‘उधार के सिंदूर’ से मथुरा में मांग सजाती भाजपा, क्‍या 2022 में ‘सदा सुहागन’ का आशीर्वाद ले पाएगी?

कड़वा है लेकिन सच है। उधार के सिंदूर से मांग तो सजाई जा सकती है पर ‘सदा सुहागन’ रहने का आशीर्वाद नहीं पाया जा सकता। जनप्रतिनिधियों के मामले में मथुरा का हाल भी कुछ ऐसा ही है।
कहने को तो जनपद की कुल जमा पांच विधानसभाओं में से चार पर भाजपा के विधायक काबिज हैं परंतु उनमें से दो उधार के सिंदूर हैं। उधार के सिंदूर का रंग कुछ ज्‍यादा ही चटख होता है इसलिए उसकी शिनाख्‍त कराना जरूरी नहीं होता, पब्‍लिक सबको जानती भी है और पहचानती भी है।
बाकी बचे दो। ये यूं तो ‘स्‍वयंवर’ करके मथुरा लाए गए थे लेकिन उन पर सौहबत का रंग इस कदर चढ़ा कि सारी कलई उतर गई लिहाजा आज पब्‍लिक की आंखों में बुरी तरह खटक रहे हैं।
पार्टी के एक नेता ने पिछले दिनों इनमें से एक की तारीफ में कसीदे गढ़ते हुए अपना अनुभव कुछ इस तरह बताया- ”भाईसाहब…मैंने अपने जीवन में ऐसा विधायक नहीं देखा जो किसी के काम ही न आता हो।
काम छोटा हो या बड़ा, विधायक जी सामने वाले को हाजमे की ऐसी पुड़िया थमाते हैं कि वह पलटकर उनकी ओर मुंह भी नहीं करता। दोबारा आने की बात ही छोड़ दें।
वैसे ये हैं बहुत ऊर्जावान, परंतु उनकी सारी ऊर्जा और सारा करंट खुद को ऊर्जावान बनाए रखने के काम आ रहा है। क्‍या मजाल कि जनता उनकी ऊर्जा से कतई कुछ हासिल कर ले।
करे भी कैसे, वो आम जनता के इतने नजदीक आते ही नहीं कि कोई उनकी ऊर्जा का सदुपयोग कर सके। उनका सीधा फंडा है, अपना काम बनता, फिर भाड़ में जाए जनता। इसका उन्‍होंने मुकम्‍मल इंतजाम कर भी रखा है। पार्टीजनों के लिए ‘मजबूरी का नाम महात्‍मा गांधी’ है इसलिए बेचारे ‘मरा-मरा’ की रट इतनी तीव्र गति से लगा रहे हैं कि वो भी ‘राम-राम’ सुनाई दे रहा है।
दूसरे विधायक जी की बात करें तो उनके बारे में पार्टी के लोगों का कहना है कि उन्‍हें ओढ़ें या बिछाएं। पहले भी मिट्टी के माधौ थे, आज भी वैसे ही हैं। विधायक जरूर बन गए लेकिन उन्‍हें कोई आसानी से विधायक मानने को तैयार नहीं है। उनके लिए उनका चुनाव क्षेत्र ही प्रदेश की राजधानी है और ‘निज निवास’ है विधानसभा। इससे ऊपर उन्‍होंने न तो कभी सोचा, और न सोचने की कोई उम्‍मीद दिखाई देती है।
जब पार्टीजनों की उनके बारे में इतनी उत्तम राय है तो जनता किस मुंह से कुछ कहे। भूले-भटके कोई कभी कुछ मुंह खोलता भी है तो जवाब मिलता है कि विपक्ष के नाम पर यहां है क्‍या जो चिंता की जाए। मोदी-योगी जिंदाबाद…फिर हम जैसों को काम करने की जरूरत ही क्या है।
अब बात ‘उधार के सिंदूरों’ की
घाट-घाट का पानी पीकर भाजपा की बहती गंगा में हाथ धोने वाले एक विधायक जी तो जैसे सम्‍मानित होने के लिए ही पैदा हुए है। उन्‍होंने उसके लिए बाकायदा अपना एक ऐसा ‘निजी गैंग’ गठित कर रखा है जो उन्‍हें कहीं न कहीं और किसी न किसी बहाने सम्‍मानित करता रहता है। क्षेत्र की जनता उन्‍हें बाजरे और गन्‍ना के खेतों में तलाशती है लेकिन वो पाए जाते हैं किसी ऐसे मॉल या होटल में जहां उनका ‘सम्‍मान’ समारोह चल रहा होता है। चले भी क्‍यों नहीं, भाजपा जितना ख्‍याल ‘बावफाओं’ का रखती है उससे कहीं अधिक ‘बेवफा’ उसे प्रिय हैं।
वफादारों की विवशता यह है कि वो बेचारे हर हाल में ‘कमल ककड़ी’ से लटके रहते हैं। 2022 में भी वो वहीं लटके पाए जाएंगे, फिर पार्टी चाहे उधार के सिंदूरों को रिपीट करे या न करे। वफादारी का यही तकाजा है।
चौथे और अंतिम विधायक जी, अपनी पूर्ववर्ती सरकार में रहते हुए ही समझ गए थे कि येन-केन-प्रकारेण अपने हृदय ‘कमल’ को खिलाना है क्‍योंकि ऐसा न करने पर ‘दुर्गति’ को प्राप्‍त होना तय है।
कारनामे ही कुछ ऐसे रहे कि बात सीबीआई तक जा पहुंची। सगे-संबंधियों और इष्‍ट-मित्रों के साथ दोनों हाथ ऐसी लूट की कि लुटेरे व चोर-उचक्‍के भी शरमा जाएं लेकिन ‘चौर कर्म’ को भी ‘चौर कला’ का दर्जा हासिल है इसलिए उच्‍चकोटि के चोर मौका मिलने पर अपनी कला का प्रदर्शन करने से नहीं चूकते। इन्‍होंने भी पूरे गिरोह के साथ अपनी कला का मुजाहिरा किया और कुर्ते में जेबें बढ़ाते चले गए।
सुना है उनकी इस कलाकारी को देखते हुए मथुरा के सीडीओ कार्यालय में सीबीआई ने एक सेल्‍फ को बाकायदा सील किया हुआ है ताकि सनद रहे और वक्‍त जरूरत काम आए। पार्टी ने भी उनकी महत्‍ता के मद्देनजर महकमा तो अलॉट कर रखा है परंतु झुनझुने के साथ। जब तक दोनों हाथों से ये विधायक जी पार्टी का झुनझुना बजाते रहेंगे, तब तक सीडीओ ऑफिस की सील लगी रहेगी। झुनझुना छूटा नहीं कि सील खुली नहीं। सील खुली तो घर की खिड़की जेल में जाकर खुलेगी, यह तय है।
जो भी हो लेकिन इस सबके बीच बेचारे कर्तव्‍यनिष्‍ठ, कर्मनिष्‍ठ और सत्‍यनिष्‍ठ पार्टीजन उस दिन के इंतजार में हैं जब पार्टी भी समझेगी कि उधार के सिंदूर से मांग तो सजाई जा सकती है पर ‘सदा सुहागन’ रहने का आशीर्वाद नहीं पाया जा सकता।
2022 के चुनाव बहुत दूर नहीं है। बमुश्‍किल सवा साल बाद वो दिन देखने को मिल जाएगा जब एकबार फिर चौराहे पर काठ की हांड़ी चढ़ानी होगी। तब देखना यह होगा कि पार्टी उधार के इन्‍हीं सिंदूरों को रिपीट करेगी अथवा सदा सुहागन का जन आशीर्वाद पाने के लिए सात जन्‍मों का साथ निभाने वालों को मौका देगी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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