गांधी पर लिखा वह नाटक, जिसे 50 साल तक किसी ने नहीं छापा

“हिंदुस्तान एक था और एक बना रहे. इससे ज़्यादा स्वाभाविक कोई और बात मैं नहीं मानता. जिसे मैं निराशाजनक मानता हूँ, वह है पागलपन. हवा में धुंधुआती नफ़रत भर गई है. मैं दक्षिण अफ्ऱीका से आया, तब से अब तक इतना अंधा और बेहूदा भावावेश कभी नहीं पसरा था.”
महात्मा गाँधी के ये शब्द आज भी एक भविष्य-कथन और चेतावनी की तरह लगते हैं और कइयों को लग सकता है कि यह हमारे मौजूदा यथार्थ के बारे में टिप्पणी जैसा भी है.
दरअसल, यह संवाद एक हंगेरियाई नाटक ‘गाँधी की मृत्यु’ का है जिसे 1956 में हंगरी के एक प्रसिद्ध लेखक नेमथ लॉस्लो ने लिखा था.
इसे आश्चर्य और विडम्बना ही माना जा सकता है कि गांधी की मृत्यु की अनुगूंज सबसे पहले हिंदी या किसी दूसरी भाषा में नहीं, बल्कि एक दूर देश में सुनाई दी.
नेमथ लास्लो ने यह नाटक गाँधी की हत्या के आठ साल बाद लिखना शुरू किया था जिसका घटनाक्रम हत्या से पहले एक वर्ष के इर्द-गिर्द बुना गया है. कुछ वर्ष बाद 1974 में हंगरी में ही इस नाटक का मंचन भी हुआ.
हिन्दी में यह नाटक गांधी की 150वीं जयन्ती पर कवि-अनुवादक गिरधर राठी और हंगरी भाषा की विद्वान मारगित कोवेश के अनुवाद में प्रकाशित हुआ है.
गिरधर राठी कहते हैं, “मैंने 1968 में हंगरी से लौटने के बाद इस नाटक का एक बड़ा हिस्सा अंग्रेज़ी अनुवाद के आधार पर हिंदी में किया था लेकिन कोई प्रकाशक उसे छापने के लिए तैयार नहीं हुआ. अब 50 साल बाद रज़ा फ़ाउंडेशन की पहल से इसका प्रकाशन हो पाया है.”
गांधी की मृत्यु के 20 बरस बीतने के बाद यह हिन्दी में एक नाटक का विषय बन पाया. इसका नाम था- ‘हत्या एक आकार की’ और लेखक थे ललित सहगल.
यह नाटक 1968 में गाँधी जन्मशती के दौरान लिखा गया और व्यापक रूप से मंचन किया गया. इस प्रतीकात्मक नाटक की संरचना विलक्षण थी जिसमें गाँधी के नाम का कहीं उल्लेख नहीं था.
अदालती घटना-क्रम के शिल्प में चार लोग एक ऐसे व्यक्ति की हत्या करने की योजना बनाते हैं जो ‘देश के विभाजन, हिन्दू राष्ट्र को कमज़ोर करने और अहिंसा, सत्य, और साम्प्रदायिक सद्भाव’ की वकालत करने का ज़िम्मेदार है. लेकिन योजना को अंजाम देने से पहले एक आदमी की अंतरात्मा में हत्या के औचित्य के बारे में नैतिक सवाल उठता है और फिर मंच पर एक मुक़दमे का अभिनय शुरू होता है.
तमाम बहस-मुबाहिसे के बाद तीन लोग हत्या को अंजाम देने चले जाते हैं और जब गोलियों की आवाज़ आती है तो मंच पर मौजूद चौथा आदमी कहता है: ‘तुम्हारा ख़याल, दोस्त, तुमने उसे मार दिया. नहीं दोस्त, नहीं. तुमने एक आकार की हत्या की है-हाड़-मांस से भरे एक आकार की.’
इस नाटक पर अंग्रेज़ी में एक फ़िल्म ‘ऐट फ़ाइव पास्ट फ़ाइव’ भी बनी थी, जो प्रदर्शित नहीं हो पायी.
गाँधी की 150 वीं जयन्ती पर रंगकर्मी एम के रैना ने ‘हत्या एक आकार की’ फिर से मंचित किया. उन्होंने तीन और नाट्य प्रस्तुतियां भी कीं जिनमें दो अंग्रेज़ी में थीं: गाँधी और रवीन्द्र नाथ ठाकुर के पत्र-व्यवहार पर आधारित ‘स्टे येट अ वाइल’ और 1922 में गाँधी पर चले देशद्रोह के मुक़दमे पर ‘द ग्रेट ट्रायल’ (जिसमें गांधी द्वारा अदालत में माफ़ी माँगने से इनकार करने के बयान को हाल ही में जाने-माने एडवोकेट प्रशांत भूषण द्वारा सुप्रीम कोर्ट की मानहानि के प्रसंग में बहुत याद किया गया).
आख़िरी प्रस्तुति गांधी के सचिव महादेव देसाई के बेटे नारायण देसाई की किताब पर आधारित बाल-नाटक थी.
गांधी की 100वीं जयंती के समय में अमरीकी शहर न्यू यार्क के ब्रॉडवे प्ले हाउस थियेटर में 1970 में गर्नी कैंपबेल ने गांधी नाम का एक नाटक मंचित किया था.
कैंपबेल ने 10 साल का समय लगाकर गांधी के जीवन और भारत की स्वतंत्रता में उनके योगदान पर एक नाटक लिखा था.
उसी साल की वॉशिंगटन की कांग्रेस लाइब्रेरी के कॉपीराइट इंट्री से पता चलता था कि गांधी पर कम से कम 20 नाटक किए गए. लेकिन भारत की हिंदी पट्टी में गांधी को लेकर नाटकों पर कभी बहुत दिलचस्पी देखने को नहीं मिली.
वैसे 150वीं जयन्ती-वर्ष की एक उपलब्धि नाटक और कला समीक्षक रवींद्र त्रिपाठी का पहला नाटक ‘पहला सत्याग्रही’ भी है, जिसके बहुत कम समय में 50 से अधिक प्रदर्शन हुए हैं.
यह नाटक गांधी के जीवन के चुनिन्दा दृश्यों-प्रसंगों की मार्फ़त दक्षिण अफ्रीका में उनके उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष, भारत की पराधीनता के विरुद्ध संघर्ष और अंत में विभाजन विरोधी संघर्ष को मार्मिक ढंग से उजागर करता है और साथ ही गांधी के जीवन में हुए रूपांतरणों को भी दिखलाता है.
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के कार्यकारी निदेशक सुरेश शर्मा द्वारा तैयार किये गए इस नाटक का आकर्षण बढ़ता जा रहा है.
इस बीच और भी कुछ नाटक लिखे गए, जिनमें ‘मोहन से महात्मा’ (सईद आलम), ‘हिन्द स्वराज’ (अर्जुनदेव चारण),’महात्मा वर्सेज गाँधी’ (फ़िरोज़ अब्बास), ‘सत्य के प्रयोग’ (देवेन्द्र राज अंकुर) और ‘बापू’ आदि उल्लेखनीय हैं, लेकिन यह भी सच है कि ललित सहगल और रवींद्र त्रिपाठी की कृतियों के अलावा कोई यादगार प्रस्तुति नहीं बन पाई.
गांधी पर सात नई किताबें
मशहूर चित्रकार सैय्यद हैदर रज़ा की स्मृति में स्थापित रज़ा फाउंडेशन ने महात्मा गाँधी के जन्म के 150 वर्ष के मौके पर उनके जीवन प्रसंगों की सात किताबें प्रकाशित की हैं जो अब तक हिंदी में उपलब्ध नहीं थीं.
150वीं जन्मशती पर औपचारिक सरकारी तामझाम के बीच इसे एक ठोस उपलब्धि माना जा सकता है. इसलिए भी कि गाँधी के अपने विचारों-लेखों के संकलनों को छोड़ दें तो हिंदी में उन पर स्वतंत्र पुस्तकों का भारी अभाव रहा है.
‘गाँधी की मृत्यु’ के अलावा 2018 से 2020 की शुरुआत तक प्रकाशित किताबें हैं: जोसफ़ जे. डोक की ‘गाँधीः दक्षिण अफ्रीका में भारतीय देशभक्त’, मूरियल लेस्टर की ‘गाँधी की मेज़बानी’, जेम्स डब्ल्यू डगलस की ‘गाँधी और अकथनीयः सत्य के साथ उनका अंतिम प्रयोग’,बसंत कुमार मल्लिक की ‘गाँधी: एक भविष्यवाणी’ और प्रार्थना सभाओं में गाँधी के भाषणों के दो खंड ‘प्रार्थना प्रवचन’.
फ़ाउंडेशन के प्रबंध न्यासी और कवि-संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी के अनुसार, “रज़ा साहब की महात्मा गाँधी में अपार श्रद्धा थी. इसे ध्यान में रखते हुए हमने ‘रज़ा पुस्तकमाला में हर बार गांधी जी से सम्बंधित सामग्री देने का प्रयत्न किया है…महात्मा गाँधी अपने समय में ही नहीं, हमारे समय में भी एक प्रतिरोधात्मक उपस्थिति हैं: बीसवीं शताब्दी के विचार,राजनीति और सामजिक कर्म पर उनका गहरा असर पड़ा. इन दिनों उनका बहुत बारीक लेकिन अचूक अवमूल्यन करने का एक अभियान ही चला हुआ है.”
जोसेफ़ जे. डोक एक ब्रिटिश पादरी थे जिन्हें बैप्टिस्ट चर्च ने दक्षिण अफ्रीका भेजा था. तब गाँधी के नेतृत्व में अंग्रेजों के समान अधिकारों के लिए भारतीयों का संघर्ष चल रहा था.
एक घटना में घायल हुए गाँधी से डोक की अचानक मुलाकात हुई थी और वे उन्हें अपने घर ले गये. गाँधी के त्यागमय जीवन और विचारों से प्रभावित होकर डोक ने जो जीवन-कथा लिखी,वह गाँधी के जीवन पर लिखी गई पहली किताब है. किताब में डोक ने पहली बार गाँधी के संघर्ष को ईसा मसीह के जीवन के समतुल्य माना था.
प्रसिद्ध शांतिवादी मूरियल लेस्टर की ‘गाँधी की मेज़बानी’ उन दिनों की दास्तान है जब गाँधी 1931 में दूसरी बार गोलमेज़ कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने के लिए लंदन गये थे.
शांतिवादी लेस्टर किंग्सले हॉल में ‘सबसे विपन्न, सबसे निम्न और लापता’ बच्चों का कम्यून चलाती थीं. गाँधी के विचारों से प्रभावित होकर वे 1926 में पहली बार भारत आयीं और बिहार भूकंप के दौरान गाँधी के साथ समाज-कार्य करने भी गयीं.
लेस्टर के आग्रह पर गाँधी करीब तीन महीने किंग्सले हॉल में रहे जिसकी कहानी आत्मीय ढंग से ‘गाँधी की मेजबानी’ में दर्ज हुई है. उनकी और महान फिल्मकार चार्ली चैपलिन की मुलाकात इसी कम्यून में हुई थी. दोनों पुस्तकों के अनुवाद गांधीवादी विचारक और कवि नंदकिशोर आचार्य ने किये हैं.
जेम्स डब्ल्यू डगलस की ‘गाँधी और अकथनीय’ भी अपने ढंग की एक विलक्षण पुस्तक है जो बहुत मार्मिकता के साथ गाँधी की हत्या के पीछे सक्रिय मानसिकता, उसके समाजशास्त्र और शैतानियत के इतिहास की छानबीन करती है. उसमें इतिहास के तथ्य, विचार और अध्यात्म आपस में गुंथे हुए हैं.
अमेरिकी अध्येता और शांतिवादी डगलस ने हिंदी पाठकों के लिए इस किताब की एक विशेष भूमिका लिखते हुए कहा है, “गाँधी की हत्या ईसा को सूली पर चढ़ाए जाने से मिलती-जुलती है…गाँधी की मृत्यु उसी तरह हुई थी जिस तरह ईसा की हुई थी- अपने शत्रुओं में निहित ईश्वर को प्रणाम करते हुए, जिसके लिए उन्होंने अपने जीवन के बहुत बड़े हिस्से के दौरान ईसा की सलीब पर चिंतन करते हुए तैयार की थी.”
डगलस गाँधी की हत्या के षड्यंत्र से संबंधित दस्तावेज़ों की छानबीन से साम्प्रदायिक ताकतों की पूरी परियोजना और मुस्लिम-घृणा को रेखांकित करते हुए भारत की वर्तमान राजनीति तक आते हैं जिसमे ‘पाठ्य पुस्तकों से गाँधी के हत्यारे के रूप में गोडसे का नाम आसानी से हटा दिया’ का भी ज़िक्र है.
डगलस का निष्कर्ष यह है कि “अपने हत्यारों का प्रेमपूर्वक मुकाबला करने की उन (गाँधी) की निरंतर गहराती तत्परता अहिंसा के अर्थ को लेकर उनकी वह आख़िरी वसीयत थी जो उन्होंने हमें सौंपी. उनकी मृत्यु सत्य के साथ उनका अंतिम प्रयोग थी.”
हर अध्याय के अंत में लंबी-चौड़ी संदर्भ सूची भी दी गयी है जो किताब को प्रामाणिक बनाती है. हिंदी में मदन सोनी का अनुवाद पठनीयता को बरकरार रखता है.
प्रसिद्ध दार्शनिक बसंत कुमार मल्लिक की ‘गाँधी: एक भविष्यवाणी’ भी भाववादी धरातल पर उनके जीवन को समझने की गंभीर कोशिश है. यह किताब लम्बे समय से अनुपलब्ध थी जिसकी खूबी यह है कि उसमें गांधी की मृत्यु के माध्यम से उनके जीवन को देखा गया है.
वो कहते हैं, “बापू की मृत्यु मानव इतिहास में किसी अन्य की मृत्यु जैसी नहीं थी क्योंकि जिसे हम इतिहास या सभ्यता कहते आये हैं, वह उसके अंत की सूचक थी.”
-BBC

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