हौसले की मशाल….अनुपम मिश्र के जन्मद‍िन पर एक गीत

अनुपम मिश्र… पानी के मास्टर, नदियों के प्रोफेसर, जल-जमीन-जंगल के वो विश्वविद्यालय… जिनकी लाइब्रेरी में कोई विदेशी किताब नहीं थी। तमाम देसी जानकारियों से भरे, हल्के से सवाल पर बिना जिल्द की किताब की तरह खुलने वाले अनुपम मिश्र, अर्थात् तमाम निराशा के क्षणों में हौसले की मशाल….पेश है आज उनके जन्मद‍िन पर एक गीत …

सबसे लम्बी रात का सुपना नया
देह अनुपम बन उजाला कर गया।
रम गया, रचता गया
रमते-रमते रच गया वह कंडीलों को
दूर ठिठकी दृष्टि थी जो
पता उसका लिख गया
सबसे लम्बी रात का सुपना नया…

रमता जोगी, बहता पानी
रच गया कुछ पूर्णिमा सी
कुछ हिमालय सा रचा औ
हैं रची कुछ रजत बूंदें
शिलालेखों में रचीं कुछ सावधानी
वह खरे तालाब सा मन बस गया
सबसे लम्बी रात का सुपना नया…

अकाल के भी काल में
अच्छे विचारों की कलम सा
वह चतुर बन कह गया।
रच गया मुहावरे कुछ
साफ माथे की सामाजिक सादगी से
भाषा का वह मार्ग गांधी लिख गया
सबसे लम्बी रात का सुपना नया…

अर्थमय जीवन में है जीवन का अर्थ
एक झोले में बसी खुश ज़िदगी
व्यवहार के त्यौहार सी वह जी गया
जब गया, नम्र सद्भावना सा
मृत्यु से भी दोस्ती सी कर गया
सबसे लम्बी रात का सुपना नया…

 

रचनाकार: अरुण तिवारी

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