Christie Lueung ने कहा, देव कलाकृति में सामाजिक परिवर्तन की क्षमता होती है

नई द‍ि‍ल्ली। महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय की श्रीमती Christie Lueung ने प्रतिपादित किया कि, कलाकृति से प्रक्षेपित होनेवाले स्पंदनों का अर्थात कलाकृति का आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अध्ययन करने पर हमें ध्यान में आता है कि अभी तक हमने जिस प्रकार कलाकृतियों का मूल्यांकन किया है, वह पुनः करना पडेगा । चित्रकार कितना भी प्रसिद्ध हो; परंतु वह सकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित करनेवाले देवताओं के अथवा अन्य कोई भी चित्र बना पाएगा, ऐसा नहीं है । सकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित करनेवाली आध्यात्मिक दृष्टिकोण से शुद्ध कलाकृति बनाने के लिए कलाकार को आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत मार्गदर्शक के मार्गदर्शनानुसार साधना करना आवश्यक है । कलाकार ने अध्यात्मशास्त्रानुसार बनाए हुए देवताओं  के चित्र सकारात्मक स्पंदनों का स्रोत होते हैं तथा उनसे समाज और वातावरण में सकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित होते हैं तथा ऐसी कलाकृतियों में सामाजिक परिवर्तन करने की क्षमता होती है ।

Christie Lueung वेंकूवर, कैनडा में, 9 से 13 जुलाई की अवधि में MAKING/INSEA 2019 की अंतरराष्ट्रीय परिषद में वे बोल रही थीं । श्रीमती क्रिस्टी ल्यूंग ने इस परिषद में ‘आध्यात्मिक उन्नति के लिए सात्त्विक कला का अध्ययन, अभ्यास और अध्यापन’, यह शोधनिबंध 11 जुलाई को प्रस्तुत किया । महर्षि अध्यात्म विश्‍वविद्यालय के संस्थापक परात्पर गुरु डॉ. आठवलेजी इस शोधनिबंध के लेखक हैं । इस परिषद का आयोजन वेंकूवर, कैनडा की यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया ने किया था ।

श्रीमती क्रिस्टी ल्यूंग ने विविध चित्रों के संदर्भ में किए शोध के अंतर्गत किए गए विविध प्रयोगों की विस्तृत जानकारी दी । इसमें उन्होंने ‘पिप (पॉलिकॉन्ट्रास्ट इंटरफेरन्स फोटोग्राफी)’ प्रणाली का उपयोग कर किए शोध की जानकारी दी । इस प्रणाली की सहायता से वस्तु और व्यक्ति के ऊर्जाक्षेत्र का (‘ऑरा’का) अध्ययन कर सकते हैं । इस प्रणाली द्वारा बनाए गए छायाचित्रों में (‘पिप’ छायाचित्रों में) सजीव अथवा निर्जीव वस्तु के ऊर्जाक्षेत्र विविध रंगों में देख सकते हैं । इसमें सकारात्मक और नकारात्मक स्पंदन रंगों के माध्यम से दिखाई देने की सुविधा है ।

एक सर्वोच्च आध्यात्मिक स्तर के संत के मार्गदर्शन में साधक चित्रकार ने 12 वर्षों की अवधि में बनाए श्री गणपति के संगणकीय 6 चित्रों के ‘पिप’ छायाचित्र दिखाए । उन चित्रों में श्री गणेशतत्त्व की मात्रा में बढते जा रहे सकारात्मक स्पंदनों की मात्रा ‘पिप’ छायाचित्रों में स्पष्ट रूप से ध्यान में आ रही थी । इसके विपरीत एक प्रसिद्ध चित्रकार द्वारा व्यवसायिक उद्देश्य से बनाए गए देवताआें के अनादरात्मक चित्रों से प्रक्षेपित होनेवाले नकारात्मक स्पंदन उन चित्रों के ‘पिप’ छायाचित्रों से स्पष्ट रूप से ध्यान में आ रहे थे ।

श्रीमती क्रिस्टी ल्यूंग ने भूतपूर्व अणुवैज्ञानिक डॉ. मन्नम मूर्ती द्वारा विकसित उपकरण ‘युनिवर्सल थर्मो स्कैनर’ (यू.टी.एस.) द्वारा किए शोध की जानकारी दी । इस उपकरण द्वारा किसी भी सजीव अथवा निर्जीव वस्तु की सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा तथा वस्तु के आस-पास का कुल प्रभामंडल मापा जा सकता है । इस उपकरण द्वारा किए संशोधन का निष्कर्ष ‘पिप (पॉलीकॉन्ट्रास्ट इंटरफेरन्स फोटोग्राफी)’ प्रणाली द्वारा किए गए प्रयोगों में मिले निष्कर्ष के समान ही था ।

इस अवसर पर श्रीमती क्रिस्टी ल्यूंग ने सूक्ष्म स्पंदन जानने की क्षमता रखनेवाले साधकों ने अध्यात्मशास्त्रानुसार बनाए देवताआें के चित्र और अनादरात्मक चित्रों की ओर देखकर उन्हें दिखनेवाली सूक्ष्म प्रक्रिया उजागर करने के लिए बनाए चित्र (सूक्ष्म-चित्र) दिखाए । ये सूक्ष्म-चित्र प्रभामंडल मापक उपकरणों द्वारा मिलनेवाले छायाचित्रों की अपेक्षा 10 हजार गुना अधिक सूक्ष्म प्रक्रिया दर्शानेवाले होते हैं । इसलिए वे महत्त्वपूर्ण हैं । उसमें सुप्रसिद्ध चित्रकार ने बनाए देवता के अनादरात्मक चित्र में नकारात्मक स्पंदन और अध्यात्मशास्त्रानुसार बनाए देवता के चित्र में सकारात्मक स्पंदन होते हैं, यह दिखाई दिया ।

इस प्रयोग के अंत में श्रीमती क्रिस्टी ल्यूंग ने प्रश्‍न किया कि ‘लाखों रुपए खर्च कर क्रय किया हुआ नकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित करनेवाला चित्र भले ही वह एक प्रसिद्ध कलाकार ने बनाया हुआ क्यों न हो, घर में लगाना योग्य है क्या ?’ यह प्रश्‍न उपस्थितों को केवल अंतर्मुख करनेवाला ही नहीं, अपितु कलाकृति की ओर आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखने का दृष्टिकोण देनेवाला था ।

देवताआें के चित्रों के उपरांत श्रीमती क्रिस्टी ल्यूंग ने व्यक्तिचित्रों का (‘पोर्ट्रेट’का) विषय प्रस्तुत किया । उसमें उन्होंने संसार में प्रसिद्ध व्यक्तिचित्र ‘मोना लिसा’ और एक साधना करनेवाले चित्रकार ने एक संत का बनाया हुआ व्यक्तिचित्र इन दोनों का ‘पिप (पॉलिकॉन्ट्रास्ट इंटरफेरन्स फोटोग्राफी)’ प्रणाली द्वारा तथा ’यूनिवर्सल थर्मो स्कैनर’ (यू.टी.एस.) उपकरण द्वारा किए शोध की जानकारी दी । संसार में प्रसिद्ध व्यक्तिचित्र ‘मोना लिसा’ नकारात्मक तथा संत का चित्र सकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित करनेवाला था, यह इन दोनों उपकरणों द्वारा किए शोध में दिखाई दिया । इसका कारण बताते हुए श्रीमती क्रिस्टी बोली कि ‘‘संतों में सकारात्मक ऊर्जा अधिक मात्रा में होती है । इसलिए संतों के चित्र में भी सकारात्मक ऊर्जा होती है तथा उसका लाभ अपने सहित वातावरण को होता है ।’’

अंत में शोधनिबंध का सारांश प्रस्तुत करते हुए श्रीमती क्रिस्टी बोलीं कि ‘‘ऐसा नहीं है कि प्रसिद्ध चित्रकार सकारात्मक स्पंदनवाले चित्र बना ही सकते हैं । हमारे द्वारा किए गए अध्ययन में संसार के सबसे अधिक महंगे 21 चित्रों में से 2 चित्रों से अल्प मात्रा में तथा शेष सभी चित्रों से पूर्णतः नकारात्मक स्पंदन प्रक्षेपित होते दिखाई दिए । आध्यात्मिकदृष्टि से शुद्ध कलाकृति बनाने के लिए उस कलाकृति का विषय सात्त्विक होना चाहिए तथा उस विषय के सकारात्मक स्पंदन अधिक मात्रा में प्रक्षेपित हों, इस प्रकार वह चित्र बनाना चाहिए ।’’

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