New Year की राह में उजालों की चाह

New Year का उत्सव यानी आने वाले कल की रचनात्मक तस्वीर के रेखांकन का प्रेरक क्षण। क्या बनना, क्या मिटाना, इस अन्वेषणा में संकल्पों की सुरक्षा पंक्तियों का निर्माण। ‘आज’, ‘अभी’, ‘इसी क्षण’ को पूर्णता के साथ जी लेने का जागृत अभ्यास। New Year की शुरूआत हर बार एक नया सन्देश, नया संबोध, नया सवाल लेकर आती है। एक सार्थक प्रश्न यह भी है कि आज हर व्यक्ति चाहता है – नया वर्ष मेरे लिये शुभ, शांतिपूर्ण एवं मंगलकारी हो। लेकिन प्रश्न यह भी है कि आज समाज में उजालों की कमी क्यों हो रही है?
स्वार्थ चेतना अनेक बुराइयों को आमंत्रण है क्योंकि व्यक्ति सिर्फ व्यक्ति नहीं है, वह परिवार, समाज और देश के निजी दायित्वों से जुड़ा है। अपने लिए जीने का अर्थ है अपने सुख की तलाश और इसी सुख की तलाश ने अनेक समस्याएं पैदा की हैं।  जिस समाज से जुड़े हुए व्यक्ति समूह के हितों के दीयों में अपनी जिंदगी का तेल अर्पित करने की क्षमता रखते हों वही समाज संचेतन, प्रगतिशील, संवेदनशील और संजिदा होता है। स्वस्थ एवं उन्नत समाज वह है जिसमें सामाजिक चेतना एवं संवेदनाओं की अनुभूति प्रखर हो और उसकी क्रियान्विति के प्रति जागरूकता बरती जाती हो।
नया वर्ष का संकल्प हो कि व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर समूहगत भावना से जहां, जब, जो भी हो उसमें हिस्सेदार बने। इस भावना के विकास का अर्थ होगा कि हमारी संवेदनशीलता जीवंत होगी। सड़क पर पड़े आदमी की सिसकन, भूखे-प्यासे-बीमार की आहंें, बेरोजगार की बेबसी, अन्याय और शोषण से प्रताड़ित आदमी की पीड़ा-ये सब स्थितियां हमारे मन में करुणा और संवेदना को जगाएगी। और यह जागी हुई करुणा और संवेदना हमें सेवा और सहयोग के लिए तत्पर करेगी। इस तरह की भावना जब हर व्यक्ति में उत्पन्न होगी तो समाज उन्नत बनेगा, सुखी बनेगा और सुरक्षित बनेगा। न असुरक्षा की आशंका होगी, न अविश्वास, न हिंसा, न संग्रह, न शत्रुता का भाव। एक तरह से सारे निषेधत्मक भावों को विराम मिलेगा और एक नया पथ प्रशस्त होगा।
हम अपनी महत्वाकांक्षाओं से इतने बंध गए कि इस स्वार्थ में हमारी संवेदना भी खो गई। आज दूषित राजनीति में सिर्फ अपने को सुरक्षित रखने के सिवाय राजनेताओं का कोई चरित्र नहीं है। यही वजह है कि राष्ट्रीय समस्याओं, फैलती बुराइयों, अंधविश्वासों और अर्थशून्य परंपराओं के सामूहिक विरोध की ताकत निस्तेज पड़ती जा रही है फिर सेवा और सहयोग के आयाम कैसे पनपे? जरूरत है दिशा बदलने की। परार्थ और परमार्थ चेतना जगाने की। दोनों हाथ एक साथ उठेंगे तो एकता, संगठन, सहयोग, समन्वय और सौहार्द की स्वीकृति होगी। कदम-से-कदम मिलाकर चलेंगे तो क्रांतिपथ का कारवां बनेगा। यही शक्ति है समाज में व्याप्त असंतुलन एवं अभाव को समाप्त करने की और यही नये वर्ष का संकल्प होना चाहिए।
नया वर्ष मनाते हुए समाज में उजालों की जरूरत आज ज्यादा महसूस की जा रही है, क्योंकि वास्तविक उजाला जीवन को खूबसूरती प्रदान करता है, वस्तुओं को आकार देता है, शिल्प देता है, रौनक एवं रंगत प्रदान करता है। उजाला इंसान के भीतर ज्ञान का संचार करता है और अंधकार को खत्म कर जीवन को सही मार्ग दिखाता है। नकारात्मक दृष्टिकोण दूर कर सकारात्मक दृष्टि और सोच प्रदान करता है। खुली आंखों से सही-सही देख न पाएं तो समझना चाहिए कि यह अंधेरा बाहर नहीं, हमारे भीतर ही कहीं घुसपैठ किये बैठा है और इसीलिये हम अंधेरों का ही रोना रोते हैं। जबकि जीवन में उजालों की कमी नहीं हैं। महावीर का त्याग, राम का राजवैभव छोड़ वनवासी बनना और गांधी का अहिंसक जीवन -ये उजालों के प्रतीक हैं जो भटकाव से बचाते रहे हैं।
नये वर्ष से जुड़ा एक सार्थक प्रश्न यह भी है कि व्यक्ति ऊर्जावान ही जन्म लेता है या उसे समाज ऊर्जावान बनाता है? तब मस्तिष्क की सुन्दरता का क्या अर्थ रह जाता है। मनुष्य जीवन की उपलब्धि है चेतना, अपने अस्तित्व की पहचान। इसी आधार पर वस्तुपरकता से जीवन में आनन्द। अपनी अपार आंतरिक सम्पदा से हम वर्षभर ऊर्जावान बने रह सकते हैं। लेकिन इसके लिये हमारी तैयारी भी चाहिए और संकल्प भी। इस वर्ष का हमारा भी कोई-न-कोई संकल्प हो और यह संकल्प हो सकता है कि हम स्वयं शांतिपूर्ण जीवन जीये और सभी के लिये शांतिपूर्ण जीवन की कामना करें। ऐसा संकल्प और ऐसा जीवन सचमुच नये वर्ष को सार्थक बना सकते हैं।
यजुर्वेद में प्रार्थना के स्वर है कि स्वर्ग, अंतरिक्ष और पृथ्वी शांति रूप हो। जल, औषधि वनस्पति, विश्व-देव, परब्रह्म और सब संसार शांति का रूप हो। जो स्वयं साक्षात् स्वरूपतः शांति है वह भी मेरे लिए शांति करने वाली हो।’’ यह प्रार्थना तभी सार्थक होगी जब हम संयम, संतोष व्रत को अंगीकार करेंगे, क्योंकि सच्ची शांति भोग में नहीं त्याग में है। मनुष्य सच्चे हृदय से जैसे-जैसे त्याग की ओर अग्रसर होता जाता है वैसे-वैसे शांति उसके निकट आती जाती है। शांति का अमोघ साधन है-संतोष। तृष्णा की बंजर धरा पर शांति के सुमन नहीं खिल सकते हैं। मानव शांति की चाह तो करता है पर सही राह पकड़ना नहीं चाहता है। सही राह को पकड़े बिना मंजिल कैसे मिल सकती है। शांति की राह पकड़े बिना शांति की प्राप्ति कैसे हो सकेगी। महात्मा गांधी ने शांति की चाह इन शब्दों में की है कि मैं उस तरह की शांति नहीं चाहता जो हमें कब्रों में मिलती है। मैं तो उस तरह की शांति चाहता हूं जिसका निवास मनुष्य के हृदय में है।
मनुष्य के पास धन है, वैभव है, परिवार है, मकान है, व्यवसाय है, कूूलर है, कम्प्यूटर है, कार है। जीवन की सुख-सुविधाओं के साधनों में भारी वृद्धि होने के बावजूद आज राष्ट्र अशांत है, घर अशांत है, यहां तक कि मानव स्वयं अशांत है। चारों ओर अशांति, घुटन, संत्रास, तनाव, कुंठा एवं हिंसा का साम्राज्य है। ऐसा क्यों है? धन और वैभव मनुष्य की न्यूनतम आवश्यकता-रोटी, कपड़ा और मकान सुलभ कर सकता है। आज समस्या रोटी, कपड़ा, मकान की नहीं, शांति की है। शांति-शांति का पाठ करने से शांति नहीं आएगी। शांति आकाश मार्ग से धरा पर नहीं उतरेगी। शांति बाजार, फैक्ट्री, मील, कारखानों में बिकने की वस्तु नहीं है। शांति का उत्पादक मनुष्य स्वयं है इसलिए वह नैतिकता, पवित्रता और जीवन मूल्यों को विकसित करे।
पाश्चात्य विद्वान टेनिसन ने लिखा है कि शांति के अतिरिक्त दूसरा कोई आनंद नहीं है। सचमुच यदि मन व्यथित, उद्वेलित, संत्रस्त, अशांत है तो मखमल, फूलों की सुखशय्या पर शयन करने पर भी नुकीले तीखे कांटे चूभते रहेंगे। जब तक मन स्वस्थ, शांत और समाधिस्थ नहीं होगा तब तक सब तरह से वातानुकूलित कक्ष में भी अशांति का अनुभव होता रहेगा। शांति का संबंध चित्त और मन से है। शांति बाहर की सुख-सुविधा में नहीं, व्यक्ति के भीतर मन में है। मानव को अपने भीतर छिपी अखूट संपदा से परिचित होना होगा। आध्यात्मिक गुरु चिदानंद के अनुसार शांति का सीधा संबंध हमारे हृदय से है सहृदय होकर ही शांति की खोज संभव है। वर्तमान जीवन पद्धति में पारस्परिक दूरी, कथनी और करनी में जो अन्तर पैदा हो गया है उसपर नियंत्रण स्थापित किया जाए। जब तक मनुज जीवन की हंसती-खिलती ऊर्वर वसुन्धरा पर शांति के बीज, स्नेह का सिंचन, अनुशासन की धूप, नैतिकता की पदचाप, मैत्री की हवा, निस्वार्थता का कुशल संरक्षण/संपोषण नहीं देगा तब तक आत्मिक सुख-शांति की खेती नहीं लहराएगी और तब तक नववर्ष मनाने की सार्थकता भी सिद्ध नहीं होगी।
जिंदगी से जुड़ी समस्याओं और सवालों का समाधान सामने खड़ा दिखता है तब व्यक्ति बदलता है बाहर से भी और भीतर से भी क्योंकि बदलना ही शांति की इच्छा का पहला सोपान है और बदलना या बदलाव ही नववर्ष के संकल्पों की बुनियाद भी है। वर्षों तक मंदिर की सीढ़ियां चढ़ी, घंटों-घंटों हाथ जोड़े, आंखे बंद किए खड़े रहे, प्रवचन सुनें, प्रार्थनाएं कीं, ध्यान और साधना के उपक्रम किए, शास्त्र पढ़े, फिर भी अगर मन शांत न हुआ, चिंतन शांत न हुआ तो समझना चाहिए कि सारा पुरुषार्थ मात्र ढ़ोंग था, सबके बीच स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने का बहाना था। नववर्ष कोरा बहाना नहीं, बल्कि दर्पण बने ताकि हम अपनी असलियत को पहचान सकंे, क्योंकि जो स्वयं को जान लेता है, उसे जीवन के किसी भी मोड़ पर जागतिक प्रवंचनाएं ठग नहीं सकती।
Wishing for Light of Sprituality in New Year- Lalit Garg
Wishing for Light of Sprituality in New Year- Lalit Garg
लेखक: ललित गर्ग

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