पूरे प्रदेश में गांव स्तर पर कोविड सेंटर्स बनाए जाएं: पाण्डव

मथुरा। कोरोना की गंभीरता को देखते हुए पूरे प्रदेश में स्थानीय ग्राम पंचायतों की भागीदारी में गांव स्तर पर कोरोना सेंटर्स स्थापित किये जाएं। सरकार इन कोविड सेंटर्स में आईसोलेशन बेड, ऑक्सीजन, महत्वपूर्ण दवाईयों, टेस्टिंग के साथ ही टीकाकरण की भी पर्याप्त व्यवस्था कराये। गाँवों स्तर पर कोविड सेंटर्स की स्थापना के लिये गांव का स्कूल या सामुदायिक केंद्रों को इस्तेमाल में लाया जाए।

उक्‍त बात कहते हुए सामाजिक कार्यकर्ता और भारत सेवा न्यास के अध्यक्ष मानवेन्द्र पाण्डव ने कहा कि कोरोना महामारी से स्थिति बहुत गंभीर है।

उन्होंने आगे कहा कि गांवों में बड़े पैमाने पर कोरोना मरीज होने के बावजूद लोग सरकारी हॉस्पिटल में जाने से किनारा कर रहे हैं। क्योंकि आये दिन अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी के कारण बड़े पैमाने पर हो रही मौतों की ख़बरें पढ़कर लोगों का सरकारी सिस्टम से विश्वास उठ गया है। कोरोना से पीड़ित व्यक्ति अगर इलाज के लिये गाँव से शहर की तरफ भागते तो क़ानून व्यवस्था की स्थिति भयंकर हो सकती थी।

इसी अव्यवस्था के कारण ग्रामीणों ने सरकारी तंत्र से ज्यादा भरोसा उन चिकित्सकों पर किया जिनके पास कोई डिग्री नहीं है न्यास अध्यक्ष मानवेन्द्र पाण्डव ने ग्रामीण अंचल में रहने वाले लोगों से अपील करी कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए सामूहिक हुक्का पीने, समूह में ताश खेलने या चौपाल और बैठक आदि करने से परहेज किया जाए। पहले के मुकाबले इस बार हर तरह से सावधानी और सतर्कता रखी जाए।

मानवेन्द्र पाण्डव ने कहा कि उत्तर प्रदेश में में ऑक्सीजन के साथ अब वैक्सीन के लिये भी मारामारी मची हुई है। लोग लगातार वैक्सीन लगवाने के लिये दिन और टाईम स्लॉट इंटरनेट पर ढूंढ रहे हैं लेकिन उनको सफलता नहीं मिल पा रही है। दूसरी ओर सरकार वैक्सीन की दो डोज के बीच के समय अंतराल को अप्रत्याशित तरीके से बढ़ाती जा रही है। ऐसा लगता है कि सरकार लोगों की आवश्यकता के अनुसार वैक्सीन की अनुपलब्धि के कारण ही पहले और दूसरे डोज की अवधि को बढ़ा रही है। ऐसे में कोरोना संक्रमण की रफ्तार और इसकी चेन तोड़ पाना दूर की कौड़ी साबित होगा। सरकार को तुरंत केंद्र सरकार से बात करके 18 से 44 वर्ष की आयु वालों के साथ ही 45 से ऊपर की आयु वालों के लिये दोनो डोज की पर्याप्त व्यवस्था सुनिश्चित करानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि बिना तैयारी के सरकार ने 1 मई से 18 से 45 साल के लोगों के लिए वैक्सीनेशन शुरू करने की घोषणा तो कर दी, लेकिन आबादी के हिसाब से वैक्सीन की पर्याप्त व्यवस्था ही नहीं की।

मानवेन्द्र पाण्डव ने कहा कि सरकार की अव्यवस्था और प्रशासनिक नाकामी के चलते चारों तरफ कालाबाजारी का आलम है। लोग सांस लेने के लिये हवा, जीवन रक्षक दवा ब्लैक में लेकर अपने परिजनों की जान बचाने का संघर्ष कर रहे हैं। न केवल ऑक्सीजन सिलेंडर ब्लैक में मिल रहे बल्कि रेमेडीसिवर, टोसिलिज़ुमैब, एंटी फंगल दवाईयां भी ब्लैक में मिल रही हैं। कोरोना संक्रमण के बाद लोगों को ब्लैक फंगस या म्यूकरोमाइकोसिस नाम की जानलेवा बिमारी का सामना भी करना पड़ रहा है। इसके इलाज में इस्तेमाल होने वाली एंटी फंगल दवाईयों की भी किल्लत और कालाबाजारी की खबरें भी आनी शुरु हो गयी है। यही नहीं, कोरोना से ठीक होने वाले जो लोग दूसरों की जिंदगी बचाने के लिए प्लाज्मा डोनेट करना चाहते हैं उनको एंटीबॉडी जांच के लिए किए जाने वाले आईजीजी टेस्ट के लिए तय रेट से दो से तीन गुना तक अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। निजी लैब संचालक आईजीजी की बजाए कंपलीट एंटीबॉडी के नाम से टेस्ट कर तय रेट से कई गुना ज्यादा पैसे वसूल रहे हैं। सरकारी स्तर पर जांच सुविधाओं के कमी के कारण लोग निजी लैब में जांच कराने को मजबूर हैं जहां उनका जमकर आर्थिक शोषण किया जा रहा है। सरकार को इस पर तुरंत रोक लगानी चाहिए।

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