CJI बोबडे ने कहा, मुश्किल होता है न्याय देने का काम

नई दिल्‍ली। भारत के प्रधान न्यायाधीश CJI शरद अरविंद बोबडे ने शनिवार को कहा कि न्याय देने का काम मुश्किल होता है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों का उद्देश्य कभी लोकप्रियता हासिल करना नहीं होता है, जबकि विवादों का निपटारा करने का होता है।
बोबडे ने यहां वैश्वीकरण के युग में मध्यस्थता के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में कहा कि न्याय देना मुश्किल कार्य हो सकता है। न्यायाधीश वह काम करते हैं, जिसे सभी टालते हैं जोकि निर्णय लेने का काम होता है। किसी भी न्यायाधीश का उद्देश्य लोकप्रियता हासिल करने का नहीं होता है, बल्कि विवादों का निपटारा करने का होता है।
उन्होंने कहा कि मध्यस्थता कोर्ट के बाहर विवादों के निपटारे की तकनीक है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि एक ऐसा व्यापक कानून बनाने के लिए यह सबसे सही समय है, जिसमें ‘मुकदमे से पहले अनिवार्य मध्यस्थता’ शामिल हो।
उन्होंने कहा कि इस कानून से कार्यक्षमता सुनिश्चित होगी और पक्षकारों व अदालतों के लिए मामलों के लंबित होने का समय घटेगा।
सीजेआई बोबडे ने ‘वैश्वीकरण के युग में मध्यस्थता’ विषय पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के तीसरे संस्करण में कहा कि भारत में संस्थागत मध्यस्थता के विकास के लिए एक मजबूत ‘आरबिट्रेशन (मध्यस्थता) बार’ जरूरी है क्योंकि यह ज्ञान और अनुभव वाले पेशेवरों की उपलब्धता और पहुंच सुनिश्चित करेगा। सीजेआई ने कहा कि आज अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, वाणिज्य और निवेश वाले वैश्विक आधारभूत ढांचे में मध्यस्थता एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वैश्विक समुदाय के एक अभिन्न सदस्य और व्यापार व निवेश के लिहाज से महत्वपूर्ण होने के नाते भारत अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता में किस तरह से शामिल होता है इसका सीमापार अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, वाणिज्य और निवेश के प्रवाह पर महत्वपूर्ण प्रभाव होता है।
सीजेआई ने कहा, ‘वाणिज्यिक अदालत अधिनियम में उल्लेखित पूर्व-संस्थान स्तर वाली मध्यस्थता और समाधान मुकदमा से पहले मध्यस्थता के कई फायदों की जरूरत पर जोर देते हुए कई और संस्थानों के लिए एक रास्ता तैयार करेगा।’
उन्होंने कहा, ‘मेरा मानना है कि एक व्यापक कानून बनाने का यह बिल्कुल सही समय है, जिसमें मुकदमे से पहले अनिवार्य मध्यस्थता हो..।’ अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता में भारत की भूमिका का जिक्र करते हुए सीजेआई बोबडे ने कहा, ‘हाल के समय में, वैश्वीकरण के चलते भारत से जुड़े सीमापार लेनदेन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है जिससे सीमापार मध्यस्थता की मांग भी बढ़ी है। इसके परिणामस्वरूप बढ़ते मामलों की जटिलता से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय परंपराओं की स्थापना हुई है।’
-एजेंसियां

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