आरुषि-हेमराज मर्डर केस: हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले पर उठाए गंभीर सवाल

इलाहाबाद। आरुषि-हेमराज की मर्डर मिस्ट्री के फैसले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के निर्णय पर जहां कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं वहीं तमाम महत्वपूर्ण और चौंकाने वाली टिप्पणियां भी की हैं। डबल मर्डर के आरोप से आरुषि के माता-पिता (तलवार दंपत्ति) को बरी करने के साथ हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के लिए ‘फैसला लेते वक्त ध्यान देने लायक सलाहें’ दी हैं। पूरे जजमेंट में जहां पुलिस और सीबीआई जांच की खामियां उधेड़ी गई हैं, खासतौर पर अलग पैराग्राफ में ट्रायल कोर्ट के जजमेंट पर करारे ‘कॉमेंट’ किए हैं।
हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है ट्रायल कोर्ट ने संवेदनशील क्रिमिनल केस में न्याय के मूलभूत सिद्धांतों का पालन न कर किसी मैथ टीचर या फिल्मी डायरेक्टर जैसी भूमिका निभा दी। ट्रायल कोर्ट ने जिन्हें परिस्थितिजन्य साक्ष्य माना, वह असल में ‘कल्पना’ साबित हुए। आरुषि और हेमराज के मर्डर के समय सिर्फ तलवार दंपत्ति ही घर में थे, इसी बिनाह पर पेश परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को स्वीकार करके जजमेंट दिया गया जबकि बचाव पक्ष की इस थिअरी को एक सिरे से नजरंदाज कर दिया कि घर में कोई तीसरा भी हो सकता है।
हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों और केस की परिस्थितियों को स्वीकार किया और गणित का सवाल हल करने की तरह नतीजे तक पहुंच गए। असल में यहां-वहां बिखरे तथ्यों को एक कड़ी में पिरोया, फिर विचार किया कि वास्तव में क्या हुआ, इस तरह निर्णय दिया गया। सवाल यही है कि ट्रायल कोर्ट की भूमिका मैथ टीचर जैसी नहीं है, न ही किसी फिल्मी डायरेक्टर जैसी है, जिसने कल्पना कर ली कि आरुषि और हेमराज को साथ देखकर तलवार दंपत्ति ने डबल मर्डर को अंजाम दिया होगा।
यह स्वीकार्य तथ्य है कि उस रात वहां क्या हुआ, उसकी पुष्टि करने के लिए कोई गवाह या पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं। परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को अंदाजे (गेस वर्क) के आधार पर नहीं स्वीकार किया जा सकता। हाई कोर्ट ने कहा कि यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में कोर्ट को अत्यंत सावधानी के साथ कार्य करना चाहिए।
-एजेंसी