श्रीकृष्ण-जन्मस्थान पर मनायी आदि शंकराचार्य की 1232वीं जयन्ती

मथुरा। सनातन हिन्दू धर्म के रक्षक व चारों धाम के संस्थापक आदि शंकराचार्य जी की 1232 वीं जयन्ती आज पूर्वान्ह श्रीकृश्ण-जन्मस्थान पर परंपरागत रूप में विधिविधानपूर्वक मनायी गयी।

इस अवसर पर विद्वान पूजाचार्यों द्वारा भागवत-भवन में स्थित भगवान शंकराचार्य जी के श्रीविग्रह का पंचामृत अभिषेक के उपरांत पंचोपचार पूजन किया गया व कोरोना जैसी वैश्व‍िक महामारी से विश्व को मुक्ति प्रदान करने की कामना की गयी। तदुपरांत आरती कर प्रसाद वितरण किया गया ।

संस्थान की प्रबंध-समिति के सदस्य गोपेश्वरनाथ चतुर्वेदी के अनुसार सनातन हिन्दू धर्म को अत्यंत विषम परिस्थितियों में नवजीवन प्रदान कर सुदृढ़ विधान के साथ देश की चारों दिशाओं में चार पवित्र धामों की स्थापना करने का कार्य मात्र 32 वर्ष के जीवनकाल में कर देने का चमत्कार पूज्य आदि शंकराचार्य जैसे अवतारी महापुरुष ने किया, जिसके प्रति सम्पूर्ण हिन्दू समाज सदैव उनका ऋणी रहेगा।

इस अवसर पर संस्थान के सं. मुख्य अधिषाशी राजीव श्रीवास्तव, विशेष कार्याधिकारी विजय बहादुर सिंह के अतिरिक्त पूजन व अभिषेक में पूजाचार्य विन्ध्येश्वरीप्रसाद अवस्थी, सनातन पण्डा, ब्रह्मानन्द मिश्र, आचार्य महेश चन्द्र, कृष्णबिहारी पाठक, राधावल्लाभ आचार्य, रामदुलारे मिश्र आदि की विशेष भूमिका रही ।

आदि शंकराचार्य ने धर्म, संस्कृति और देश की सुरक्षा के लिए की चार मठों की स्थापना

4 वेदों से जुड़े 4 पीठ

जिस तरह ब्रह्मा के चार मुख हैं और उनके हर मुख से एक वेद की उत्पत्ति हुई है। यानी पूर्व के मुख से ऋग्वेद. दक्षिण से यजुर्वेद, पश्चिम से सामवेद और उत्तर वाले मुख से अथर्ववेद की उत्पत्ति हुई है। इसी आधार पर शंकराचार्य ने 4 वेदों और उनसे निकले अन्य शास्त्रों को सुरक्षित रखने के लिए 4 मठ यानी पीठों की स्थापना की।
ये चारों पीठ एक-एक वेद से जुड़े हैं। ऋग्वेद से गोवर्धन पुरी मठ यानी जगन्नाथ पुरी, यजुर्वेद से श्रंगेरी जो कि रामेश्वरम् के नाम से जाना जाता है। सामवेद से शारदा मठ, जो कि द्वारिका में है और अथर्ववेद से ज्योतिर्मठ जुड़ा है। ये बद्रीनाथ में है। माना जाता है कि ये आखिरी मठ है और इसकी स्थापना के बाद ही आदि गुरु शंकराचार्य ने समाधि ले ली थी।

Dharma Desk: Legend News

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