क्यों सफल है मुद्दों से भटकाने की रणनीति ?

आज का युग महाज्ञानी राजनीतिज्ञों का युग है। इनके सामने वैज्ञानिक, इतिहासविद और विद्वजन सभी नतमस्तक हैं। ये मनमर्जी से पाठ्यक्रम बदल रहे हैं, इतिहास बदल रहे हैं और ऐतिहासिक तथ्यों पर नित नये, अजीबो-गरीब और बेतुके बयान दे रहे हैं। ये सत्ता में हैं, इसलिए देशभक्त हैं। ये सत्ता में हैं इसलिए इनके बयान सुर्खियां बन जाते हैं। ये सत्ता में हैं इसलिए इनके विचारों से असहमत हर व्यक्ति देशद्रोही है। ये सत्ता में हैं इसलिए इनका दावा है कि जनता ने शेष सब को अस्वीकार किया है। हालांकि ये यह नहीं बताते कि मात्र 30-35 प्रतिशत मत लेकर ही विधायक या सांसद बना जा सकता है, और चुनाव में जीत दर्ज कर चुके उम्मीदवार को भी 65-70 प्रतिशत जनता ने अस्वीकार कर दिया था। ये सत्ता में हैं इसलिए मनचाहे कानून बना सकते हैं। बड़ी बात यह है कि ये सत्ता में हैं। भाजपा जब से सत्ता में आई है, इस तरह के बयानों का नया दौर शुरू हो गया है मानों ये राजनीतिज्ञ नहीं बल्कि सर्वज्ञ हैं। ये सब कुछ जानते हैं, या यूं कहिए कि सब कुछ ये ही जानते हैं। इसीलिए यह कहना पड़ रहा है कि आज का दौर महाज्ञानी राजनीतिज्ञों का दौर है और उनके षड्यंत्र की रणनीति का नया दौर है।
त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लव देव ने महाभारत काल में इंटरनेट और सेटेलाइट होने का बयान देकर सारे विश्व के वैज्ञानिकों को उनकी औकात बता दी। स्वरोज़गार पर नरेंद्र मोदी के बयान को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने नवयुवकों को गाय पालने या पान की दुकान खोलने की राय देकर युवाओं को रोज़गार देने के लिए बनी सभी सरकारी नीतियों, कार्यक्रमों और संस्थाओं की धज्जियां उड़ा दीं। कभी कोई राजनीतिज्ञ किसी मस्जिद को शिवालय बता डालता है, कोई लव जिहाद का मुद्दा उठाता है, कोई गोरक्षा को लेकर कुछ भी कह डालता है।

कोई सज्जन तो ताजमहल पर ही विवाद खड़ा कर देता है। और यह सब कुछ जनहित में हो रहा है, देशभक्ति से ओत-प्रोत होकर हो रहा है। समस्या यह नहीं है कि इन अनावश्यक मुद्दों पर फालतू के बयान दिये जा रहे हैं। समस्या कुछ और है। समस्या यह है कि ऐसे बेतुके बयानों को बहुत तरजीह दी जा रही है। मीडिया द्वारा इन बयानों को बढ़-चढ़कर प्रकाशित-प्रसारित किया जा रहा है। इन बयानों को लेकर बहस चल रही है। बहस पर फिर आगे बहस चल रही है। यह सिलसिला अनंत है।
क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों हो रहा है? क्या आप जानते हैं कि भाजपा के छोटे-बड़े नेता ऐसे बयान क्यों दे रहे हैं? इन बेतुके बयानों की एक खासियत है जो ऐसे सारे बयानों पर लागू होती है और वह खासियत यह है कि इन बयानों से तुरंत विवाद खड़ा हो जाता है क्योंकि ये बयान अक्सर किसी संवेदनशील मुद्दे से संबंधित होते हैं या वह मुद्दा ऐसा होता है जिसे संवेदनशील बनाया जा सकता है, या फिर ऐसे बयान किसी नीति के बारे में होते हैं। बयान आता है तो मीडिया सरगर्म हो जाता है और बहस का सिलसिला चल निकलता है।

पहला सवाल है कि मीडिया को क्या इससे मिलता है? जवाब सीधा है कि हर विवादास्पद मुद्दा चर्चा का विषय बन जाता है और टीआरपी बढ़ जाती है। दूसरा सवाल है कि उलटे-सीधे बयान देने वाले राजनेता को इससे क्या हासिल होता है? जवाब यह है कि वह संबंधित राजनेता को पब्लिसिटी मिलती है। वह राजनेता थोड़ा और बड़ा बन जाता है। लेकिन तीसरा और सबसे बड़ा सवाल यह है कि भाजपा ऐसा क्यों होने दे रही है? भाजपा में जहां किसी को मनमर्जी से कुछ भी बोलने की इजाजत नहीं है, वहां अब ऐसा क्यों होने लगा है?

तो जवाब यह है कि यह भाजपा की रणनीति का हिस्सा है कि बेतुके लेकिन संवेदनशील मुद्दों या नीतिगत विषयों से संबंधित ऊल-जलूल बयान उछाले जाएं। मोदी जानते हैं कि टीआरपी का भूखा मीडिया इन बयानों को तुरंत लपक लेता है और उस पर चर्चा आरंभ हो जाती है।

परिणाम यह होता है कि जनहित के वास्तविक मुद्दे कहीं दूर पीछे छूट जाते हैं, उनकी अहमियत खत्म हो जाती है, मीडिया और जनता गैरजरूरी सवालों से सिर टकराने लग जाते हैं और जनहित के मुद्दों पर सरकार अपनी जवाबदेही से बच जाती है। यही कारण है कि बयानबाजी की इस कवायद में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लव देव या गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी अकेले नहीं हैं बल्कि इसमें कई केंद्रीय मंत्री, सांसद, विधायक या पार्टी के पदाधिकारी भी शामिल हैं।

बिप्लव देव कहते हैं कि महाभारत के समय इंटरनेट जैसी तकनीक थी फिर उन्होंने सन् 1997 में डायना हेडेन के विश्व सुंदरी बनने पर सवाल किया, मेकेनिकल इंजीनियरों को सिविल सेवा में न जाने की सलाह दे डाली और यह भी कहा कि शिक्षित युवाओं को सरकारी नौकरियों के लिए चक्कर काटने के बदले पान की दुकान खोलनी चाहिए या गाय पाल कर डेयरी उद्योग में करियर बनाना चाहिए। अब जब त्रिपुरा जैसे छोटे से राज्य का मुख्यमंत्री नंबर बना रहा हो तो गुजरात माडल का वारिस मुख्यमंत्री कैसे चुप रहता? विजय रुपानी ने नारद मुनि की तुलना सर्च इंजन गूगल से की और कहा कि नारद मुनी को पूरी दुनिया के बारे में जानकारी होती थी।

गुजरात विधानसभा के स्पीकर ने कहा कि आंबेडकर ब्राहमण थे। योगी आदित्य नाथ ने तो रामभक्त बजरंग बली हनुमान को दलित बता डाला। अब जब सारे मुख्यमंत्री बोल रहे हों तो कोई वाचाल पार्टी प्रवक्ता कैसे चुप रह सकता है, तो भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने सवाल उठाया कि राहुल गांधी अपना गोत्र बताएं। जब यह खबर सामने आई कि राहुल गांधी ने स्वयं को दत्तात्रेय ब्राह्मण करार दिया है तो केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान मंत्री डा. हर्ष वर्धन ने भी बयान दाग डाला कि जवाहर लाल नेहरू दत्तात्रेय ब्रह्मण थे। उनका गोत्र उनके पुत्र को तो मिल सकता था पर शादीशुदा पुत्री को नहीं मिल सकता, इसलिए राहुल गांधी स्वयं को दत्तात्रेय ब्राह्मण नहीं कह सकते।
लब्बोलुबाब यह कि इस बेतुकी बयानबाजी को मीडिया की तरजीह मिलती है, ऐसे बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो जाते हैं और उन पर प्रशंसा या आलोचना होने लगती है। ये अनावश्यक बातें मुद्दा बन जाती हैं और जो मुद्दे हैं वे कहीं पीछे छूट जाते हैं। सच है, प्रधानमंत्री मोदी को यूं ही राजनीति और रणनीति का माहिर नहीं कहा जाता।

यह सर्वज्ञात तथ्य है कि भाजपा के आईटी सेल से पार्टी कार्यकर्ताओं को कुछ विषयों को मुद्दा बनाने का निर्देश दिया जाता है। वे सभी लोग रट्टू तोते की तरह ट्विटर सहित सोशल मीडिया पर बयान दाग देते हैं। बड़ी संख्या में देश के अलग-अलग भागों से अलग-अलग लोग ट्वीट करते हैं तो वह ट्विटर पर “ट्रेंड” करने लगता है, इस प्रकार वह मुद्दा मीडिया और जनता की निगाह में सबसे पहले आता है और बहस का विषय बन जाता है। यह भाजपा की रणनीति है। खेद की बात है कि मीडिया इस षड्यंत्र का शिकार है, जनता इस षड्यंत्र का शिकार है, और सरकार मजे कर रही है।

PK Khurana
PK Khurana

 

 पी. के. खुराना

लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और राजनीतिक रणनीतिकार हैं

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