कोरोना संकट: इस पाप का गुरु कौन

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्॥

महर्षि वेदव्यास ने अठारह पुराणों में दो विशिष्ट बातें कही हैं। पहली: परोपकार करना पुण्य होता है और दूसरी: पाप का अर्थ होता है दूसरों को दुःख देना |
सफलता और उपलब्धियों के श्रेय के ल‍िए तो सहस्त्र दावेदार प्रकट हो जाते हैं परन्तु पाप कर्म की ज़िम्मेदारी कौन ले?

आज सम्पूर्ण विश्व कोरोना के प्रकोप और इससे उत्पन्न परिस्थितियों के लिए विस्तारवादी नीतियों, अनैतिक आचरण और दूषित खानपान के लिए जहां कुख्यात चीन के कपटपूर्ण व्यवहार को ही ज़िम्मेदार मानते हुए उसे पानी पी पी कर कोस रहा है, वहीं चीन और उसके कुछ मित्र देश इस महामारी को फैलाने का ठीकरा अमेरिका के सिर पर फोड़ रहे हैं।

कोरोना का इलाज और टीका खोजने के लिए तो सभी सक्षम देश प्रयासरत हैं लेकिन इसके पीछे छिपे मुख्य कारणों को खोजने और उन्हें स्वीकार करने से बच रहे हैं। सत्य प्रायः कड़वा ही होता है इसल‍िए ये स्वीकारना ही होगा कि स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने की होड़ में, विनाशकारी और अनैतिक अनुसंधान करने वाले विश्व के मुठ्ठीभर देशों ने आज सम्पूर्ण मानवता के समक्ष जीवन का संकट उत्पन्न कर दिया है।

व‍िशेषज्ञों ने आशंका जताई है क‍ि चीन द्वारा विकसित किया जा रहा जैविक हथियार लैब से लीक हो गया और वही कोरोना के रूप में सम्पूर्ण विश्व को भयभीत किए हुए है। सत्यता जो भी हो, परन्तु चीन द्वारा स्वास्थ्य सम्बंधित प्रोटोकाल का पालन किया गया होता तो निश्चित ही कोरोना से हो रही त्रासदी को कम किया जा सकता था।

सभी समझ रहे हैं कि कोरोना जैसी महामारी-विपदा इस धरा पर आख़िरी नहीं है। इसमें भी किसी को सन्देह नहीं है क‍ि एकजुटता और जागरूकता से ही कोरोना पराजित भी होगा लेकिन अब चिन्ता यह है क‍ि यदि इस महामारी से उबर भी गए तो भविष्य में रोज़गार, स्वास्थ्य और जीवन यापन पर उत्पन्न संकट का सामना कैसे करेंगे क्योंकि कोरोना से इन सभी क्षेत्रों में उपलब्ध संसाधनों पर बहुत विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

पीड़ा, वेदना, भूख से बिलबिला रही मानवता के लिए ज़िम्मेदार देश आज भी अपने पाप को स्वीकार कर भूल सुधार करने के स्थान पर आँखें तरेर रहे हैं। ऐसी समस्याओं के समाधान, रोकथाम और समन्वय के लिए ज़िम्मेदार वैश्विक संगठन सफ़ेद हाथी बने, सूँड़ व पूंछ हिला कर अपने होने मात्र का बोध करा रहे हैं और विश्वभर से प्राप्त अंशदान को बर्बाद कर रहे हैं।

आज तो अमेरिका आदि अनेक देशों ने ऐसे संगठनों की उपयोगिता और सार्थकता पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं परंतु वास्तव में लालच, अहंकार और अपने को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने की होड़ के कारण ये राष्ट्र मानवता को विनाश के मार्ग पर ले जाने को आमादा हैं इसील‍िए वह इसको स्वीकार करने के स्थान पर बचकाने तर्कों से सही ठहरा रहे हैं।

क्या यह महा पाप और कुटिल षड्यन्त्र-प्रपंच नहीं!

इस संदर्भ में एक प्रसंग है कि :
शिष्य ने गुरु से पूछा कि हमारे आध्यात्मिक कर्मों का श्रेय तो आप को जाता है, फिर जाने अनजाने में किए जा रहे पाप का गुरु कौन है।
प्रश्न सुन कर गुरु जी चकरा गए, उन्होंने धर्म व आध्यात्मिक गुरु तो सुने थे लेकिन पाप का भी गुरु होता है, यह उनके ज्ञान से परे था।
गंगा स्नान कर संत बैठे उत्तर का चिंतन कर रहे थे क‍ि अचानक एक गणिका (वैश्या) ने प्रणाम कर पूछा महाराज किस सोच में हैं ? संत ने उसके सामने शिष्य के प्रश्न को उद्घाटित कर दिया।
गणिका बोली- महाराज ! इसका उत्तर है मेरे पास, लेकिन उत्तर पाने के लिए आपको कुछ दिन मेरे पड़ोस में रहना होगा।
संत उत्तर की जिज्ञासा में सहर्ष तैयार हो गए।
संत स्वयंपाकी थे अर्थात् किसी अन्य के हाथ का बना भोजन ग्रहण नहीं करते थे।
गणिका के घर के समीप रहकर अपने हाथ से खाना बनाते खाते कुछ दिन बीत गए, लेकिन प्रश्न का उत्तर नहीं मिला।
एक दिन गणिका बोली- महाराज ! आपको भोजन पकाने में बड़ी तकलीफ होती है। यहां देखने वाला तो कोई है नहीं, आप कहें तो नहा-धोकर मैं आपके लिए भोजन बना दिया करूं और यदि आप मुझे सेवा का मौका दें, तो मैं प्रतिदिन दक्षिणा में एक स्वर्ण मुद्रा भी आपको दूंगी।
संत ने सोचा क‍ि भोजन और दक्षिणा दोनों ही मिल रहे हैं और भजन को भी समय ज़्यादा मिलेगा। कुसंग का प्रभाव! संत ने अपने नियम-व्रत, आचार-विचार को भूल कर कर कहा- जैसी तुम्हारी इच्छा, ध्यान रखना कि मेरी कुटिया में आते-जाते तुम्हें कोई देखे नहीं।
गणिका ने पहले ही दिन कई प्रकार के पकवान बनाकर संत के सामने परोसे, पर ज्यों ही संत ने खाना चाहा, उसने सामने से परोसी हुई थाली खींच ली।
इस पर संत क्रुद्ध हो गए और बोले, यह क्या कृत्य है ? गणिका ने कहा- महाराज, यह आपके प्रश्न का उत्तर है।
यहां आने से पहले आप भोजन तो दूर, किसी के हाथ से जल भी ग्रहण नहीं करते थे मगर स्वर्ण मुद्राओं के लोभ में आपने अपना वर्षों का नियम-व्रत तोड़ दिया। यह जो लोभ है, वही पाप का गुरु है।

लोभमूलानि पापानि संकटानि तथैव च। लोभात्प्रवर्तते वैरं अतिलोभात्विनश्यति॥

लोभ, पाप आदि संकटों का मूल है, लोभ वश शत्रुता में वृद्धि होती है, अति लोभ विनाश का कारण बनता है ।

तो आज प्राकृतिक संसाधनों का लालच, सर्वश्रेष्ठ – सर्वशक्ति सम्पन्न बनने की महत्वाकांक्षा, संस्कृति, मानवता और प्रकृति के सर्वदा प्रतिकूल निर्लज्ज आचरण और स्वार्थपरक मानसिकता के साथ आरोग्य-विश्व शांति की कल्पना भी व्यर्थ है।

जब तक वसुंधरा पर परस्पर प्रेम सम्मान – विश्वास -संतुष्टि आदि का भाव उत्पन्न नहीं होगा, मानवता के समक्ष महामारी – रोग -शोक-दुःख-दारिद्र आदि संकट बने ही रहेंगे, भले ही हम रोकथाम के कितने भी तात्कालिक उपाय कर लें।

समय आ गया है वसुधैव कुटुंबकम् की भावना को सुवासित करने का, संतुष्टि अहम के भाव की पूर्ति में नहीं अपितु परोपकार में है, जैसे भाव को आत्मसात् करने का।

स्वस्थ – सुखी मानव जीवन की कल्पना तभी साकार होगी जब हम स्वार्थपरक जीवनशैली और विचारधारा को त्याग कर पुरुषार्थ पूर्वक सकारात्मक कर्म करेंगे, साथ ही अनैतिक तरीक़े से अपनी स्वार्थपरक नीतियों और व्यापार के संवर्धन में लगे देशों का बहिष्कार भी कठोरता से करना होगा।

कपिल शर्मा , सचिव, श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान, मथुरा

 

– कपिल शर्मा ,
सचिव,
श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान,
मथुरा

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