इस ख़बर से देश के राजनीतिक गलियारों में बेचैनी क्‍यों है?

लंबे समय तक भारतीय राजनीति में कांग्रेस की विचारधारा का प्रमुख चेहरा रहे डॉ. प्रणब मुखर्जी 7 जून को नागपुर में होने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस के कार्यक्रम में दिखाई देंगे.
इस ख़बर से देश के राजनीतिक गलियारों में भृकुटियाँ तनना स्वाभाविक है.
नागपुर के रेशीमबाग मैदान पर आयोजित होने वाले तृतीय वर्ष शिक्षा वर्ग समापन समारोह में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित होंगे. वो ना सिर्फ स्वयंसेवकों के पासिंग आउट कार्यक्रम का अहम हिस्सा होंगे बल्कि, अपने विचार भी रखेंगे.
समारोह में सरसंघचालक मोहन भागवत समेत संघ का मौजूदा नेतृत्व भी उनके साथ मंच पर होगा. दर्शकों के अलावा कार्यक्रम में संघ के चुनिंदा पदाधिकारी और मीडिया प्रतिनिधि भी शामिल होंगे.
नागपुर में 25 दिन रहकर संघ का तृतीय वर्ष पाठ्यक्रम पूरा करने वाले देश के विभिन्न इलाकों से आए करीब 600 स्वयंसेवक इसका हिस्सा बनेंगे.
4 बार मिल चुके हैं मुखर्जी और भागवत
संघ के ज़िम्मेदार सूत्र बताते हैं कि मुखर्जी से संघ के शीर्ष नेतृत्व की अब तक कम से कम चार बार मुलाकातें हो चुकी हैं. राष्ट्रपति पद पर रहते हुए मुखर्जी से मोहन भागवत की दो बार दिल्ली में मुलाकात हुई थी.
सूत्रों का कहना है कि एक बार तो यूँ हुआ कि मुलाकात का दिन और वक्त तय हो चुका था लेकिन प्रणब दा की पत्नी का देहावसान हो जाने से लगभग सारे कार्यक्रम रद्द कर दिए गए थे परंतु रद्द हुई मीटिंग की सूची में सरसंघचालक के साथ मुलाकात शामिल नहीं थी. ये मुलाकात हुई और शोक संवेदना व्यक्त करने के बाद भी काफी देर चली थी.
इतना ही नहीं, इससे पहले की मुलाक़ात में प्रणब मुखर्जी को संघ के विषयों से जुड़ी जो पुस्तकें दी गई थीं, उसके संबंध में शंकाओं पर विचार-विमर्श का दौर दूसरी मुलाक़ात तक चला.
संघ के मत के अनुसार अन्य विचारों वाले लोगों को बुलाने की यह परंपरा गोलवलकर के समय से रही है, जो दूसरों के विचारों या विरोधी विचारों के साथ चर्चा करना बेहतर मानते थे.
संघ के सूत्रों की मानें तो संघ का मानना है कि भिन्न मत का होना या विरोधी विचारधारा होना शत्रुता नहीं है. शुरू से संघ की सोच रही है कि इस पर संवाद हो सकता है और संवाद जारी रखे जाने का प्रयास किया जा सकता है.
‘कोई तात्कालिक योजना नहीं’
क्या संघ के नेतृत्व को प्रणब मुखर्जी से कुछ उम्मीदें जगी हैं, कोई योजना बनी है.
इस सवाल पर संघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा, “आरएसएस भविष्य में लंबे समय के लिए सोचने का प्रयास करता है. सो, कुछ मुलाक़ातों में किसी का यकायक विचार परिवर्तन हो जाएगा या किसी के एक या दो दौरे के बाद कुछ नया देखने सुनने मिलेगा, संघ को लाभ होगा – संघ ऐसी कोई उम्मीद नहीं रखता. प्रणब मुखर्जी को अचानक बुलाया गया हो, ऐसा भी नहीं है.”
क्या संघ को इसका अंदेशा नहीं कि कांग्रेस के भीतर या बाहर से प्रणब मुखर्जी पर संघ के कार्यक्रम में शरीक़ ना होने के लिए भी दवाब बनाया जा सकता है?
संघ से जुड़े एक सूत्र ने बताया, “प्रणब मुखर्जी एक वरिष्ठ और विचारवान व्यक्ति हैं. ऐसे शख्स जो सोच समझ कर ही कोई कदम उठाते हैं. उन पर ऐसा कोई दबाव सफल होगा ऐसा लगता नहीं. और अब तो वो राजनीति में भी सक्रिय नहीं हैं.”
ग़ौरतलब है कि राष्ट्रपति के तौर पर अपने कार्यकाल के आख़िरी महीनों में प्रणब और पीएम नरेंद्र मोदी के संबंध मधुर रहे थे. मोदी ने उन्हें पिता समान व्यक्तित्व भी कहा था.
विरोधी विचार वालों को बुलाने की परंपरा
लगभग पिछले एक दशक से संघ के शिक्षा वर्ग समापन समारोह कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर किसी भिन्न मतों वाले व्यक्तित्व को बुलाने की परंपरा रही है. हालांकि विजयादशमी के कार्यक्रम में लंबे अरसे से मुख्य अतिथि बुलाए जाते रहे हैं.
इसके अलावा अन्य अवसरों पर भी अलग विचारों वाले नेता, विचारक बुलाए गए हैं.
रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया के नेता और दलित नेता दादासाहेब रामकृष्ण सूर्यभान गवई, वामपंथी विचारों वाले कृष्णा अय्यर और कुछ अरसे पहले वरिष्ठ पत्रकार और आप के नेता आशुतोष जैसे नाम इस कड़ी में शामिल हो चुके हैं.
संघ से जुड़े सूत्र बताते हैं कि मीनाक्षीपुरम में कुछ हिंदुओं द्वारा धर्म परिवर्तन कर इस्लाम स्वीकार किए जाने की घटना के बाद दलित नेता गवई ने खुद संघ के कार्यक्रम में आने की इच्छा जताई थी और अपन विचार रखे थे.
संघ के धुर-विरोधी और वामपंथी विचारक कृष्णा अय्यर ने तमाम स्थानीय विरोधों के बावजूद तत्कालीन सरसंघचालक से मुलाक़ात की थी और बाद में पत्रकारों के सामने अपने विचार रखे थे.
इतिहास में संघ स्वयंसेवकों के शिविरों को महात्मा गाँधी और भीमराव आंबेडकर की ओर से भेंट देने के उदाहरण दिए जाते रहे हैं.
-संजय रमाकांत तिवारी

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