहीं खोलेंगे?
अनूप चौधरी को उसी पॉश कॉलोनी राधापुरम एस्‍टेट में किसने और किस मकसद से मकान किराए पर दिलवाया जिसमें डॉ. निर्विकल्‍प रहते हैं?
डॉ. निर्विकल्‍प को उठाने के बाद चंद घंटों में मिली फिरौती की इतनी बड़ी रकम कहां गई और क्‍यों व किसके भरोसे उन्‍होंने डॉक्‍टर को इस शर्त के साथ रिहा कर दिया कि वह एक महीने के अंदर शेष तयशुदा 50 लाख रुपए और उन तक पहुंचा देंगे?
ऐसे कौन से कारण रहे कि एक हाईप्रोफाइल अपहरण पर मुंह सिलकर बैठने वाली मथुरा पुलिस ने दो महीने बाद अपनी ओर से एफआईआर दर्ज कर एफआईआर लिखाने वाले थाना प्रभारी को ही निलंबित कर अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर ली। तब भी जबकि इंस्‍पेक्‍टर को इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय के आदेश से बहाल कर दिया गया?
इन सब सवालों का जवाब इसमें निहित है कि यदि अनूप चौधरी को STF नोएडा में गिरफ्तार दिखाती तो एक ओर उसे जहां नोएडा पुलिस को भरोसे में लेना पड़ता वहीं दूसरी ओर नोएडा कोर्ट से मथुरा लाने की परमिशन लेनी पड़ती।
ऐसा करने पर डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण की पूरी सच्‍ची कथा सामने आने का डर था लिहाजा बिना लिखा-पढ़ी एसटीएफ उसे नोएडा से मथुरा लेकर चल दी, फिर संबंधित थाने पर पहुंचने से पहले मुठभेड़ को अंजाम दिया जिससे सांप मर जाए और लाठी भी न टूटे।
जाहिर है कि मुठभेड़ के बाद आरोपी को जितना जरूरी अस्‍पताल पहुंचाना था, उतना ही जरूरी उसकी गिरफ्तारी दिखाना भी था ताकि अगले चौबीस घंटों के अंदर उसकी कोर्ट में पेशी की जा सके।
घायलावस्‍था में पूछताछ का चिरपरिचित पुलिसिया तरीका काम नहीं आने का, और ठीक होने पर अगर पूछताछ करनी जरूरी समझी जाएगी तो कोर्ट से लोकल पुलिस को कस्‍टडी रिमांड पानी होगी।
रिमांड मिल भी गई तो वो टाइम बाउंड होगी। यानी सब-कुछ उस प्‍लान के मुताबिक किया गया जिससे केस ‘दाखिल दफ्तर’ हो जाए और किसी के पास उंगली उठाने की गुंजाइश भी न रहे।
एसटीएफ हो या मथुरा पुलिस, ऐसे केस में गुंजाइश छोड़ी भी कैसे जा सकती है जिसमें दो-दो उच्‍चाधिकारियों का नाम उछला हो और जिसके सूत्रधार वो सफेदपोश हों जिनका रहमो-करम सदा ‘खाकी पर’ बना रहता हो।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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