सारे सवाल बेमानी: सवाल सिर्फ एक, क्‍या पुलिस का ज़मीर जाग गया है ?

यूं तो पुलिस की हर मुठभेड़ न सिर्फ शक के दायरे में रहती है बल्‍कि उसके साथ तमाम सवाल भी खड़े हो जाते हैं।
संभवत: इसीलिए पुलिस एनकाउंटर के दौरान हुई हर मौत की निष्पक्ष, प्रभावी और स्वतंत्र जांच के लिए कुछ नियम निर्धारित किए गए हैं।
जैसे पूरे घटनाक्रम की एक स्वतंत्र जांच सीआईडी से या दूसरे पुलिस स्टेशन की टीम से किसी एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की निगरानी में कराना।
यह वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, उस एनकाउंटर में शामिल सबसे उच्च अधिकारी से भी एक रैंक ऊपर का होना।
इसके अलावा धारा 176 के अंतर्गत पुलिस फ़ायरिंग में हुई प्रत्‍येक मौत की मजिस्ट्रियल जांच भी जरूरी है। जिसकी एक रिपोर्ट न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास भेजी जाती है।
ऐसे में कानपुर शूटआउट के सरगना विकास दुबे की पुलिस एनकाउंटर में मौत पर सवाल उठना सामान्‍य सी बात है, इसलिए यहां सवाल एनकाउंटर पर न उठाकर इस बात पर किया जाना चाहिए कि क्‍या कानपुर कांड के बाद वाकई पुलिस का ज़मीर जाग गया है ?
अथवा ये सभी एनकाउंटर आठ पुलिसकर्मियों की शहादत से उपजा कोई ऐसा तात्‍कालिक क्रोध है, जिसका गुबार कुछ दिनों बाद स्‍वत: बैठ जाएगा।
यही एकमात्र सवाल ऐसा है जिसमें पुलिस की कार्यशैली पर उठने वाले सभी सवालों के जवाब निहित हैं।
इसी सवाल में निहित है कि कैसे कोई विकास दुबे पुलिस की नाक के नीचे फल-फूलकर इतना दुस्‍साहसी हो जाता है कि उसके अंदर खाकी का कोई खौफ नहीं रह जाता। यहां तक कि वह पुलिस पर पूरी प्‍लानिंग के साथ हमला करने से भी नहीं चूकता।
कैसे वो कानून-व्‍यवस्‍था और शासन-प्रशासन से इतर अपनी एक ऐसी समानांतर सत्ता कायम कर लेता है कि आमलोग भी न्‍याय की गुहार उसके दरबार में जाकर लगाने लग जाते हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं कि पुलिस की एक बड़ी समस्‍या राजनीति का अपराधीकरण या अपराधियों का राजनीतिकरण हो जाना है, परंतु इसका यह कतई मतलब नहीं कि पुलिस अपने कर्तव्‍य से इस कदर विमुख हो जाए कि उसका अस्‍तित्‍व ही तक दांव पर लगता दिखाई दे।
विकास दुबे ने 2/3 जुलाई की मध्‍य रात्रि में दरिंदगी का जो घिनौना खेल खेला, वो चंद घंटों के अंदर उपजी मनोवृत्ति का परिणाम नहीं था। वह उसे राजनीतिक गलियारों के साथ-साथ पुलिस से भी अनवरत मिलते रहे उस खाद-पानी की परिणिति थी जिसने उसे इंसान से हिंसक जानवर बनाने में मदद की।
घटना वाले दिन से ही यह एकदम साफ था कि पुलिस ने ही पुलिस की मुखबिरी की, क्‍योंकि बिना पूर्व सूचना के इतनी तैयारी के साथ हमला कर पाना संभव ही नहीं था। हालांकि पुलिस को इस बात का पताना लगाने में भी कई दिन लग गए और उसके बाद भी गाज गिरी तो एक एसओ और एक एसआई पर जिन्‍हें निलंबित किया गया है।
रहा सवाल पूरे चौबेपुर थाने के दूसरे पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर करने या सीओ के पत्र को दबाकर बैठ जाने वाले तत्‍कालीन एसएसपी कानपुर के तबादले का तो उसे कार्यवाही नहीं माना जा सकता।
दलगत राजनीति और आदतन सवाल उठाने वालों की बात अगर छोड़ दी जाए तो विकास दुबे और उसके साथियों का पुलिस ने जो हश्र किया, उससे किसी को कोई परेशानी नहीं है।
सच तो यह कि अधिकांश लोग खुश हैं, लेकिन ये खुशी तब अहमियत रखती है जब पुलिस अपने यहां से विपिन तिवारी तथा केके शर्मा जैसों सहित अनंतदेव जैसे आईपीएस अधिकारियों को भी चिन्‍हित कर खाकी पर चिपकी गंदगी साफ करने का बीड़ा उठाए।
बेशक ये काम बहुत कठिन है और इसके लिए राजनीतिक गलियारों में पल रहे सफेदपोश अपराधियों से भी टक्‍कर लेनी पड़ सकती हैं परंतु असंभव कतई नहीं है।
बस आवश्‍यकता है तो इस बात कि पुलिस अपनी इच्‍छाशक्‍ति दृढ़ कर ले और ठान ले कि अपराधी चाहे वर्दी में छिपा हो या समाज में, उसे सहन नहीं किया जाएगा।
ये काम असंभव इसलिए भी नहीं है कि स्‍वच्‍छ छवि वाले राजनेताओं को शायद ही इसमें कोई दिक्‍कत हो, और जिन्‍हें दिक्‍कत है वो हर हाल में पुलिस के लिए सिरदर्द ही साबित होते हैं।
हां, इतना जरूर है कि पुलिस को इसके लिए बाकायदा अभियान चलाकर ऐसी ही एकजुटता का प्रदर्शन करना होगा जैसा कि विकास दुबे के गैंग को नेस्‍तनाबूद करने के लिए दिखाई गई और तय किया गया कि चाहे जैसे भी व जितने भी सवाल उठेंगे, उनका जवाब दे दिया जाएगा।
विकास दुबे व उसके अधिकांश गुर्गे बेशक उसी दुर्गति को प्राप्‍त हुए जिसके वो हकदार थे लेकिन सही न्‍याय तब माना जाएगा जब इसी आत्‍मबल, साहस एवं एकजुटता के साथ खाकी और खद्दर के पीछे छिपे दुर्दांत अपराधियों को भी कठघरे में खड़ा किया जाए क्‍योंकि उनका अपराध किसी भी तरह विकास दुबे व उसके गुर्गों से कम नहीं है।
हकीकत तो यह है कि पर्दे के पीछे ही सही, लेकिन वो सब भी विकास दुबे के गैंग का हिस्‍सा हैं इसलिए ‘विकास दुबे’ तभी सही अर्थों में समाप्‍त होगा, जब वो सब भी अपनी-अपनी नियति को प्राप्‍त होंगे।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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