वाह योगी जी वाह….यही है तबादला नीति…जो छिनरे, वो ही डोली के संग

ब्रज में एक कहावत है। कहावत कुछ ऐसे है- जो छिनरे, वो ही डोली के संग। समझने वाले समझ गए होंगे, और न समझे वो अनाड़ी हैं।
फिलहाल यह कहावत याद आई है मथुरा में एसएसपी के पद पर कार्यरत युवा आईपीएस अधिकारी प्रभाकर चौधरी के स्‍थानांतरण से। बात निकली है तो दूर तक जायेगी ही। प्रभाकर चौधरी के स्‍थानांतरण से याद आया कि कुछ और भी स्‍थानांतरण योगीराज में ऐसे हुए हैं जिन पर यह कहावत सटीक सिद्ध होती है, लेकिन पहले बात प्रभाकर चौधरी की।
पुलिस की आम छवि के विपरीत प्रभाकर चौधरी ने बहुत कम समय में मथुरा की जनता को अपनी कार्यशैली से प्रभावित किया। प्रभाकर चौधरी ने मथुरा की यातायात व्‍यवस्‍था में आमूल-चूल परिवर्तन करके यह साबित कर दिया कि इच्‍छाशक्‍ति हो तो लाइलाज रोग भी दुरुस्‍त किया जा सकता है। जिन-तिराहों चौराहों पर तिपहिया वाहन चालकों का पूरी तरह कब्‍जा रहता था और थाना-चौकियों की पुलिस के संरक्षण में वह खुलेआम गुण्‍डागर्दी करते थे, प्रभाकर चौधरी ने उन्‍हें पूरी तरह हद में रहना सिखा दिया। होलीगेट और भरतपुर के अंदर चाहे जब माल उतरवाने वालों को समझा दिया कि अधिकारी कड़क हो तो नोटों की खनक भी काम नहीं आती।
आम जनता को सुकून और महकमे में बेचैनी से प्रभाकर चौधरी की कार्यप्रणाली का अंदाज लगाया जा सकता है। हालांकि इंस्‍पेक्‍टर से ऊपर के अधिकारियों ने उनके रहते भी थाने-चौकियों से निर्धारित महीनेदारी वसूलने में कोताही नहीं बरती जिसे थाना-चौकी प्रभारी ”मरे पर मार” की संज्ञा दिया करते थे किंतु फिर भी प्रभाकर चौधरी की ईमानदारी के कायल थे।
बेशक प्रभाकर चौधरी के कार्यकाल में अपराधों पर बहुत प्रभावी अंकुश नहीं लग पाया किंतु उसके लिए उनके प्रयास निश्‍चित ही सार्थक रहे।
शुरू-शुरू में तो प्रभाकर चौधरी पर सत्ताधारी पार्टी के नेता भी फख्र किया करते थे किंतु धीरे-धीरे वह कुछ नेताओं की आंखों में खटकने लगे। ऐसे नेताओं को उस दिन मौका मिल गया जिस दिन उप मुख्‍यमंत्री दिनेश शर्मा के मथुरा आगमन पर प्रभाकर चौधरी ने कुछ नेताओं को प्रोटोकॉल तोड़कर मुलाकात करने से रोका। इन नेताओं की एसएसपी से झड़प हुई और उन्‍होंने पार्टी को हाजिर-नाजिर जानकर शपथ उठा ली कि जब तक प्रभाकर चौधरी का मथुरा से बिस्‍तर नहीं बंधवा देंगे तब तक ”जय श्रीराम” नहीं बोलेंगे।
नेताओं की शपथ रंग लाई और प्रभाकर चौधरी का तबादला कर दिया गया। अभी प्रभाकर चौधरी ने चार्ज छोड़ा भी नहीं था कि चौराहों-तिराहों पर यातायात की दुर्व्‍यवस्‍था और तिपहिया वाहन चालकों की रंगदारी दिखाई देने लगी। हर दिन हजार पांच सौ के नोट घर ले जाने वालों ने चैन की सांस ली और उनकी तिपहिया चालकों से जुगलबंदी फिर दिखाई देने लगी। अब एकबार जिला नए सिरे से बबलू कुमार के हवाले है। देखना यह है कि बबलू कुमार यहां अपनी दूसरी पारी में कितने कारगर साबित होते हैं।
वैसे बबलू कुमार मथुरा के लिए और मथुरा बबलू कुमार के लिए अपरिचित नहीं है। पूरे देश में सपा शासन का ”डंका” बजवाने वाले उस ”जवाहर बाग कांड” के बाद बबलू कुमार को मथुरा का एसएसपी बनाकर भेजा गया था जिसमें दो जांबाज पुलिस अफसरों की शहादत हुई थी। इन अधिकारियों की हत्‍या का केस अब भले ही सीबीआई के हवाले हो लेकिन न्‍याय की दरकार के लिए अब भी बहुत कुछ पुलिस के हाथ में है। शायद बबलू कुमार कुछ काम आ जाएं।
अब बात करते हैं आगरा की। आगरा में योगी सरकार ने दो दिन पहले जिलाधिकारी के पद पर एनजी रविकुमार को भेजा है। एनजी रविकुमार मथुरा में काफी वक्‍त तक इस पद को सुशोभित कर चुके हैं। बहिन मायावती के कार्यकाल में उन्‍होंने मथुरा की शोभा बढ़ाई थी।
डीएम के रूप में एनजी रविकुमार ने यहां कितनी शोहरत हासिल की थी, इसे हर जिम्‍मेदार नागरिक बता सकता है। वह अपनी दक्षिण भारतीय शैली वाली हिंदी में और कुछ भले ही ठीक से न समझा पाते हों किंतु ”मतलब की बात” भली-भांति समझा देते थे, नतीजतन उनके रहते एसएसपी सिर्फ ”अंगूठे” का प्रयोग कर पाए क्‍योंकि पुलिस का भी सारा काम डीएम एनजी रवि कुमार निपटा दिया करते थे।
संभवत: यही कारण है कि एनजी रविकुमार को आगरा जैसे महानगर का जिलाधिकारी बनाना लोगों को हजम नहीं हो रहा। हजम इसलिए भी नहीं हो रहा क्‍योंकि बुआ-भतीजे की सरकारों को पानी पी-पीकर कोसने वाले योगी जी और उनके मंत्रिमण्‍डलीय सहयोगी अब उनके मुंहलगे अधिकारियों को ही अपनी नाक का बाल कैसे बना सकते हैं।
याद रहे कि बबलू कुमार भी अखिलेश यादव की गुड बुक में सबसे ऊपर थे और इसीलिए उन्‍हें मथुरा की कमान बेहद विपरीत परिस्‍थितियों में सौंपी गई थी। बबलू कुमार पर तब कानून-व्‍यवस्‍था के साथ-साथ जवाहर बाग कांड से डेमेज हुई सपा की इमेज को भी संभालने की जिम्‍‍‍‍‍‍‍‍मेदारी थी।
ये अलग बात है कि उसके बाद हुए चुनावों ने बता दिया कि जवाहर बाग कांड का असर मथुरा तक सीमित नहीं रहा, वह प्रदेशव्‍यापी हो चुका था लिहाजा बबलू कुमार जैसे अधिकारी कितनी थेगड़ी लगाते और कहां तक लगाते।
समाजवादियों की बेहद करीबी एक ऐसी ही महिला आईपीएस अधिकारी का नाम है मंजिल सैनी। तमाम उपाधियों से विभूषित मंजिल सैनी भी अखिलेश राज में लंबे समय तक मथुरा की एसएसपी रहीं। मथुरा में उन्‍होंने अपने व्‍यक्‍तिगत रिश्‍ते भी खूब निभाए और राजनीतिक रिश्‍ते भी परवान चढ़ाए। पूजा-पाठों में बढ़-चढ़कर हिस्‍सा लिया और जमकर अपनी भी पूजा कराई।
अखिलेश के चचा उन दिनों जब मथुरा का दौरा करने आते थे तो मंजिल सैनी पर उनकी कृपा ऐसे बरसती थी जैसे वह सपा परिवार का ही हिस्‍सा हों।
सपा के शासनकाल में किसी के भी मुंह से यह चर्चा सुनाई देना आम था कि मंजिल सैनी के पति की अखिलेश के एक मित्र और पार्टी पदाधिकारी से गहरी छनती थी। यहां तक कि कारोबार में भागीदारी भी थी।
यही मंजिल सैनी योगीराज में मेरठ की एसएसपी बनाई गईं और दबंग महिला अधिकारी के ”मौखिक खिताब” से भी नवाजी गईं। वो भी तब जबकि मंजिल सैनी के रहते मेरठ में अपराध और अपराधी नित नई मंजिल चढ़ते चले गए।
कुछ समय पहले मंजिल सैनी मेरठ से तब रुखसत हुईं जब खुद उन्‍होंने व्‍यक्‍तिगत कारणों से हटना चाहा अन्‍यथा योगीराज में उन पर पूरी कृपा बरस रही थी।
ये तो मात्र तीन उदाहरण हैं वरना प्रदेश ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है। जाहिर है कि सवाल तो उठेंगे।
सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं कि योगी जी की भाषा में बहुत से अपराधियों को ‘ठोकने’ के बावजूद यूपी के अपराध का ग्राफ है कि नीचे आने का नाम नहीं ले रहा। गिनती गिनने के लिए निश्‍चित ही बहुत से इनामी अपराधी पुलिस की गोलियों के काम आ गए परंतु अमन कायम फिर भी नहीं हो पा रहा।
लोग कह रहे हैं कि ठोका-ठाकी तो योगीराज से पहले भी चलती रही है और पुलिस के अधिकारियों को ”शतकवीर” जैसी ”नाजायज उपाधियों” से नवाजा जाता रहा है इसलिए ठोकने-ठाकना बहुत प्रभाव नहीं छोड़ता। प्रभाव तो तभी पड़ता है जब नतीजा धरातल पर दिखाई दे।
बात यहीं आकर अटक जाती है क्‍योंकि धरातल पर तो वही अधिकारी हैं जिनके लिए सब धान बाईस पसेरी रहता है। बुआ रहें या बबुआ और योगी रहें या भोगी, उनकी चवन्‍नी तब भी चल रही थी और अब भी चल रही है। न अतीत का आकलन न भविष्‍य की चिंता।
योगी जी सोच रहे होंगे कि अभी साल ही तो पूरा हुआ है। चार साल बाकी हैं। वह शायद भूल रहे हैं राजनीति में प्‍याज के बढ़ते दाम भी खून के आंसू रुला देते हैं, फिर ये तो चलती हुई चवन्‍नियां हैं।
आप पहली बार मुख्‍यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुए हो, और ये लोग हर शासन में पद पर काबिज रहे हैं। विश्‍वास करना ठीक है किंतु अंधविश्‍वास आत्‍मघाती होता है। भरोसे का खून तभी किया जा सकता है जब जरूरत से ज्‍यादा भरोसा होता है।
प्रदेश में मेहनती और ईमानदार अधिकारियों की कमी न कभी थी और न होगी, लेकिन दृष्‍टिभ्रम पहले भी था और अब भी है। नहीं होता तो घुटे हुए महात्‍माओं को बार-बार आजमाने की जरूरत नहीं पड़ती।
ये दृष्‍टिभ्रम ही रहा होगा जब अखिलेश को मुख्‍यमंत्री का पद गंवाने के बाद यह कहना पड़ा कि कल तक जो अधिकारी मेरे जूठे कप-प्‍लेट उठाते थे, वही आज साजिश रचकर सरकारी बंगले में तोड़-फोड़ का आरोप मेरे मत्‍थे मढ़ रहे हैं।
योगी जी…उत्तर प्रदेश न तो गुरू गोरखनाथ का मठ है और न समूचे प्रदेश की जनता उस मठ की अनुयायी है।
आपको मठ से निकालकार देश के इस सबसे बड़े प्रदेश की कमान यदि सौंपी गई है तो उसका खास मकसद भी है। उस मकसद को घुटे हुए महात्‍माओं पर आंख बंद करके भरोसा करने में जाया न किया जाए तो अच्‍छा है।
चले हुए कारतूसों को चलाने की कोशिश अक्‍लमंदी नहीं। आजमाए हुओं को आजमाना भी तर्कसंगत नहीं। पार्टी के किसी एक वर्ग की शिकायतों को आधार बनाकर अच्‍छे अधिकारियों का तीन-तीन महीने में तबादला होता रहा तो न घर के रहेंगे न घाट के। कुछ आम जनता की भी सुन लें, वक्‍त जरूरत काम आएगी।
कहते हैं- राजा, योगी, अग्‍नि, जल…इनकी उल्‍टी रीत…बचते रहिओ परशुराम, थोड़ी रखियो प्रीत।
आप तो ”राजा” और ”योगी” का दुर्लभ कॉम्‍बीनेशन हैं। हमें जितनी प्रीति दिखानी थी, उतनी दिखा दी। अब आप जानें और आपकी रीति।
मानो तो देवता वरना पत्‍थर। 2019 में सिर्फ कुछ महीने शेष हैं। फिर परीक्षा अधिकारियों की नहीं, आपकी और आपके फैसलों की होगी।
जय श्रीराम, जय भारत, जय हिंद।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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