अंधों के बीच आइना बेचने आए हैं योगी आदित्‍यनाथ

Yogi Adityanath has come to sell a mirror among the blind
अंधों के बीच आइने बेचने आए हैं योगी आदित्‍यनाथ

अक्‍ल के दुश्‍मन हर युग में हुए हैं और हर युग में होते भी रहेंगे। इस बात की पुष्‍टि योगी आदित्‍यनाथ को यूपी का मुख्‍यमंत्री बनाए जाने के बाद एक बार फिर से हो रही है।
इसे मुल्‍ला नसरुद्दीन पर आधारित एक चुटकुले से समझा जा सकता है।
मुल्‍ला नसरुद्दीन के ऊपर अचानक एक दिन तैराकी का बुखार चढ़ा। फिर क्‍या था, मुल्‍ला जा पहुंचा नदी किनारे और कूद पड़ा पानी में। चूंकि पहले कभी तैरा नहीं था इसलिए डूबने लगा। डूबने की नौबत आई तो जोर-जोर से चिल्लाकर बोला, बचाओ-बचाओ। कोई है क्‍या, बचाओ।
नदी किनारे टहल रहे एक व्‍यक्‍ति ने जब यह आवाज़ सुनी तो वह दौड़ा-दौड़ा पहुंचा और जैसे-तैसे मुल्‍ला को पानी से निकालकर उसकी जान बचाई।
पानी से बाहर आते ही मुल्‍ला कहने लगा, खुदा का शुक्र है कि आप आ गए और आपने मेरी जान बचा ली। अब तौबा करता हूं और कसम खाता हूं कि जब तक पूरी तरह तैरना नहीं आ जाता, पानी के अंदर कभी पैर भी नहीं रखूंगा।
उस व्‍यक्‍ति ने मुल्‍ला को ऊपर से नीचे तक देखा और पूछने लगा- मियां, पानी के अंदर पैर तक नहीं रखोगे तो तैरना सीखोगे कैसे ?
अब जरा गौर फरमाइए अक्‍ल के उन अंधों पर जो कह रहे हैं कि योगी आदित्‍यनाथ को कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं है इसलिए उनको यूपी का मुख्‍यमंत्री पद नहीं सौंपा जाना चाहिए था। आश्‍चर्य की बात तो यह है कि ऐसा कहने वालों में वो तेजस्‍वी यादव तक शामिल हैं जिनकी योग्‍यता सिर्फ इतनी है कि वह लालू तथा राबड़ी की संयुक्‍त उपज हैं और इसीलिए बिहार के उप-मुख्‍यमंत्री पद पर काबिज हैं।
वैसे तेजस्‍वी यादव अकेले नेता नहीं हैं जो योगी आदित्‍यनाथ को उत्तर प्रदेश का मुख्‍यमंत्री बनाए जाने का विरोध इसी आधार पर कर रहे हैं कि उन्‍हें शासन अथवा प्रशासन का कोई अनुभव नहीं है।
इन अक्‍ल के अंधों से मीडिया भी यह नहीं पूछता कि मुख्‍यमंत्री बनने से पहले बसपा सुप्रीमो मायावती को कौन सा प्रशासनिक अनुभव था। अखिलेश यादव ने मुख्‍यमंत्री की कुर्सी सीधे इस योग्‍यता की बिना पर संभाल ली कि उनके पिता मुलायम सिंह मुख्‍यमंत्री रहे थे।
इनके अलावा क्‍या इन अक्‍ल के अंधों ने कभी सोचा कि गुजरात का मुख्‍यमंत्री बनने से पहले नरेन्‍द्र मोदी को कौन सा प्रशासनिक अनुभव था। राजीव गांधी जहाज उड़ाते-उड़ाते सीधे देश की कमान संभालने बैठ गए थे, इससे पहले उन्‍हें शासन चलाने का क्‍या कोई अनुभव था। और तो और जवाहर लाल नेहरू स्‍वतंत्रता आंदोलन की उपज थे लेकिन फिर जा बैठे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर। क्‍या नेहरू जी, फिरंगियों से शासन चलाने के गुर साथ-साथ सीख रहे थे।
राजनीति ऐसे उदाहरणों से भरी पड़ी है क्‍योंकि कहीं से तो शुरूआत करनी होती है। शुरूआत नहीं होगी तो अनुभव कहां से होगा। कोई ”अभिमन्‍यु” तो राजनीति में ऐसा नहीं देखा-सुना जो मां के पेट से सीखकर आया हो, अलबत्‍ता मात्र राजनीतिक विरासत के आधार पर सत्‍ता संभालने वालों की लंबी फेहरिस्‍त है।
राहुल गांधी के अपने परिवार में बेशक तीन-तीन लोग प्रधानमंत्री बनने में सफल रहे लेकिन क्‍या राहुल गांधी के अपने पास कोई शासकीय अथवा प्रशासकीय अनुभव है। वह तो कभी किसी मंत्री पद पर भी नहीं रहे, फिर किस योग्‍यता के आधार पर कांग्रेस उन्‍हें अपना प्रधानमंत्री पद का प्रत्‍याशी बताती चली आ रही है।
दरअसल, बात यहां अनुभव और योग्यता को मापने की है ही नहीं, बात है अंधा विरोध करने की। ऐसा अंधा विरोध जिसके बल पर समूची राजनीति टिकी है। विरोध के लिए विरोध करना ही आज की राजनीति है। कुछ भी हो, बस विरोध करना। गांठ से पूरे लेकिन आंख से अंधे इन लोगों की संख्‍या इतनी अधिक है कि कई बार डर लगता है। डर लगता है कि आखिर हम कैसे लोगों पर निर्भर हैं। किन लोगों से जनता के भले की उम्‍मीद कर रहे हैं।
कहते हैं एक बार अकबर ने बीरबल से पूछा कि हमारे राज्‍य में कितने लोग अंधे होंगे। इस पर बीरबल का जवाब था- शहंशाह, अधिकांश लोग अंधे ही तो हैं।
शहंशाह अकबर को बीरबल का जवाब पसंद नहीं आया और वह उससे गुस्‍से में बोले, कुछ भी कहते हो बीरबल। साबित करो कि राज्‍य के अधिकांश लोग अंधे हैं अन्‍यथा दण्‍ड भुगतने को तैयार रहना।
बीरबल बोले, ठीक है महाराज। कल शहर के प्रमुख चौराहे पर आकर देख लेना।
अगले दिन सुबह जब अकबर शहर के प्रमुख चौराहे पर पहुंचे तो देखते क्‍या हैं कि बीरबल एक चारपायी बुन रहे हैं।
बीरबल को चारपायी बुनते देख अकबर पूछने लगे- अरे बीरबल यह क्‍या कर रहे हो ?
बीरबल ने अकबर से कहा, महाराज एक तरफ खड़े हो जाइए और गिनते रहिए कि कितने अंधे आते हैं।
चूंकि शहर का प्रमुख चौराहा था इसलिए खासी भीड़ रहती थी। बीरबल को सब पहचानते थे इसलिए जिसकी भी नजर बीरबल पर पड़ती, वही पूछने लगता कि अरे बीरबल यह क्‍या कर रहे हो। बीरबल सबको कहते कि एक ओर खड़े हो जाओ।
थोड़ी देर में सैकड़ों लोग बीरबल द्वारा बताई गई जगह पर लाइन में लग चुके थे।
इसके बाद बीरबल ने बादशाह अकबर से कहा कि देखिए महाराज यह सब लोग अंधे हैं और इनमें आप भी शामिल हैं। अकबर ने पूछा, वो कैसे ?
इस पर बीरबल ने बताया, वो ऐसे कि आप सहित ये सभी लोग भलीभांति देख और समझ रहे थे कि मैं चारपायी बुन रहा हूं। बावजूद इसके सबका एक ही सवाल था कि अरे बीरबल, तुम क्‍या कर रहे हो?
अब आप ही बताइए महाराज कि हमारे राज्‍य में अधिकांश लोग अंधे हैं या नहीं। बेहतर होता ये पूछते कि बीरबल तुम चारपायी क्‍यों बुन रहे हो।
महाराज, जरूरी नहीं कि आंखें न होने वाला ही अंधा हो। अंधे वो भी हैं जो सब-कुछ जानकर भी अनजान बनने का नाटक करते हैं। ये अंधे, बिना आंख वाले अंधों से कहीं ज्‍यादा खतरनाक होते हैं क्‍योंकि इनका उद्देश्‍य सिर्फ और सिर्फ मजाक उड़ाना होता है। वह वक्‍त और परिस्‍थितियों को जानने व समझने का प्रयास तक नहीं करते।
योगी आदित्‍यनाथ का मुख्‍यमंत्री पद के लिए नाम घोषित होने के साथ ये आंख वाले अंधे चीखने लगे कि अरे किस अनुभवहीन को मुख्‍यमंत्री बना रहे हैं।
इनका बस चले तो अविवाहित मुख्‍यमंत्रियों से कहें कि आपको घर-परिवार के बारे में कुछ बोलने का अधिकार नहीं है क्‍योंकि आपको परिवार का कोई अनुभव नहीं है। बेऔलाद नेताओं से कहें कि तुम्‍हें युवक-युवतियों के बारे में बोलने और उन्‍हें लेकर निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं हैं।
दुनिया में ऐसे-ऐसे विलक्षण प्रतिभा के धनी पैदा हुए हैं जिन्‍होंने साबित किया है कि अनुभव का संबंध न तो उम्र से होता है और न पढ़ाई-लिखाई व डिग्रियों से। कोई एक छोटी सी घटना से बहुत कुछ सीख लेता है और कोई अनेक घटनाएं घटित हो जाने के बाद भी कुछ सीखने को तैयार नहीं होता।
राहुल गांधी इसका ज्‍वलंत व सटीक उदाहरण हो सकते हैं। लगातार इतना कुछ घटने के बावजूद वह कुछ सीखने को तैयार नहीं जबकि वह योगी आदित्‍यनाथ से एक साल बड़े हैं और राजनीति उनकी पैतृक संपत्ति जैसी है।
सच तो यह है कि उत्तर प्रदेश को एक ऐसे नेता की जरूरत है जिसकी नीयत साफ हो, नीति सपष्‍ट हों और जिसमें आमजन की तकलीफों को महसूस करने लायक संवेदना हो।
इतिहास गवाह है कि देश को बर्बाद करने में जितना हाथ हर क्षेत्र के अनुभवी लोगों का रहा है, उतना अनुभवहीनों का नहीं रहा।
अब थोड़ा समय ऐसे अनुभवहीन मुख्‍यमंत्री को भी दे दें जो बेशक किसी बड़े सरकारी पद पर नहीं रहा लेकिन जिसके मन में जीवमात्र के लिया दया व करुणा होने के अनेक उदाहरण सामने आ रहे हैं।
बेहतर होगा कि अक्‍ल के अंधों की जमात में शामिल न हों और अपने बुद्धि-विवेक का इस्‍तेमाल कर योगी आदित्‍यनाथ के काम का आंकलन करें। यदि वह भी दूसरे नेताओं जैसे निकलें तो जो हश्र उनका किया है, वह योगी और भाजपा का भी करने में कोताही न बरतें किंतु अंधों की जमात का हिस्‍सा न बनें।
-लीजेंड न्‍यूज़

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