साहित्यकार और नोबेल विजेता सूरजप्रसाद नायपॉल का निधन

साहित्यकार और नोबेल पुरस्कार विजेता विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल का 85 वर्ष की उम्र में लंदन स्थित अपने आवास पर निधन हो गया है.
भारतीय मूल के वी. एस. नायपॉल अपने बयानों के लिए भी ख़ासे प्रसिद्ध रहे. उन्होंने इस्लाम की ख़ूब आलोचना की. उनका मानना था कि इस्लाम ने लोगों को ग़ुलाम बनाया और दूसरों की संस्कृतियों को नष्ट करने की कोशिश की.
नायपॉल का इस्लाम पर कहना था, “जिनका धर्मांतरण हुआ उन पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा. जिनका धर्म परिवर्तन होता है, उनका अपना अतीत नष्ट हो जाता है. आपको अपना इतिहास कुचलना होता है. आपको कहना होता है कि मेरे पूर्वजों की संस्कृति अस्तित्व में ही नहीं है और न ही कोई मायने रखती है.”
उन्होंने कहा था, “मुस्लिमों द्वारा इस तरह से पहचान को मिटाना, उपनिवेशवाद से भी बदतर था. यह वास्तव में बहुत ही बदतर था.”
उन्होंने तर्क देते हुए कहा था कि पाकिस्तान इसका जीता जागता उदाहरण है. उनका कहना था, “वास्तव में पाकिस्तान की कहानी एक आतंक की कहानी है. यह एक कवि से शुरू होती है जो यह सोचता था कि मुसलमान अत्यधिक विकसित हैं जिनको भारत में रहने के लिए एक ख़ास जगह होनी चाहिए.”
भारतीय मूल के नायपॉल का जन्म 1932 में कैरेबियाई देश त्रिनिडाड में हुआ था. 1880 के दशक में उनका परिवार भारत छोड़कर चला गया था. हालांकि, वो भारत के बारे में भी खुलकर लिखते-बोलते रहे और उन्होंने इस्लाम को भारत के लिए भी नुक़सानदेह बताया.
साल 1999 में अंग्रेज़ी पत्रिका आउटलुक को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि भारत की सहस्राब्दी की शुरुआत काफ़ी त्रासदीपूर्ण रही है.
इसकी शुरुआत मुस्लिम आक्रमण से हुई और उसने उत्तर में हिंदू-बौद्ध संस्कृति को कुचलना शुरू कर दिया.
उन्होंने कहा था, “कला और इतिहास की किताबों में लोग लिखते हैं कि मुसलमान भारत ‘आए’, जैसे कि वे टूरिस्ट बस में आए थे और चले गए. मूर्तियां और मंदिर तोड़े गए, लूटमार हुई, स्थानीय लोगों को ग़ुलाम बनाया गया.”
“उत्तर में हिंदू स्मारकों का नहीं होना इसके सबूत हैं. उस दौर का कोई हिंदू रिकॉर्ड नहीं है. हारे हुए लोग कभी अपना इतिहास नहीं लिखते हैं. विजेता अपना इतिहास लिखते हैं और मुसलमान विजेता थे. दूसरी तरफ़ के लोगों के लिए यह अंधेरे का दौर था.”
नायपॉल ने भारत के इतिहास, संस्कृति और सभ्यता जैसे विषयों पर ‘एन एरिया ऑफ़ डार्कनेस’ और ‘ए वुंडेड सिविलाइज़ेशन’ जैसी किताबें लिखीं और उन्होंने कहा था कि भारत पर उनकी किताबें 27 सालों में लिखी गई हैं.
‘ईसाइयों से ज़्यादा इस्लाम ने किया नुक़सान’
उनका यह भी मानना था कि ईसाइयों ने भारत का उतना नुक़सान नहीं किया जितना इस्लाम ने किया.
उन्होंने कहा था, “भारत में ईसाई धर्म दो तरह से आया. पहला ब्रिटिश की ओर से दूसरा मिशनरियों के ज़रिए. इस्लाम को जब आप भारतीय संस्कृति को समृद्ध करने के नज़रिए से देखते हैं तो आप भोजन, संगीत और कविता जैसी चीज़ों के बारे में सोचते हैं.”
“इस्लाम और ईसाई जैसे दो बड़े धर्मों ने दुनिया को हमेशा के लिए बदल दिया है. इनके धर्मशास्त्र के अनुसार, इन धर्मों ने दुनिया को भाईचारे, दान और इंसान से इंसान की भावनाओं का एक सामाजिक विचार दिया. ये हमारे राजनैतिक और नैतिक विचारों के आधार हैं. इससे पहले ये विचार न ही प्राचीन, न ही हिंदू और न ही बौद्ध दुनिया में अस्तित्व में थे. शायद इन दो धर्मों ने अपना काम किया है, लेकिन यह अलग विषय है.”
हिंदू जीवनशैली को किस चीज़ ने नुकसान पहुंचाया है? इस सवाल पर नायपॉल ने कहा था कि दशकों की हार ने आत्मसमर्पण की भावना को नुक़सान पहुंचाया है.
बाबरी विध्वंस का बचाव किया
इतिहासकार मुशीर-उल-हसन ने साल 2012 में अपने एक लेख में बताया था कि नायपॉल ने अपनी किताब ‘ए मिलियन म्युटिनीज़’ के छपने के दो साल बाद बाबरी मस्जिद विध्वंस का बचाव किया था और इसे ‘ऐतिहासिक संतुलन का एक कृत्य’ बताया था.
कथित तौर पर उन्होंने साल 2004 में बीजेपी कार्यालय में कहा था, “अयोध्या एक तरह का जुनून था और हर जुनून को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. मैं हमेशा जुनून से बाहर आने वाले कार्यों का समर्थन करता हूं, क्योंकि ये रचनात्मकता को दर्शाता है.”
ऐसा नहीं है कि नायपॉल के बयानों से कोई विवाद पैदा नहीं हुआ. नवंबर 2012 में मुंबई में एक साहित्य उत्सव में उन्हें सम्मानित किया गया था और इस बार भी उन्होंने इस्लाम पर टिप्पणी की, जिसके बाद विवाद पैदा हुआ.
इस बार मशहूर नाटककार, लेखक और अभिनेता गिरीश कर्नाड ने उनकी कड़ी आलोचना की. उन्होंने कहा कि नायपॉल को भारतीय इतिहास में मुसलमानों के योगदान के बारे में कुछ नहीं पता है.
उन्होंने नायपॉल को एक ग़ैर-भरोसेमंद लेखक बताते हुए कहा कि उन्हें संगीत की कद्र नहीं है. कर्नाड ने ये बातें उसी साहित्य उत्सव में कही जहां नायपॉल को सम्मानित किया गया था. उन्होंने कहा था कि वह इस बयान को लेकर माफ़ी भी नहीं मांगेंगे.
इसके बाद नायपॉल का कहना था कि भारत पर उन्होंने पर्याप्त लिखा, अब और नहीं लिखेंगे.
उन्होंने कहा था कि अब उन्हें ऐसा नहीं लगता है कि उन्होंने भारत के बारे में नहीं लिखा है. उन्होंने कहा था कि उन्होंने भारत के बारे में चार किताबें, दो उपन्यास और बहुत से निबंध लिखे हैं.
नायपॉल को 2001 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.
-BBC

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