चीन का नया सुरक्षा क़ानून: खिलाफत में खड़े हुए चार ताकतवर देश

वॉशिंगटन। हॉन्ग कॉन्ग के लिए चीन के नए सुरक्षा क़ानून की अमरीका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा ने साथ मिलकर निंदा की है.
इन देशों ने कहा कि हॉन्ग कॉन्ग आज़ादी के गढ़ के तौर पर फला-फूला है. अपने बयान में इन देशों ने कहा कि हॉन्ग कॉन्ग की संपन्नता और स्थिरता में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की अहम भूमिका रही है.
बयान में कहा गया है कि महामारी के दौरान हॉन्ग कॉन्ग में चीन के नए सुरक्षा क़ानून से सरकार में और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को लेकर भरोसा कम हुआ है. हालांकि चीन ने विदेशी आलोचनाओं को ख़ारिज कर दिया है. सुरक्षा क़ानून को चीन की संसद ने गुरुवार को मंज़ूरी दे दी थी. इस क़ानून की मंज़ूरी के बाद हॉन्ग कॉन्ग में चीन विरोधी प्रदर्शन एक बार फिर से भड़क उठा है.
बुधवार को अमरीका के विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने कहा था कि हॉन्ग कॉन्ग में जो कुछ भी चीन की ओर से किया जा रहा है उससे साफ़ हो जाता है कि यहां स्वायतत्ता जैसी अब कोई बात नहीं रही. पॉम्पियो ने कहा कि अमरीकी क़ानून के तहत हॉन्ग कॉन्ग जो दर्जा मिला था अब वो नहीं रहेगा और चीन की तरह ही उसके लिए भी सामान्य नियम होंगे. अमरीका के इस रुख़ से हॉन्ग कॉन्ग की जो ट्रेड हब की पहचान है वो प्रभावित होगी.
ब्रिटेन ने गुरुवार को कहा कि अगर चीन विवादित सुरक्षा क़ानून निलंबित नहीं करता है तो हॉन्ग कॉन्ग में तीन लाख रह रहे ब्रिटिश नागरिकों के वीज़ा का विस्तार किया जाएगा और इससे भविष्य में नागरिकता के लिए भी राह खुलेगी.
ब्रिटेन के विदेश मंत्री डॉमिनिक राब ने कहा है, ”बीएनओ (ब्रिटिश नेशनल ओवरसीज) पासपोर्ट होल्डर्स अभी ब्रिटेन में छह महीने ही रह सकते हैं लेकिन चीन अगर सुरक्षा क़ानून लागू करता है तो छह महीने की अवधि बढ़ाई जाएगी. छह महीने की अवधि ख़त्म कर दी जाएगी और बीएनओ पासपोर्ट होल्डर्स को ब्रिटेन में काम करने और पढ़ने की अनुमति मिलेगी और इससे स्थायी नागरिकता की भी राह खुलेगी.”
नए बयान में क्या है?
हॉन्ग कॉन्ग के अपने सिस्टम की उपेक्षा कर सीधे चीन से सुरक्षा क़ानून थोपना यहां के लोगों की आज़ादी पर हमला है. इससे यहां की स्वायतत्ता ख़त्म होगी. चाइना-ब्रिटिश घोषणापत्र के तहत चीन की जो अंतर्राष्ट्रीय बाध्यता थी, उसका भी यह उल्लंघन है. इसी घोषणापत्र के तहत चीन को हॉन्ग कॉन्ग सौंपा गया था. यह ‘एक देश दो व्यवस्था’ के सिद्धांत का भी उल्लंघन है. हॉन्ग कॉन्ग के लिए यह राजनीतिक अपराध है. अमरीका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा ने ये भी कहा है कि नए सुरक्षा क़ानून से हॉन्ग कॉन्ग में विभाजन बढ़ेगा. चीन के साथ यहां के लोगों का टकराव भी बढ़ेगा.
बयान में कहा गया है, ”पिछले साल से ही यहां अशांति है. यहां के लोगों के अधिकार और स्वतंत्रता को जब तक सुनिश्चित नहीं किया जाता है तब तक टकराव और तनाव को ख़त्म नहीं किया जा सकेगा. अमरीका और सहयोगी देशों ने चीन से आग्रह किया है कि वो हॉन्ग कॉन्ग की सरकार के साथ काम करे और लोकतंत्र के साथ स्थिरता को सुनिश्चित करे.
इन चार देशों के अलावा जापान ने भी कहा है कि हॉन्ग कॉन्ग उसका अहम साझेदार है और यहां लोकतत्र बहाल होना चाहिए. चीन ने हॉन्ग कॉन्ग को लेकर जो प्रस्ताव पास किया है उसके तहत वो पहली बार अपनी सुरक्षा एजेंसियां यहां काम करना शुरू कर देंगी. लेकिन क़ानून वाक़ई में क्या है और कितनी प्रभावी है इसे लेकर स्थिति अभी साफ़ नहीं है.
विशेषज्ञों का कहना है कि इस क़ानून का इस्तेमाल चीन की आलोचना करने वालों को सज़ा देने के तौर पर किया जाएगा, जो कि चीन में पहले से ही होता है. मिसाल के तौर पर नोबेल विजेता लिउ शिओबो 11 सालों से जेल में हैं. वो इसलिए जेल में हैं क्योंकि उन्होंने राजनीतिक सुधार की बात कही थी.
हॉन्ग कॉन्ग में चीन के विदेश मंत्रालय ने अमरीकी विदेश मंत्रालय के उन आरोपों को ख़ारिज कर दिया है कि स्वायतत्ता ख़त्म हो गई है. चीन के विदेश मंत्रालय ने आरोप लगाया है कि अमरीका उसके आंतरिक मामलों में दखल दे रहा है. चीन का कहना है कि अमरीका की तरफ़ से चीन की आलोचना अतार्किक और शर्मनाक है. हॉन्ग कॉन्ग की नेता कैरी लैम ने भी कहा है कि नए सुरक्षा क़ानून से हॉन्ग कॉन्ग के लोगों की आज़ादी पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
हॉन्ग कॉन्ग में क्या हो रहा है?
नए सुरक्षा क़ानून को लेकर बुधवार को हॉन्ग कॉन्ग में टकराव देखने को मिला. क़ानून का विरोध कर रहे सैंकड़ों छात्रों को गिरफ़्तार किया गया. गुरुवार को भी भारी सुरक्षाबलों की तैनाती की गई थी. लेजिसलेटिव काउंसिल में तनावपूर्ण माहौल में बहस जारी है.
गुरुवार को कम से कम दो लोकतंत्र समर्थक प्रतिनिधियों को काउंसिल से बाहर निकाल दिया गया. एक प्रतिनिधि टेड हुई ने चेंबर के फ्लोर पर सड़ा हुआ पौधा फेंका और कहा कि यह इस बात का प्रतीक है कि हॉन्ग कॉन्ग की राजनीतिक व्यवस्था सड़ गई है. उन्होंने कहा, ”मैं चाहता हूं कि स्पीकर इसे महसूस करें कि सड़ना क्या होता है.”
चीन ऐसा क्यों कर रहा है?
हॉन्ग कॉन्ग को 1997 में ब्रिटिश नियंत्रण से चीन को सौंपा गया था. लेकिन इसके लिए एक समझौता हुआ था. हॉन्ग कॉन्ग का अपना एक मिनी संविधान बना था. इसी के तहत चीन ने एक देश दो व्यवस्था का प्रावधान किया था.
इसके तहत हॉन्ग कॉन्ग के लोगों को एक जगह जमा होने और बोलने की आज़ादी थी. स्वतंत्र न्यायपालिका की व्यवस्था की गई थी. इसके साथ ही कुछ लोकतांत्रिक अधिकार भी दिए गए थे. पिछले साल प्रत्यर्पण संधि को लेकर विवाद शुरू हुआ था. विरोध-प्रदर्शन इतना प्रभावी था कि सरकार को इसेसे अनुमति लेनी पड़ती थी.
-BBC

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