चीन ने बिना इजाजत श्रीलंका के बंदरगाह पर रेडियोएक्टिव से भरा शिप खड़ा किया

कोलंबो। चीन इन दिनों हिंद महासागर में अपनी उपस्थिति को बढ़ाने के लिए श्रीलंका पर लगातार डोरे डाल रहा है। ड्रैगन ने भारत के इस पड़ोसी देश को इतनी अधिक मात्रा में कर्ज दिया हुआ है, जिसको कोलंबो चाहकर भी अगले 100 साल में चुका नहीं पाएगा। यही कारण है कि श्रीलंका को अपना हंबनटोटा बंदरगाह चीनी कंपनी को 99 साल की लीज पर देना पड़ा है। अब चीन ने इसी पोर्ट पर श्रीलंका से बिना पूछे रेडियोएक्टिव पदार्थ से भरे शिप को ठहराकर बड़ी आपदा को निमंत्रण दे दिया है। अगर इस शिप से थोड़ी भी लीकेज होती है तो श्रीलंका को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
रेडियोएक्टिव समाग्री को लेकर श्रीलंका के पोर्ट में घुसी चीनी शिप
रिपोर्ट के अनुसार हंबनटोटा पोर्ट को ऑपरेट करने वाली चीनी कंपनी ने चीन जा रहे एक जहाज को रुकने की अनुमति दी थी जिसमें रेडियोएक्टिव मैटेरियल्स लदा हुआ है। श्रीलंकाई अधिकारियों को जब इसका पता चला तो उनके होश उड़ गए। उन्होंने तुरंत ही चीन के उस कार्गो शिप को पोर्ट छोड़ने का आदेश दिया है। श्रीलंकाई अधिकारियों का कहना है कि इस शिपिंग कंपनी ने हमारे देश के कानून के अनुसार खतरनाक कार्गो के साथ जहाज को रोकने की अनुमति नहीं ली थी।
श्रीलंकाई सरकार से अनुमति लेना भी जरूरी नहीं समझा
श्रीलंकाई नौसेना के प्रवक्ता कैप्टन इंडिका डी सिल्वा ने ने इस मामले की पुष्टि भी की है। एंटीगुआ और बारबुडा के झंडे वाला यह कार्गो शिप नीदरलैंड के रोटरडम से चीन जाते समय श्रीलंका के हंबनटोटा पोर्ट से मैकेनिकल इमरजेंसी का हवाला देते हुए रुकने की अनुमति मांगी थी। हालांकि, इस जहाज को ऑपरेट करने वाली कंपनी ने यह नहीं बताया था कि शिप पर रेडियोएक्टिव मैटेरियल्स लदा हुआ है। श्रीलंका के परमाणु ऊर्जा अधिनियम के तहत ऐसे किसी भी शिप को सरकार की अनुमति लेना जरुरी है।
खतरनाक मटैरियल है यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड
श्रीलंका परमाणु ऊर्जा नियामक परिषद के महानिदेशक एचएल अनिल रंजीथ ने बताया कि इस जहाज पर यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड लदा हुआ था, जिसे खतरनाक कार्गो की श्रेणी में रखा गया है। यूरेनियम हेक्साक्लोराइड परमाणु सामग्री है जिसे आमतौर पर एक देश से दूसरे देश में ले जाया जाता है लेकिन श्रीलंका के कानून के अनुसार हमारे किसी भी बंदरगाह पर ऐसे जहाजों को रुकने के लिए पहले अनुमति प्राप्त करना जरूरी है। इस पोत ने सरकार से ऐसी कोई मंजूरी नहीं ली थी।
विपक्ष ने लगाया चीनी दबाव में काम करने का आरोप
इस बीच विपक्ष ने श्रीलंकाई सरकार पर हमला बोलते हुए चीन के दबाव में होने का आरोप लगाया। सामंती जन बलवगेया के नेता सजीथ प्रेमदासा ने बुधवार को संसद में यह मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि हमारी नौसेना के अधिकारियों को निरीक्षण करने के लिए चीन जा रहे इस जहाज पर चढ़ने की अनुमति नहीं थी। उन्होंने चीन का नाम लिए बिना कहा कि सरकार एक राजनयिक मिशन के दबाव में प्रतीत होती है।
अगले हफ्ते श्रीलंका आ रहे चीनी विदेश मंत्री
चीन के रक्षा मंत्री जनरल वेई फेंगहे अपनी तीन दिवसीय यात्रा पर अगले सप्ताह श्रीलंका पहुंचेंगे और राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे एवं प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे से मुलाकात करेंगे। जनरल वेई 27 अप्रैल को कोलंबो पहुंचेंगे और कोविड-19 महामारी की शुरुआत के बाद वह देश का दौरा करनेवाले चीन के उच्च स्तर के दूसरे अधिकारी होंगे। अक्टूबर में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के उपाध्यक्ष यांग जिएची ने द्वीप देश की यात्रा की थी।
चीन से 16 हजार करोड़ रुपये का नया कर्ज लेगा श्रीलंका
श्रीलंका ने देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए चीन से फिर 2.2 बिलियन डॉलर (161912080000 रुपये) का नया कर्ज मांगा है। श्रीलंका के मनी एंड कैपिटल मार्केट के मंत्री निवर्द काबराल ने कहा कि अगले दो हफ्तों के भीतर श्रीलंकाई सरकार चीन की सेंट्रल बैंक के साथ 1.5 बिलियन डॉलर के मनी स्वैपिंग की डील भी फाइनल करने जा रही है। श्रीलंका पर चीन का पहले से ही अरबों डॉलर का कर्ज है।
श्रीलंका पर कुल 55 अरब डॉलर का कर्ज
श्रीलंका पर दुनियाभर के देशों का कुल 55 अरब डॉलर का कर्ज है। रिपोर्ट के अनुसार, यह धनराशि श्रीलंका की कुल जीडीपी की 80 फीसदी है। इसमें सबसे अधिक कर्ज चीन और और एशियन डिवेलपमेंट बैंक का है। जबकि इसके बाद जापान और विश्व बैंक का स्थान है। भारत ने श्रीलंका की जीडीपी क 2 फीसदी कर्ज दिया है।
हिंद महासागर में चीन के विस्तार का केंद्र है श्रीलंका
चीन की इंडो पैसिफिक एक्सपेंशन और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) में चीन ने श्रीलंका को भी शामिल किया है। श्रीलंका ने चीन का कर्ज न चुका पाने के कारण हंबनटोटा बंदरगाह चीन की मर्चेंट पोर्ट होल्डिंग्स लिमिटेड कंपनी को 1.12 अरब डॉलर में साल 2017 में 99 साल के लिए लीज पर दे दिया था। हालांकि अब श्रीलंका इस पोर्ट को वापस चाहता है।
महिंदा राजपक्षे के कार्यकाल में चीन से बढ़ी नजदीकियां
महिंदा राजपक्षे के कार्यकाल में श्रीलंका और चीन के बीच नजदीकियां खूब बढ़ी। श्रीलंका ने विकास के नाम पर चीन से खूब कर्ज लिया। लेकिन, जब उसे चुकाने की बारी आई तो श्रीलंका के पास कुछ भी नहीं बचा। जिसके बाद हंबनटोटा पोर्ट और 15,000 एकड़ जगह एक इंडस्ट्रियल जोन के लिए चीन को सौंपना पड़ा। अब आशंका जताई जा रही है कि हिंद महासागर में अपनी गतिविधियों को जारी रखने के लिए चीन इसे बतौर नेवल बेस भी प्रयोग कर सकता है।
-एजेंसियां

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