तीन दिवसीय एग्री एशिया एक्सपो एण्ड ट्रेड Show में कृषि उत्पाद बढ़ाने पर मंथन

Show में संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रो. अरविन्द राजपुरोहित ने दिया व्याख्यान

गांधी नगर (गुजरात) में लगा कृषि विशेषज्ञों का मेला

मथुरा। भारत में कृषि उत्पादन को यदि बढ़ाना है तो हमें वर्तमान कृषि प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन के साथ ही कृषक समुदाय के विभिन्न वर्गों को पुनः परिभाषित किया जाना भी जरूरी है। आज प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा सर्वोपरि है। यह तभी सम्भव है जब पर्यावरण सुरक्षा, संसाधनों का संरक्षण और उनका तर्कसंगत उपयोग अनुसंधान और विकास की प्रक्रिया का अभिन्न अंग बन जाएं उक्त सारगर्भित विचार संस्कृति विश्वविद्यालय के कृषि संकाय के डीन प्रो. अरविन्द राजपुरोहित ने भारत सरकार और गुजरात सरकार द्वारा महात्मा मंदिर परिसर गांधी नगर (गुजरात) में आयोजित तीन दिवसीय एग्री एशिया एक्सपो एण्ड ट्रेड शो में व्यक्त किए।

प्रो. अरविन्द राजपुरोहित ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कृषि विशेषज्ञों के बीच अनाज इंडिया के कार्यक्रम में कहा कि चूंकि 2025 तक हमारी खाद्यान्न की आवश्यकता 30 करोड़ टन हो जाएगी ऐसे में भारतीय किसानों को प्रतिवर्ष कृषि उत्पादन में चार फीसदी की वृद्धि दर बनाए रखना आसान बात नहीं है। वजह अधिकतर फसल प्रणालियों में निवेशकों के उपयोग का लागत-लाभ अनुपात घटता जा रहा है और हमारी प्राकृतिक सम्पदा का आधार तेजी से सिकुड़ रहा है।

खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता का वर्तमान स्तर बनाए रखने के लिए भी हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हर साल खाद्यान्न में कम से कम 50 लाख टन की वृद्धि बराबर होती रहे। इस अवसर पर प्रो. राजपुरोहित ने इण्डो-इजराइल चैम्बर आफ कामर्स के चेयरमैन टामी बरार से न केवल विचार-विमर्श किया बल्कि उन्हें संस्कृति विश्वविद्यालय आने का आमंत्रण भी दिया। इस अवसर पर प्रो. राजपुरोहित ने जापान की टायो इंडिया लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर केची तानाबे, अंतरराष्ट्रीय कम्पनी एग्रो स्टार के सीनियर एक्जीक्यूटिव मिर्जा शशिधरन, गौ आधारित कृषि फार्म भुदिया कृषि फार्म कक्ष-भुज गुजरात, वीएनआर सीड्स लिमिटेड के सचिन कुमार व अन्य प्रतिनिधियों से भी विचार विमर्श किया।

एग्री एशिया एक्सपो एण्ड ट्रेड शो में भारत सहित इजराइल, जापान, केन्या, नैरोबी, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, इथोपिया इत्यादि देशों के कृषि विशेषज्ञों ने कृषि तकनीक, उत्पादन प्रक्रिया पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि आज आनुवांशिकी उपज सीमा को लांघने के लिए वैज्ञानिक क्रियात्मक दृष्टि से अधिक कारगर पौध प्रारूप गढ़ने और संकर ओज की सम्भावनाओं का सदुपयोग करने की तरकीबें निकाल रहे हैं। भारत की जहां तक बात है वह धान, गेहूं, कपास, बाजरा और अरण्डी में संकर किस्में पहले ही विकसित कर चुका है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद अब नई-नई किस्मों के ऐसे संकर बीज पैदा करना चाहती है जो नई परिस्थितियों का डटकर सामना कर सकें। इसके लिए धान के अतिरिक्त सरसों, तोरिया, अरहर और कुसुम जैसी फसलों पर ध्यान दिया जा रहा है। भारतीय कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उपज को अस्थिर बनाने वाले कारकों की पहचान कर उसमें सुधार कर दिया जाए तो हम अगले पांच साल में छह करोड़ टन अतिरिक्त खाद्यान्न पैदा कर सकते हैं।

गुजरात के कृषि मंत्री बाबूभाई बोखिरिया ने देश-विदेश की कृषि उत्पाद प्रदर्शनियों की प्रशंसा करते हुए कृषि विशेषज्ञों का आभार माना। संस्कृति विश्वविद्यालय के उप-कुलाधिपति राजेश गुप्ता ने प्रो. अरविन्द राजपुरोहित को अंतरराष्ट्रीय मंच पर व्याख्यान देने के लिए बधाई दी ।

उन्‍होंने कहा कि उन्होंने तीन दिवसीय एग्री एशिया एक्सपो एण्ड ट्रेड Show में जो भी कुछ नई जानकारी जुटाई है उस पर छात्र-छात्राओं के बीच समय-समय पर जरूर चर्चा करें ताकि वे अद्यतन कृषि तकनीक से अवगत हो सकें।