ज़िंदगी जीतेगी भी, मौत हारेगी भी… बस एक मशविरा मान ले इंसान

 

हर तरफ़ तबाही का मंज़र है,
हर तरफ़ त्राहि माम् त्राहि माम् !
सूनी हैं राहें, बेज़ान हैं बाज़ार,
मंदिर मस्जिद बंद पड़े हैं,
आबाद हैं क़ब्रगाह और शमशान!

ना सरपट दौड़ते शहर हैं,
ना ज़िंदादिली के ठहाके हैं!
ना महफ़िलें हैं दोस्तों की,
बस अजीब सा सन्नाटा है,
मानो शहर ने ओढ़ ली चादर खामोशी की!

साँसें साथ छोड़ रही हैं,
ज़िंदगी जंग हार रही है,
हर दिन अपने बिछुड़ रहे हैं।
बस यादें ही हैं बाक़ी
ग़ज़ब है उसकी लाठी।

कोई सब कुछ बेच कर जान बचा रहा है,
तो कोई सब कुछ ख़रीद कर भी जान गंवा रहा है।

वो कहते हैं हम दुनिया में सबसे कम मरे हैं,
क्या कहें उनसे जिनकी वो ही पूरी दुनिया थी।
बाक़ी सब के लिए वो एक ख़बर हो,
किसी के लिए तो वो अकबर थे।

बहुत गुमान था अपने रंग रूप पर,
अब तो अपनों से ही मुँह छुपा रहा है।
बहुत करता था जात पात छुआ-छूत,
अब तो अपनों को भी छूने से घबरा रहा है।
चला था ख़ुदा का नाख़ुदा बनने,
खुद ही बेबस है एक असग़र दुश्मन से।

ज़िंदगी जीतेगी भी, मौत हारेगी भी,
ख़ुशियाँ लौटेंगी भी, मायूसी मायूस भी होगी।
फिर से महफ़िलें सजेंगी कहकहे भी लगेंगे,
फिर से मंदिरों के घंटे घनघनायेंगे।
मस्जिदों से आएगी अज़ान,
बस एक मशविरा मान ले इंसान।
ना बन भगवान, ना बन हैवान,
बस बना रहे इंसान।

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