प्रत्यक्ष अनुभव: कल तक जो जितना भोग कर रहा था, आज वह उतना ही दुखी है

कस्यैकान्तं सुखम् उपनतं दु:खम् एकान्ततो वा |
नीचैर् गच्छति उपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण ||

किसने मात्र सुख ही भोगा है और किसने मात्र दुःख। जीवन के चक्र में सुख-दुःख का आवागमन बना ही रहता है।

शास्त्रों में स्पष्ट है कि विपत्ति अर्थात् दुःख या फिर सुख की अनुभूति को भी शान्त चित्त व साम्य भाव से ही स्वीकार करना हितकर है। यदि जीवन में सुख-आनन्द हैं तो प्रभु की कृपा और यदि प्रतिकूलता- दुःख हैं तो हरि इच्छा का भाव रखते हुए स्थिति को अनुकूल बनाने हेतु पुरुषार्थ ही सद्कर्तव्य है।

जन्म (काया) में मृत्यु , लाभ में हानि, जय में पराजय, रूप में कुरूपता, भोगों में रोग, मिलन में वियोग, सुख में दुःख का योग ही हमें “ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या “की अनुभूति कराता है।

इस नाशवान संसार में सुखी कोई नहीं है। जीवन में कोई ना कोई कमी-समस्या रहेंगी अवश्य। हमारी दृष्टि व्यक्ति की उपलब्धियों अथवा दोषों पर ही रहती है, उसके जीवन के दुःख आदि का ज्ञान हमें नहीं हो पाता। किसी के सुन्दर बिछोने को देख कर नहीं कहा जा सकता कि उसको निद्रा भी सुन्दर प्राप्त होती होगी।

संसार कभी किसी को पूर्ण मिला ही नहीं है, यदि फिर भी हम सांसारिक पूर्णता और माया रूपी सुखों की खोज में अपनी अतृप्त आत्मा लिए भटक रहे हैं तो इससे अँततोगत्वा असंतुष्टि और दुःख की ही प्राप्ति होगी।

सुख, शान्ति और भजन-ध्यान के लिए जीवन में आंशिक ही सही, सन्तुष्टि का भाव होना अवश्य चाहिए। सनातन धर्मावलम्बि‍यों के हृदय में इस जीवन और जीवन के बाद की स्थिति का चिन्तन अथवा चिंता रहती अवश्य है क्योंकि सनातन धर्म में मोक्ष का मार्ग कृपा, साधना और कर्मों के आधीन बताया गया है। अतः कर्म करते समय संसार और अध्यात्म दोनों में सामंजस्य बैठाना सहज नहीं है। जीवन में कई घटनाएं हमें धर्म के मार्ग पर प्रेरित करती हैं लेकिन माया का प्रभाव ऐसा है कि हम उसी प्रपंच पथ पर चलते हुए सोचते हैं कि अगले मोड़ से मुड़ जाएँगे, मोड़ छोड़ते जाते हैं और मानव जन्म के उद्देश्य की प्राप्ति से दूर होते जाते हैं।

एक प्रसंग
एक वृद्ध अशक्त लकड़हारा जंगल में लकड़ियाँ काट कर लाता, उससे जो भी प्राप्ति होती उससे ही उसका जीवन यापन होता था। स्त्री-सन्तान-बन्धु-बांधव कोई था नहीं, पेट पालने के लिए श्रम करना उसकी मजबूरी थी। एक दिन उसने लकड़ी का गट्ठर बनाया, लेकिन उसे उठा कर सिर पर रख नहीं पा रहा था।
आसपास कोई दिखा नहीं, दुःखी होकर बोला कि इससे तो मृत्यु तू ही आ जा। उसके पुकारते ही मृत्यु मनुष्य के रूप में उसके समक्ष आ खड़ी हुई।
लकड़हारे ने पूछा आप कौन ? जवाब मिला ”मृत्यु ”! चलो मेरे साथ।
लकड़हारा संभलते हुए बोला ! क्यों ? मैंने तो तुम्हें यह लकड़ियाँ का गट्ठर उठवाने के लिए पुकारा था। यही संसार की गति है।
सुख और दुःख दोनों ही स्थिति में मन रमता संसार में ही है।

किसी के वैभव अथवा प्राप्तियों को देख कर दुःख का भाव उत्पन्न होना अज्ञानता मात्र है। यदि किसी के पास अच्छे जूते नहीं हैं, तो अपना दुःख प्रकट करने से पहले, उनकी तरफ़ भी देख लेना चाहिए, जिनके पैर ही नहीं हैं।

वर्तमान काल में अनित्य और भौतिक सुविधाओं के उपयोग के बिना जीवन सुचारु नहीं रह सकता, क्योंकि कुछ संसाधन तो वर्तमान काल में जीवन के आवश्यक अंग हो गए हैं।

इसका प्रत्यक्ष अनुभव वैश्विक महामारी कोरोना से उत्पन्न वर्तमान परिस्थितियों में हम नित्य कर रहे हैं। जो जितना संसार और साधनों का भोग कर रहा था, उतना ही दुखी भी है। कोई खुले में रह कर धूप आदि के प्रकोप से दुखी है, कोई महल में बंधन में जकड़ा अनुभव कर रहा है। कोई आजीविका में व्यवधान से दुखी है – कोई धन रखा है लेने नहीं जा सकता। अनुभव अलग अलग हो सकते हैं परन्तु भौतिक जीवन में सांसारिक संसाधनों पर निर्भरता सभी समझ रहे हैं।

पुरुषार्थ अथवा परम संतुष्टि भाव से ही दुःख की आवृत्त‍ियों और वेग को कम किया जा सकता है। परम संतुष्टि भाव को प्राप्त करना तो अत्यन्त कठिन है, अतः पुरुषार्थ अवश्य करना चाहिए।

शास्त्रों ने भारतवर्ष के सम्बन्ध में चार पुरुषार्थ: अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष बताए हैं। इनकी प्राप्ति सद्कर्मों एवं लगन के साथ किए प्रयासों से ही सम्भव है।

यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।
एवं परुषकारेण विना दैवं न सिद्धयति॥

भाव यहाँ भी यही है कि बिना पुरुषार्थ-परिश्रम के मात्र भाग्य के सहारे जीवन में अनुकूल प्राप्तियाँ सम्भव नहीं हैं।

अतः परमात्मा का सतत चिन्तन, सन्त जन का सानिध्य एवं पुरुषार्थ से ही इस मानव जीवन की शाश्वत प्राप्तियाँ सम्भव है।

महानुभावसंसर्गः कस्य नोन्नतिकारकः।
रथ्याम्बु जाह्नवीसंगात् त्रिदशैरपि वन्द्यते॥

भाव यह है कि संत जन का सत्संग किसके लिए कल्याणकारी नहीं होता? गंगा के प्रवाह में मिल जाने से अपवित्र जल भी पूजनीय हो जाता है। इसी प्रकार यदि हमारे सद्कर्मों का प्रवाह निरन्तर एवं तीव्र है तो जीवन में दुःख टिक नहीं सकते।

Kapil-sharma-janmabhumi

 

– कपिल शर्मा,
सच‍िव, श्रीकृष्ण जन्मस्थान, मथुरा

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