ट्रिब्यूनल सदस्यों की नियुक्ति हेतु राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग गठित करे केंद्र: SC

नई द‍िल्ली। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एल नागेश्वर राव, जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस एस रविंद्र भट की पीठ ने केंद्र को विभिन्न ट्रिब्यूनलों में सदस्यों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग (National Tribunal Commission) गठित करने का निर्देश दिया है।

राष्ट्रीय आयोग के गठन तक न्यायाधिकरणों की जरूरतों को पूरा करने के लिए कानून और न्याय मंत्रालय में एक अलग विंग का गठन किया जाना चाहिए। बेंच ने ‘ट्रिब्यूनल, अपीलीय ट्रिब्यूनल और अन्य प्राधिकरणों (सदस्यों की सेवा की योग्यता, अनुभव और अन्य शर्तें) नियम, 2020 (‘ ट्रिब्यूनल रूल्स 2020) ‘की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर ये फैसला सुनाया है।

अन्य दिशा-निर्देशों के अंतर्गत चयन समितियों में भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके उम्मीदवार एक वोट देंगे , सम‍ित‍ि की सिफारिशों के 3 महीने के भीतर नियुक्ति की जानी है, 2020 के नियमों का केवल संभावित प्रभाव है। उन नियमों से पहले नियुक्तियां की गई हैं वो पिछले नियमों द्वारा शासित होंगी। इसके अलावा जहां तक ​​अनुशासनात्मक कार्यवाही की बात है, सह चयन समिति फाइनल की सिफारिश अंतिम होगी , 10 साल के अभ्यास वाले वकील न्यायिक सदस्यों के रूप में नियुक्ति के लिए पात्र हैं,  भारतीय विधिक सेवा के सदस्यों को भी जो उसी योग्यता के साथ हैं, न्यायिक सदस्यों के रूप में नियुक्ति के लिए योग्य हैं।

मद्रास बार एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में ‘ट्रिब्यूनल, अपीलीय ट्रिब्यूनल और अन्य प्राधिकरणों (सदस्यों की सेवा की योग्यता, अनुभव और अन्य शर्तें) नियम, 2020 (‘ ट्रिब्यूनल रूल्स 2020) ‘की संवैधानिकता को चुनौती देते हुए रिट याचिका दायर की। वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद पी दातार ने मद्रास बार एसोसिएशन के लिए विस्तृत तर्क दिए थे।

यह तर्क दिया गया है कि ये नियम शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांतों का उल्लंघन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता (दोनों हमारे संविधान की मूल संरचना का हिस्सा हैं) और न्याय के कुशल और प्रभावी प्रशासन के खिलाफ हैं।”

वित्त अधिनियम 2017 की धारा 184 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए केंद्र सरकार द्वारा फरवरी 2020 में नियमों को अधिसूचित किया गया था, सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2017 में बनाए गए इसी तरह के नियमों को रोजर मैथ्यू बनाम साउथ इंडियन बैंक लिमिटेड मामले में नवंबर, 2019 को रद्द करने के बाद संविधान पीठ ने इस मुद्दे को भी बड़ी पीठ के पास भेज कर पूछा था कि क्या आधार अधिनियम को धन विधेयक के रूप में मानने की पूर्वधारणा पर संदेह व्यक्त करने के बाद वित्त अधिनियम 2017 को धन विधेयक के रूप में पारित किया जा सकता है।

– एजेंसी

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