यमुना प्रदूषण मामले में DM Mathura से सुप्रीम कोर्ट ने क‍िया जवाब तलब

नई द‍िल्ली/मथुरा । यमुना प्रदूषण मामले में आज सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई करते हुए न्यायाधीश अरुण मिश्रा व न्यायाधीश एस रविंद्र भट्ट की पीठ ने संज्ञान लेते हुए केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण परिषद व DM Mathura  से जवाब तलब करते हुए एक संयुक्त निरीक्षण करने का आदेश दिया, तथा अगले 6 हफ्ते में न्यायालय में अपनी रिपोर्ट प्रेषित करने का आदेश जारी किया ।

उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण परिषद से पूछा कि क्या एनजीटी के आर्डर का पालन हुआ है, क्या छावनी परिषद मथुरा ने यमुना किनारे जहां डंपिंग ग्राउंड बना रखा था वहां बाउंड्री वॉल की गई है ? क्या उस एरिया में ग्रीन बेल्ट डिवेलप की गई है ?

पीठ द्वारा पूछे गए इन सवालों पर उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण परिषद के अधिवक्ता प्रदीप मिश्रा ने न्यायालय को कुछ दस्तावेज उपलब्ध कराये, जिससे न्यायाधीश असंतुष्ट नज़र आये तथा याचिकाकर्ता तपेश भारद्वाज की ओर से मौजूद अधिवक्ता सार्थक चतुर्वेदी, राहुल कुमार, रोहित पाण्डे ने न्यायालय में अपने पक्ष की दलील देते हुए कहा कि प्रदूषण नियंत्रण परिषद द्वारा इस मामले में उचित समय पर संज्ञान नहीं लिया गया। इसके साथ ही आज भी लापरवाही वाला रवैया अपनाया हुआ है।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता सार्थक चतुर्वेदी ने परिषद पर आरोप लगाते हुए यमुना किनारे छावनी परिषद द्वारा बनाए गए डंपिंग ग्राउंड का स्वतंत्र निरीक्षण करवाने की मांग रखी, जिस पर पीठ ने संज्ञान लेते हुए केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण परिषद व DM Mathura से जवाब तलब करते हुए एक संयुक्त निरीक्षण करने का आदेश दिया, तथा अगले 6 हफ्ते में न्यायालय में अपनी रिपोर्ट प्रेषित करने का आदेश जारी किया ।

सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तरप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण परिषद को कड़े शब्दों में हिदायत देते हुए कहा कि जुर्माने की आधी राशि जमा कर दें, जिस पर परिषद के अधिवक्ता ने प्रार्थना करते हुए अगली तारीख तक जुर्माने की राशि को जमा करने की छूट मांगी ।

सर्वोच्च न्यायालय व याचिकाकर्ता के अधिवक्ता सार्थक चतुर्वेदी ने बताया कि यमुना प्रदूषण से जुड़े इस मामले में मथुरा के याचिकाकर्ता तपेश भारद्वाज ने 2016 में एन जी टी में एक याचिका दाखिल कर छावनी परिषद क्षेत्र में यमुना किनारे एक डंपिंग ग्राउंड बनाया हुआ था, जिसमें कि म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट का सही तरीके से निस्तारण नहीं किया जा रहा था तथा कूड़ा खुले में पड़ा हुआ था जो कि बारिश के पानी में स्वतः बह कर यमुना नदी में विकराल प्रदूषण की स्थिति पैदा कर रहा था।

याचिकाकर्ता ने अधिवक्ता सार्थक चतुर्वेदी के माध्यम से यमुना में हो रहे प्रदूषण को रोकने के लिए एन जी टी में याचिका दाखिल की, जिस पर अप्रैल 2017 में विस्तृत आदेश पारित किया और छावनी परिषद मथुरा पर 10 लाख व उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण परिषद पर 5 लाख का जुर्माना किया ।

याचिका में प्रमुख रूप से यमुना में ऑक्सीजन स्तर शून्य हो जाने एवम् कचरे की वजह से उत्पन्न होने वाली बीमारियों का उल्लेख था। मथुरा छावनी परिषद के स्थानीय निकाय पर ठोस कचरा व खतरनाक कचरे के प्रबंधन में 2006 व 2016 के नियमों की पूर्ण अनदेखी का भी उल्लेख किया गया था।

अधिवक्ता सार्थक चतुर्वेदी ने बहस के दौरान छावनी परिषद व प्रदूषण नियंत्रण परिषद, दोनों ही के दावों को गलत साबित कर दिया था तथा कड़े शब्दों में कहा था कि प्रदूषण नियंत्रण परिषद भी अपनी जिम्मेदरी से मुंह नहीं मोड़ सकता।

एन जी टी ने अपने आदेश में इस मामले की पूरे देश में व्याप्त अपशिष्ट कुप्रबन्धन के साथ तुलना करते हुए इसे एक अत्यंत ही गंभीर मामला माना है, एवम याची के वक्तव्य को सही ठहराते हुए छावनी परिषद एवम उत्तर प्रदेश प्रदूषण परिषद को कड़ी फटकार लगाई तथा कर्तव्यों का बोध कराते हुए छावनी परिषद को निर्देश दिए कि चार सप्ताह के भीतर कचरा स्थल को चलाने के लिए राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषद से अनापत्ति प्रमाण पत्र के लिए आवेदन दाखिल करे। साथ ही कचरा निस्तारण स्थल के चारों तर हरित पट्टी विकसित करें। साथ ही कचरा निस्तारण स्थल को चारदिवारी से घेरने का भी निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई नवम्बर के आखिरी सप्ताह में होना तय हुआ है ।

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