कांग्रेस में नरेंद्र मोदी का विकल्प तैयार नहीं हो पा रहा है: प्रमोद कृष्णम

नई दिल्‍ली। कांग्रेस की मौजूदा स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है? इस सवाल पर भले ही पार्टी के ज्यादातर नेता बोलने से बचना चाहते हों लेकिन पार्टी के सीनियर लीडर और प्रियंका गांधी की सलाहकार समिति के सदस्य आचार्य प्रमोद कृष्णम खुलकर कहते हैं कि कांग्रेस में कुछ नॉन-पॉलिटिकल लोग नए-नए आए हैं।
प्रमोद कृष्णम का कहना है कि जिनका पार्टी के फैसलों में दखल हो गया है। इस वजह से ही नरेंद्र मोदी का विकल्प तैयार नहीं हो पा रहा है। प्रस्तुत हैं बातचीत के मुख्य अंश :
देश की सबसे पुरानी पार्टी, जिसके पास शासन का सबसे ज्यादा अनुभव है, वह अनिर्णय की शिकार कैसे हो गई?
राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद सीडब्ल्यूसी को यह निर्णय तत्काल लेना चाहिए था कि कोई नया अध्यक्ष बने। लेकिन सीडब्ल्यूसी ने अपने दायित्वों का निवर्हन नहीं किया। उसका कर्तव्य था कि या तो वह राहुल जी को इस्तीफा वापस लेने को राजी करे या नया अध्यक्ष चुने। एक साल तक कांग्रेस का अध्यक्ष नहीं चुने जाने से पार्टी को भारी नुकसान हुआ। कांग्रेस पार्टी की स्थिति कमजोर होने में पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का बहुत बड़ा योगदान है। इसी वजह से पार्टी आज अनिर्णय की स्थिति में है।
कांग्रेस पार्टी के नेता गांधी परिवार से हटकर किसी गैर गांधी को अध्यक्ष चुनने का जोखिम क्यों नहीं उठाना चाहते?
यह गलत धारणा बनाई जा रही है कि कांग्रेस में कभी कोई गैर गांधी अध्यक्ष नहीं बना है। एक-दो नहीं, कई बार गांधी परिवार से बाहर का अध्यक्ष बना है। ऐसा भी नहीं कि गांधी परिवार पार्टी के अध्यक्ष पद पर अपना कब्जा बनाए रखने के लिए किसी और को अध्यक्ष नहीं बनने देना चाहता है। गांधी परिवार को अगर सत्ता का लोभ होता तो नरसिंह राव और मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने की जगह
सोनिया गांधी खुद प्रधानमंत्री बन सकती थीं।
आपकी ही बात मान लेते हैं कि गांधी परिवार को पद का मोह नहीं है। फिर भी पार्टी के तमाम नेताओं ने गांधी परिवार से अध्यक्ष चुनने के लिए पूरी ताकत लगा रखी है।
कांग्रेस पार्टी के अंदर बहुत वरिष्ठ नेता हैं लेकिन कुछ दिनों से कुछ ऐसे नेताओं का दखल बढ़ गया है, जो जमीनी हकीकत से वाकिफ नहीं हैं। कुछ नॉन-पालिटकल लोग नए-नए आए हैं, उनका कांग्रेस पार्टी के फैसलों में दखल हो गया है, उससे नरेंद्र मोदी का विकल्प तैयार नहीं हो पा रहा है।
यह भी लगता है कि मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के घटनाक्रम से कांग्रेस आलाकमान ने कोई सबक नहीं लिया। कांग्रेस शासित राजस्थान, पंजाब और छत्तीसगढ़ में सब कुछ सहज नहीं कहा जा रहा है…
सिंधिया ने क्यों गद्दारी की, यह तो वही बता सकते हैं। जहां तक सचिन पायलट की बात है तो मुझे लगता है कि उनके साथ नाइंसाफी हुई है। 2018 के विधानसभा चुनाव में जिस राज्य में कांग्रेस का जो प्रदेश अध्यक्ष था, पार्टी को बहुमत मिलने पर उसको ही सीएम बनाया गया, सिवाय राजस्थान के, जहां सचिन पायलट अध्यक्ष थे। सचिन को सीएम बनना चाहिए था। वे डिजर्व करते थे, उसकी पीड़ा उनके मन में है। मुझे लगता है कि भगवान की कृपा से वे जल्द ही राजस्थान के सीएम बनेंगे।
क्या यह मुमकिन है कि अशोक गहलोत को दिल्ली शिफ्ट कर दिया जाए और सचिन पायलट को सीएम बना दिया जाए?
अशोक गहलोत बहुत वरिष्ठ नेता हैं। जिन 23 नेताओं ने नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए पत्र लिखा था, वे भी उनका बहुत आदर करते हैं। अगर राहुल गांधी जी अध्यक्ष नहीं बनते हैं और प्रियंका गांधी जी को भी अध्यक्ष नहीं बनाया जाता है तो अशोक गहलोत जी को अध्यक्ष बना देना चाहिए।
कांग्रेस के अंदर तीन खेमों की बात की जाती है, आपकी श्रद्धा किस खेमे में है?
मैं कांग्रेस की मूल विचारधारा से जुड़ा हूं, जो महात्मा गांधी, नेहरू और इंदिरा गांधी की विचारधारा है।
हरीश रावत ने मांग उठाई है कि पार्टी को उत्तराखंड में सीएम का चेहरा घोषित करके चुनाव मैदान में जाना चाहिए, लेकिन उनकी मांग खारिज हो गई है। इस पर आपकी क्या राय है?
मैं हरीश रावत की बात से सहमत हूं। आज के दौर में जनता जानना चाहती है कि दूल्हा कौन है। कांग्रेस पार्टी को हर राज्य में अपना सीएम का चेहरा घोषित करना चाहिए।
आपने यूपी को लेकर सलाह दी है कि पार्टी को वहां ब्राह्मण सीएम का उम्मीदवार देना चाहिए, इसके पीछे क्या गणित है?
यह सभी मानते हैं कि यूपी की राजनीति में ब्राह्मण प्रभावी भूमिका में हैं। यूपी में आखिरी ब्राह्मण सीएम नारायण दत्त तिवारी हुए थे। उसके बाद 31 साल का वक्त गुजर गया, वहां कोई ब्राह्मण सीएम नहीं हुआ है। इस बीच बीजेपी की भी वहां सरकारें बनीं लेकिन उन्होंने भी कोई ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं बनाया। 2022 में भी वहां योगी, अखिलेश और मायावती ही सीएम के चेहरे हैं तो मुझे लगा कि कांग्रेस को ब्राह्मणों की इच्छा का सम्मान करना चाहिए।
लेकिन कांग्रेस ने यूपी में 2017 के चुनाव में शीला दीक्षित को चेहरा घोषित करने के बाद अपना फैसला बदल दिया था?
उस फैसले से कांग्रेस को बहुत नुकसान हुआ। शीला दीक्षित के नाम पर ब्राह्मण समाज कांग्रेस के साथ जुड़ रहा था। लेकिन जब पार्टी ने अखिलेश यादव को चेहरा मान लिया, तो ब्राह्मण ने न कांग्रेस को वोट दिया और न समाजवादी पार्टी को, बल्कि वह बीजेपी में चला गया।
-एजेंसियां

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