जन्‍मदिन: आज 84 वर्ष के हो गए दिग्गज कारोबारी रतन टाटा

दिग्गज कारोबारी रतन टाटा आज 84 वर्ष के हो गए हैं। उनका जन्म 28 दिसंबर 1937 को हुआ था। रतन टाटा 1990 से 2012 तक टाटा ग्रुप के चेयरमैन रहे, वहीं अक्टूबर 2016 से फरवरी 2017 तक इंटरिम चेयरमैन रहे। वह टाटा ग्रुप के चैरिटेबल ट्रस्ट को अभी भी हेड कर रहे हैं। रतन टाटा की अगुवाई में टाटा ग्रुप ने नई ऊंचाइयों को छुआ और वैश्विक स्तर पर भी अपना लोहा मनवाया। आइए जानते हैं रतन टाटा ने कैसे की थी अपने करियर की शुरुआत और कैसे लोगों को बनाया अपना कायल…
​टाटा स्टील के शॉप फ्लोर से शुरुआत
रतन टाटा, नावल टाटा के बेटे हैं। नावल टाटा, जमशेदजी टाटा के बेटे सर रतनजी टाटा के गोद लिए हुए बेटे थे। नावल टाटा के बच्चों में रतन टाटा, जिम्मी टाटा और नोएल टाटा शामिल हैं। रतन टाटा और जिम्मी टाटा, नावल टाटा की पहली पत्नी के बेटे हैं, जबकि नोएल दूसरी पत्नी के बेटे हैं। रतन टाटा के पिता और मां का तलाक 1948 में हो गया था। उस वक्त रतन टाटा केवल 10 साल के थे, उन्हें उनकी दादी नवाजबाई ने पाला।
पढ़ाई-लिखाई और करियर की शुरुआत
रतन टाटा ने 8वीं तक की पढ़ाई कैम्पियन स्कूल, मुंबई से की, उसके बाद वह कैथेड्रल एंड जॉन कॉनोन स्कूल, मुंबई और बिशॉप कॉटन स्कूल, शिमला में पढ़े। 1955 में उन्होंने रिवरडेल कंट्री स्कूल, न्यूयॉर्क से ग्रेजुएशन किया। 1959 में कॉरनेल यूनिवर्सिटी से आर्किटेक्चर में डिग्री हासिल की और 1975 में हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के 7 वीक एडवांस्ड मैनेजमेंट प्रोग्राम को जॉइन किया।
रतन टाटा अपने ग्रुप से साल 1961 में जुड़े। अपने करियर की शुरुआत में वह टाटा स्टील के शॉप फ्लोर पर काम करते थे। 1991 जेआरडी टाटा के रिटायर होने के बाद वह ग्रुप के चेयरमैन बने। रतन टाटा 1970 के दशक में ग्रुप के मैनेजमेंट में शामिल हुए।
जब पहली बार मनवाया अपने बिजनेस स्किल्स का लोहा
1971 में रतन टाटा को राष्ट्रीय रेडियो एंड इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी लिमिटेड (नेल्को) का डायरेक्टर-इन-चार्ज नियुक्त किया गया। उस वक्त कंपनी बेहद ज्यादा वित्तीय कठिनाई की स्थिति में थी। रतन टाटा ने सुझाव दिया कि कंपनी को उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स के बजाय उच्च-प्रौद्योगिकी उत्पादों के विकास में निवेश करना चाहिए। जेआरडी टाटा नेल्को के ऐतिहासिक वित्तीय प्रदर्शन की वजह से अनिच्छुक थे क्योंकि इसने पहले कभी नियमित रूप से लाभांश का भुगतान नहीं किया था। इसके अलावा, जब रतन ने कार्य भार सम्भाला, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स नेल्को की बाजार में हिस्सेदारी 2% थी और घाटा बिक्री का 40% था। फिर भी जेआरडी टाटा ने रतन के सुझाव का अनुसरण किया।
इसके बाद 1972 से 1975 तक, आखिरकार नेल्को ने अपनी बाजार में हिस्सेदारी 20% तक बढ़ा ली और अपना घाटा भी पूरा कर लिया। लेकिन कंपनी के भाग्य में कुछ और ही लिखा था। 1975 में, भारत की प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी जी ने आपात स्थिति की घोषित कर दी, जिसकी वजह से आर्थिक मन्दी आ गई।इसके बाद 1977 में यूनियन की समस्यायें हुईं, इसलिए मांग के बढ़ जाने पर भी उत्पादन में सुधार नहीं हो पाया। अन्ततः, टाटा ने यूनियन की हड़ताल का सामना किया, सात माह के लिए तालाबन्दी कर दी गई। रतन ने हमेशा नेल्को की मौलिक दृढ़ता में विश्वास रखा, लेकिन उद्यम आगे और बरकरार न रह सका।
1977 में मिली Empress Mills की कमान
1977 में रतन टाटा को Empress Mills को सौंपा गया, यह टाटा नियन्त्रित कपड़ा मिल थी। जब उन्होंने मिल का कार्य भार सम्भाला, यह टाटा समूह की बीमार इकाइयों में से एक थी। रतन ने इसे सम्भाला और यहां तक की लाभांश की घोषणा कर दी। उस वक्त कम श्रम गहन उद्यमों की प्रतियोगिता ने एम्प्रेस जैसी कई उन कंपनियों को अलाभकारी बना दिया था, जिनकी श्रमिक संख्या बहुत ज्यादा थी और जिन्होंने आधुनिकीकरण पर बहुत कम खर्च किया था। रतन टाटा के आग्रह पर कुछ निवेश किया गया, लेकिन यह पर्याप्त नहीं था। चूंकि मोटे और मध्यम सूती कपड़े के लिए बाजार प्रतिकूल था (जो कि एम्प्रेस का कुल उत्पादन था), एम्प्रेस को भारी नुकसान होने लगा।
बॉम्बे हाउस जो टाटा मुख्यालय है, अन्य ग्रुप कंपनियों से फंड को हटाकर ऐसे उपक्रम में लगाने का इच्छुक नहीं था, जिसे लम्बे समय तक देखभाल की आवश्यकता हो। इसलिए कुछ टाटा निर्देशकों, मुख्यतः नानी पालकीवाला ने यह फैसला लिया कि टाटा को मिल समाप्त कर देनी चाहिए। अन्त में मिल को 1986 में बन्द कर दिया गया। रतन इस फैसले से बेहद निराश थे। उन्होंने बाद में एक साक्षात्कार में दावा किया कि एम्प्रेस मिल को जारी रखने के लिए सिर्फ 50 लाख रुपये की जरुरत थी।
क्यों वाकई में टाटा ग्रुप के ‘रत्न’ हैं रतन टाटा
वर्ष 1981 में रतन, टाटा इंडस्ट्रीज और समूह की अन्य होल्डिंग कंपनियों के अध्यक्ष बनाए गए। 1991 में जेआरडी टाटा के रिटायर होने के बाद रतन टाटा ग्रुप के चैयरमैन बने। रतन टाटा की अगुवाई में ग्रुप का कारोबार भारत से बाहर निकलकर ग्लोबल बिजनेस में तब्दील हुआ। वरना पहले टाटा ग्रुप बड़े पैमाने पर इंडिया सेंट्रिक था। इंटरनेशनल लेवल पर ग्रुप की पहचान बनाने की दिशा में टाटा टी ने टेटली को, टाटा मोटर्स ने जगुआर लैंड रोवर को और टाटा स्टील ने कोरस का अधिग्रहण किया। रतन के मार्गदर्शन में, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज सार्वजनिक निगम बनी और टाटा मोटर्स न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हुई। 1998 में टाटा मोटर्स ने उनके संकल्पित टाटा इंडिका को बाजार में उतारा।
31 जनवरी 2007 को रतन टाटा की अध्यक्षता में, टाटा संस ने कोरस समूह को सफलतापूर्वक अधिग्रहित किया, जो एक एंग्लो-डच एल्यूमीनियम और इस्पात निर्माता है। इस अधिग्रहण के साथ रतन टाटा भारतीय व्यापार जगत में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति बन गए। इस विलय के फलस्वरूप दुनिया को पांचवां सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक संस्थान मिला। रतन टाटा की अगुवाई में टाटा ग्रुप का रेवेन्यु 40 गुना बढ़ा और मुनाफा 50 गुना। रतन टाटा ने 28 दिसंबर 2012 को टाटा ग्रुप में अपनी एग्जीक्यूटिव पावर को छोड़ दिया।
जब लखटकिया कार का देखा सपना
रतन टाटा का सपना था कि वह लोगों के लिए एक लखटकिया कार लेकर आएं। यानी ऐसी कार जिसकी कीमत 1 लाख रुपये हो। रतन टाटा का यह सपना 10 जनवरी 2008 को पूरा हुआ, जब टाटा की नैनो कार का नई दिल्ली में ऑटो एक्सपो में उद्घाटन हुआ। हालांकि यह कार उम्मीद के मुताबिक सक्सेसफुल नहीं हो सकी और साल 2018 में कंपनी ने इसका उत्पादन बंद कर दिया।
हमेशा युवा टैलेंट को सराहा
जेआरडी टाटा की जगह रतन टाटा का आना कई कंपनी हेड्स को पसंद नहीं आया। इनमें से कई ऐसे थे, जो उन कंपनियों में कई दशक बिता चुके थे और जेआरडी टाटा के अंडर संचालन की आजादी के चलते बेहद पावरफुल और प्रभावशाली हो चुके थे। रतन टाटा ने भूमिका संभालने के बाद एक रिटायरमेंट ऐज निर्धारित की और उन लोगों को रिप्लेस करना शुरू किया। उन्होंने इनोवेशन और युवा टैलेंट को प्राथमिकता देना शुरू किया और उन्हें जिम्मेदारियां दीं।
ये उपलब्धियां हैं नाम
रतन टाटा हमेशा से शिक्षा, मेडिसिन और ग्रामीण विकास के सपोर्टर रहे हैं और उन्हें देश के दिग्गज दानवीरों में गिना जाता है। वह ट्रेड व इंडस्ट्री पर प्रधानमंत्री की काउंसिल के सदस्य हैं। साथ ही नेशनल मैन्युफैक्चरिंग कॉम्पिटीटिवनेस काउंसिल के भी सदस्य हैं। इसके अलावा वह कई इंटरनेशनल यूनिवर्सिटीज, स्कूल, कंपनियों व संस्थानों के बोर्ड और ट्रस्टीज में भी शामिल हैं। रतन टाटा को साल 2000 में पद्म भूषण और 2008 में पद्म विभूषण मिला था।
-एजेंसियां

50% LikesVS
50% Dislikes

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *