अप्प दीपो भव: ढोंगी देवदत्तों को पहचान कर स्वयं अपने बुद्ध बनो

धर्मस्य फलमिच्छन्ति धर्मं नेच्छन्ति मानवाः ।
फलं पापस्य नेच्छन्ति पापं कुर्वन्ति सादराः ॥

सभी को धर्म के उत्तम फल प्राप्ति की कामना तो रहती परन्तु धर्म सम्मत आचरण बना रहे, इसके लिए गम्भीरता कम ही दिखती है। पाप के परिणाम का स्मरण भी करना नहीं चाहते किंतु पापकर्म करने में कोई संकोच भी नहीं होता और आश्चर्य ही है कि आत्मवलोकन न कर धर्म की परम्पराओं और मान्यताओं के प्रति ही संदेह प्रकट होता रहता है। धार्मिक क्रियाकलापों एवं अनुष्ठानों में शोर गुल तो बहुत हो रहा है किंतु मूल भाव के दर्शन दुर्लभ हो गए हैं।

भौतिकवादी सोच से पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म का निर्णय हो रहा है। धर्म में भी किसी हद तक व्यापार समाविष्ट हो गया है, “इस हाथ दे और उस हाथ ले” सौदे हाथों हाथ निपट रहे हैं। यदि सांसारिक पाप- प्रपंचों में लगे रह कर पुण्यात्मा, दानवीर, महात्मा आदि अलंकारों से विभूषित हो रहे हैं तो क्या आवश्यकता है धर्म के स्वरूप को जानने-पहचानने अथवा धारण करने की। भौतिक युग में धर्म के नाम पर थोड़ा बहुत ले दे कर ही, जब बिना किसी जप -तप, साधन-भजन के, धर्म की समस्त उत्तम प्राप्तियों के आश्वासन और अलंकार बैठे बिठाए मिल जा रहे हैं तो क्या आवश्यकता है “मनसा वाचा कर्मणा “ धर्म को धारण करने की अथवा कहें कि ढोने की ? मनुष्य बहुत ही सुविधावादी हो चला है, अपने सांसारिक भोगों एवं भोगमय जीवन में व्यवधान डाले बिना, धर्म के अनुशासन से मुक्ति, यदि युक्ति से ही निकल रही है तो अहोभाग्य।

क्या चतुर युक्ति धर्म मार्ग में कारगर होंगी अथवा भ्रम का घेरा मज़बूत हो रहा है ? सत्य यही है कि आलसी शरीर में लोभी मन सारा खेला कर रहा है। यदि दुर्लभ प्राप्तियाँ , आसानी से ही मिल रहीं हैं तो खोज अथवा परिश्रम क्यों करें । जब सांसारिक जीवन जुगाड़ से ही चल रहा है, तो धर्म के लिए भी ऐसे ही किसी मार्ग की खोज रहेगी। यदि सत्य रूपी धर्म का कोई सस्ता मार्ग मिल जाए या कहें मुफ़्त में ही मिल जाए तो क्या कहने ! अहोभाग्य – धन्यभाग्य ; ऐसी भावना तो मन में आएगी ही। यह भी सत्य है क‍ि सांसारिक हो अथवा आध्यात्मिक, देश-काल-परिस्थितियों के अनुसार मार्ग में कुछ तालमेल बिठाने पड़ सकते हैं किंतु स्मरण रखना चाहिए कि धर्म के मूल भाव से छेड़ छाड़ तो धर्म के स्वरूप को ही बिगाड़ देगी।

एक बात निश्चित है सच्चे धर्म मार्ग की प्राप्ति के लिए कोई जुगाड़ नहीं बना है। यदि जुगाड़ बैठा रहे हो अथवा कोई समझा रहा है तो सावधान हो जाना चाहिए, यही तो माया रूपी भ्रम का घेरा है। यह मार्ग तो त्याग और अनुशासन का मार्ग है और अहंकार और विकारों से मुक्त हुए बिना नही मिलता।

बहुत प्रचलित कहानी है किंतु इसमें निहितार्थ बहुत गूढ़ है।
एक अंधा और एक लंगड़ा व्यक्ति जंगल की आग में फँस गए थे, दोनों को उस स्थान से निकलना था। दोनों ने एक सौदा किया, लँगड़ा अन्धे के कंधों पर सवार हो गया। लँगड़ा देख रहा है और अंधा चल रहा है और दोनों जंगल से बाहर निकल गए। परस्पर सहयोग से दोनों का काम बन गया। संसार के लिए यह कहानी यथार्थ के बहुत क़रीब है। भाव को समझें तो यहां अंधों और लंगड़ों में बहुत सौदे होते हैं, बहुत साझेदारी होती हैं। संसार के लिए यह बड़ा व्यवहारिक प्रसंग है परंतु आध्यात्मिक मार्ग के लिए नही। जीवन के परम सत्य तक पहुँचने का ऐसा कोई उपाय नहीं है। वहाँ किसी और की आंख से नहीं देख सकते हो, इसलिए अपनी आँखे खुली होनी चाहिए। किसी और के कंधे पर चढ़ कर पहुँच नहीं सकते हैं , इसलिए अपने पैरों पर ही चलना पड़ेगा। इस मार्ग में खरा सौदा ही होगा, अपनी पूँजी चाहिए , उधारी की तो कोई व्यवस्था ही नहीं है।
देखोगे कि पाप पुण्य के गणित में बिना उलझे हुए, इन पापकर्मों में लिप्त व्यक्ति भी निर्भीकतापूर्वक अपने कर्मों में बढ़चढ़ कर लगा हुआ है क्योंकि उसको भ्रम है कि कुछ ले देकर अपने पाप धो लूँगा। धर्मों में इस प्रकार के लेनदेन के अब तक तो अनेकों नामकरण हो चुके हैं।

धर्म मार्ग में भी खूब सौदे हो रहे हैं , यह भी सम्भव है किसी ने उसे परम धाम की टिकिट थमा दी हो और उसी कल्पना में वो भयमुक्त कर्मों में लगा है। ऐसे सपनों के सौदागर खोजना कोई बड़ी बात तो है नहींं।

कभी किसी को मछली पकड़ते देखा है? लोहे के काँटे के आगे आटा लगा देते हैं। मछली में भी अक़्ल है, काँटे से तो वो दूर ही भागती है, मगर आटे के लालच में काँटे को भी लपक लेती है। जब समझ आता है कि काँटे में अटक गयी, तब तक तो बहुत देर हो चुकी है और अब निकलने का कोई उपाय भी नहीं है। अंततः मछली मृत्यु तक छटपटाती रहती है, पछताती रहती है। ऐसे विक्षुब्द काल में न तो ऐसी मछल‍ियों की कमी है और न मछुआरों की। पाखंड भी धर्म के ही आवरण में सम्भव है, कोरे पाखण्ड के तो कोई पास भी नहीं फटकेगा।

गीता के पुरोधा परब्रह्म परमात्मा श्री कृष्ण को गीता, शास्त्र, पुराण, वेद सुनाने से क्या लाभ होगा ? जिस प्रकार चकमक पत्थर की रगड़ से निकलने वाली चिंगारी अग्नि रूप धारण कर लेती है , इसी प्रकार इन दिव्य शास्त्रों के श्रवण मनन चिंतन से हृदय को इतना रगड़ें कि अंतस में ईश्वर के लिए प्रेम का दीप जला सकें और यही इस मनुष्य जीवन की सार्थक उपलब्धि भी होगी।

यदि हृदय में प्रभु प्रेम का दिया जला लिया तो अंतः और बाह्य दोनों अंधियारे तत्काल मिट जाएँगे और यही रहस्य इन दिव्य शास्त्रों में छुपा है। विचार उठता है कि सदियों से अनेकानेक महापुरुष हुए – संत हुए और इनके अंतः में निरंतर प्रज्वलित दीपक के आलोक में जगत आलोकित भी हुआ। कहाँ चूक गए हम कि इतने दीपक सदियों से जल रहे हैं और आज भी उनकी आभा, उनका प्रकाश शाश्वत है – सत्य है , फिर भी संसार में तो चारों ओर घनघोर अंधकार ही दिखायी दे रहा है और उसी अंधेरे में प्रायः सभी हाथ पैर मार रहे हैं। अशांत जीवन में रोग- शोक की भरमार है, सब कुछ अनिश्चित है और जीवन भ्रम और अनुमान के सहारे कट रहा है।

उसी अंधेरे में प्रायः सभी हाथ पैर मार रहे हैं। अशांत जीवन में रोग- शोक की भरमार है, सब कुछ अनिश्चित है और जीवन भ्रम और अनुमान के सहारे कट रहा है।

महात्मा गौतम बुद्ध और देवदत्त
देवदत्त, महात्मा गौतम बुद्ध का चचेरा भाई था। बचपन में साथ खेले , साथ बड़े हुए, सिद्धार्थ बुद्ध हो गए और देवदत्त संसार में ही लिप्त बना रहा। बुद्ध तथागत हो गए, परम ज्ञान को प्राप्त किया और भगवान बुद्ध के असंख्य अनुयायी बन गए थे। देवदत्त के मन में बुद्ध की उस अवस्था को देख बड़ी ईर्ष्या होने लगी, उसे अपनी सारी सम्पत्ति और उपलब्धियाँ बुद्ध के तेजोमय स्वरूप के सामने फीकी लगने लगी। उसने स्वयं बुद्ध बनने की ठानी और सोचा जो महात्मा बुद्ध कर सकते हैं , वो मैं भी तो कर सकता हूँ। देवदत्त बुद्ध के पास आया और उनसे दीक्षा ग्रहण की। इस दीक्षा में धूर्त प्रयोजन था, चालबाज़ी थी। सोच रहा था कि बुद्ध की शक्तियों और प्रतिष्ठा का राज क्या है ? उनका आचार -विचार -व्यवहार -भोजन -व‍िश्राम के क्या नियम हैं ? सोचा थोड़ी जानकारी हो जाएगी तो स्वयं बुद्ध बनने में आसानी रहेगी। चालक और होशियार था देवदत्त , चार – छह महीने में देख समझ लिया कि बुद्ध कैसे चलते, बोलते, उठते, बैठते हैं। देवदत्त का अंतः तो स्याह था , सम्पूर्ण अज्ञानी था परंतु चाल -ढाल , उठना -बैठना बहुत व्यवस्थित था और बोलता भी बहुत मीठा था। भाषा और वचन परिमार्जित थे, भाषा , विश्लेषण और तर्क से विद्धता का प्रवाह होता था। तर्क और विश्लेषण भी शास्त्रों से ही निकलते थे।अंधभक्तों की भीड़ में हज़ार- पाँच सौ अनुयायी ढूढ़ना कोई विशेष बात तो है नहीं, सो देवदत्त को भी अनुयायी मिल गए। अब देवदत्त का असली अहंकार प्रकट हुआ। घोषणा कर दी कि मैं भी “बुद्ध” हूँ और अपना अलग धर्म बना लिया। झूठ था, आडम्बर था उसके आसपास इसलिए उसके अनुयायी भी छिटकते गए और जीवन में असंतोष भर गया।
देवदत्त की मृत्य बड़े कष्ट में हुयी थी, ग्लानि में मरा कि एक सुन्दर अवसर खो दिया – मनुष्य जन्म व्यर्थ कर दिया। बाहर दीपक जलाए घूमता रहा, प्रकाश का प्रदर्शन करता रहा, परंतु अंतः में दीप नहीं जला सका। बाह्य आवरण को कितना भी व्यवस्थित कर लो, भाषा शैली उत्तम सीख लो, ढोंग प्रपंच कर लो, कमंडल उठा लो, माला-झोली पकड़ लो, वेश धारण कर लो! ढोंग- अभिनय से कुछ लाभ नहीं होगा और न ही इससे अंतः का अंधकार मिटेगा। बाहरी आवरण तो नक़ली दिए के समान है, एक दीपक की तस्वीर पर भले ही हीरे जवाहरात जड़ कर कमरे में टांग दो लेकिन अंधेरा नही छँटेगा। नक़ली दीया चाहे तो टके का दीखे अथवा अनमोल , अंधेरा नहीं हटा सकता। दीपक तो खरा होना चाहिए तभी जलेगा और अंधियारा मिटेगा। अपने अंतः में ज्ञान का दीप स्वयं प्रज्वलित करना ही पड़ेगा , बुद्ध ने परम सत्य उद्घाटित किया है “अप्प दीपो भव”। जब तुम्हारे पास अपना दीपक होगा, अंतः जगमगा रहा होगा और तभी “तथागत”और “देवदत्त ” के अंतर को समझ सकोगे। जब हृदय में प्रभु प्रेम का दीपक जल रहा है तो असली-नक़ली का भेद तुरन्त प्रकट हो जाएगा, संसार सागर में अनेकों दिव्य रत्न स्वरूप साधु संत और महापुरुष उपस्थित हैं , सावधान बने रहे तो सच्चे को स्वयं खोज लोगे।

शराबी की लालटेन

काम क्रोध लोभ मोह के मद में अर्ध मूर्छित घूम रहे हो और यदि सावधान नही हुए तो यह ढोंगी “देवदत्त” तो सम्पूर्ण मूर्छित कर देगा। सावधानी से मार्ग पर चलो! अपना दीपक स्वयं बनो।
संध्या का समय था, एक शराबी अपनी लालटेन लेकर मधुशाला पहुँचा , इस डर से कि लौटने में देर हो जाएगी और अंधेरी रात है। जब छक गया तो अपनी लालटेन उठाई और चल पड़ा वापस। शराब के मद में मूर्छित सा, लड़खड़ाते कदम, कभी पेड़ से टकरा रहा है, कभी दीवाल से, कभी नाली में गिर रहा है। बीच बीच में थोड़ा सम्भले, होश आए तो सोचे कि माजरा क्या है ? लालटेन मेरे हाथ में है तो रास्ता दीख क्यों नहीं रहा है।
लालटेन की रोशनी को क्या हुआ ? सुबह शराबघर का मालिक आया और उसको जगा कर कहा “यह पकड़ो अपनी लालटेन ” कल रात को तुम अपनी लालटेन छोड़ आए और मेरा तोते का पिंजरा उठा लाए थे। मद में चूर मूर्छित आदमी को क्या ज्ञान कि तोते का पिंजरा लिए घूम रहा है या लालटेन। जब तक व्यक्ति मूर्छित है, मद में चूर है, तब तक उसके हाथ में तोते के पिंजरे ही हैं, अब वो भले ही उनको शास्त्रों और पवित्र पुस्तकों के नाम दे दे। मदांध-मूर्छित के हाथ में ज्ञान रूपी लालटेन हो ही नहीं सकती और जिसके पास लालटेन है वो मूर्छित-मदांध होगा नहीं।
सम्भव है कि कभी विशिष्ट कृपा हो जाये! कोई गुरु-संत , लालटेन जला कर पकड़ा दें, फिर भी कितनी देर तक उसको सम्भाल पाएँगे ? अंतः में जो वासनाओं की लहरें उठ रहीं हैं, अहंकार का तूफ़ान चल रहा है! यह पराई लालटेन की रोशनी से नही थमेंगे , अपनी लालटेन होनी चाहिए, अपना दीप जलना ही चाहिए। इसी आधारभूत भूल में हमारा भटकाव का कारण छुपा है।अब तो जागना ही चाहिए क्योंकि सम्भव है कि व्यर्थ गंंवाने को समय ही नहींं बचा हो अब।
बिना सत्य को पहचाने उत्तम मार्ग मिल नहीं सकता और सत्य बिना अहंकार को त्यागे दिखेगा नहीं। अहंकार और इस अंधेरे में बहुत छनती है। यदि अहंकार नहीं रहा तो यह अंधेरा भी भाग जाता है।

ज्ञान का प्रकाश कहता है कि “मैं” तुम हटो तो अंतः में प्रवेश करूँ और अंधकार कहता है कि “मैं” तुम मज़े से रहो क्योंकि  बिना तुम्हारे कैसे टिकूँगा। जैसे सूर्योदय होते ही अंधकार हट जाता है वैसे ही अंतः में प्रकाश होते ही आध्यात्मिक भ्रम टूट जाते हैं और ढोंगी “देवदत्त “समीप भी नहीं टिक सकते।
जीवन के सिद्धांत एकदम उलट हैं , यदि देवदत्त अंतः में बुद्ध हो  जाता तो बाहर से तो स्वतः हो जाता। बाहरी आचरण से अंतः प्रभावित नही होता किंतु अंतः भाव बाह्य जीवन में स्वतः प्रकट होता रहेगा, बिना किसी प्रयास बिना किसी योजना के।

यद्वै तत् सुकृतम्। रसो वै सः, रसँ ह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति

जीवन का सार भगवान श्री कृष्ण की प्रेममय लीलाओं में निहित है। दम्भ और मद का त्याग कर रसमय हो जाओ-प्रीतमय हो जाओ-प्रेममय हो जाओ, अपने अंतस में प्रेमभाव जगाओ। यदि जीवन में परमात्मा से सच्चा प्रेम हो गया तो अनन्त रसमय ब्रह्म का तुम्हारे जीवन में प्रवेश हो जाएगा। जीवन में एक पूर्णता और तृप्ति का अनुभव होगा। जीवन में शाश्वत संतुष्टि का भाव और सच्चा संतोष प्रकट होगा।
कदाचित स्वयं के जीवन में जिस संतोष के दर्शन हो रहे हैं, यदि ध्यान से देखें तो समझ सकते हैं कि जिस भाव को संतोष मान रहे हैं, वह प्रायः मन को मार कर अथवा समझा बुझा कर प्राप्त अवस्था मात्र है।
ऐसे दिव्य “रस” की प्राप्ति तभी होगी, जब अंतः रसमय-प्रेममय होगा और यही होगी “रसिक” अवस्था।
जब यह अवस्था मिल जाएगी तो स्वयं रसमय-रासमय होकर महारास के अलौकिक आनंद में अभिभूत होते रहोगे और स्वयं नाच रहे होगे , गोते लगा रहे होगे उस अनंत -विराट अनुपम रस के सागर में, अपने दीपक स्वयं बन प्रकाशित होते रहोगे। जब यह दीपक जल उठेगा तो ढोंगी “देवदत्त” स्वयं भाग खड़े होंगे, अंतस का अंधियारा मिट जाएगा और फिर कोई ढोंगी “देवदत्त” राम के नाम पर भीड़ जुटा कर “अली मौला” नहीं सुना पाएगा, तुमको भ्रमित कर सत्य से दूर नहीं कर पाएगा।

Kapil-sharma-KJS-Mathura

 

– कप‍िल शर्मा,

सच‍िव , श्रीकृष्ण जन्मस्थान, मथुरा

 

 

 

 

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