पाकिस्‍तान में जिसकी लाठी, उसका ही चांद-सितारा

जब पिछले महीने एक विशेष अदालत ने भूतपूर्व फ़ौजी राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ को मृत्युदंड सुनाया तो जो पानी पी रहा था उसे उच्छू लग गया, जो चाय सुड़क रहा था उसके हाथ से प्याली छूट गई, जो भोजन कर रहा था उसके हाथ से निवाला ज़मीन पर गिर गया और जिसने ड्राइव करते हुए ये ख़बर रेडियो पर सुनी उसने पगलाकर गाड़ी फ़ुटपॉथ पर चढ़ा दी.
बात ही कुछ ऐसी थी, जो 73 साल में कभी नहीं हुआ वो अब कैसे हो सकता है?
फांसी तो आतंकवाद के आरोपी चढ़ते हैं, राजनेता चढ़ते हैं, इंक़लाबी चढ़ते हैं. एक जनरल को फांसी की सज़ा और वो भी संविधान तोड़ने के आरोप में, और कौन सा संविधान? जिसके बारे में ख़ुद परवेज़ मुशर्रफ़ कह चुके हैं कि इस पतली सी किताब की औक़ात क्या है?
और इनसे पिछले के फ़ौजी राष्ट्रपति जनरल ज़िया उल हक़ कह चुके हैं कि संविधान की वह 12 पन्नों की किताब, उसे तो मैं जब चाहें फाड़ दूं और राजनेता फिर भी मेरे पीछे दुम हिलाते आएंगे.
हालांकि जितने ख़तरनाक मुक़दमे परवेज़ मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ बनाए गए उतने ख़तरनाक मुक़दमे तो जुल्फ़ीकार अली भुट्टो पर भी नहीं थे.
परवेज़ मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ सिर्फ़ संविधान तोड़ने का मुक़दमा थोड़े ही था, जिसकी सज़ा मौत है. बल्कि बेनज़ीर भुट्टो के क़त्ल का भी मुक़दमा था और बलोच सरदार अकबर बुगती को मार डालने का मुक़दमा भी.
लेकिन जुल्फ़ीकार भुट्टो संविधान बनाने और क़ातिल ना होने के बावजूद फांसी चढ़ गए और परवेज़ मुशर्रफ़ साहब बरी हो गए.
क्या कमाल की बात है कि परवेज़ मुशर्रफ़ पर संविधान से ग़द्दारी का मामला छह साल चला. चार जज बदले गए. परवेज़ मुशर्रफ़ केवल एक बार अदालत में पेश हुए और फिर कभी नहीं आए. बल्कि पाकिस्तान से ही चले गए.
फ़ैसले को चुनौती मिलेगी?
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अदालत को कभी नाजायज़ अदालत नहीं कहा. बल्कि भूतपूर्व चीफ़ जस्टिस आसिफ़ सईद खोसा ने आदेश दिया कि विशेष अदालत जल्द से जल्द इस मुक़दमे को निपटाए.
और जब मुक़दमा निपट गया तो इस अदालत के वजूद को ही लाहौर हाईकोर्ट में चैलेंज कर दिया गया.
और फिर हाईकोर्ट ने परवेज़ मुशर्रफ़ को बेगुनाह क़रार दिए जाने के बदले विशेष अदालत को ही नाजायज़ क़रार दे दिया.
परवेज़ मुशर्रफ़ पर संविधान से ग़द्दारी का मुक़दमा भूतपूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के ज़माने में क़ायम हुआ था. जब विशेष अदालत ने पिछले महीने परवेज़ मुशर्रफ़ को फांसी पर लटकाने की सज़ा सुनाई तो नवाज़ शरीफ़ या उनके भाई शहबाज़ शरीफ़ या फिर उनकी बेटी मरियम नवाज़ ने इस फ़ैसले के पक्ष या ख़िलाफ़ एक शब्द नहीं कहा.
और जब लाहौर हाईकोर्ट ने विशेष अदालत को ही ग़ैर-क़ानूनी क़रार दे दिया तो भी शरीफ़ खानदान के मुंह पर टेप लगी हुई है.
तो क्या इमरान ख़ान की सरकार हाईकोर्ट के इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज करेगी?
ये बात मैंने अपने सबसे खरे मित्र अब्दुल्ला पान सिगरेट वाले से पूछी. कहने लगा अम्मा खां साहब घास चर गए हो क्या, जर्नलिस्ट होकर मुझसे ऐसे सवालात पूछते हो क्या मैं शक्ल से….
चाहे अपने हक़ में तुम कई लाख दलीलें ले आओ, जिसके हाथ में लाठी है उसका चांद सितारा है. ये शेर सुनाने के बाद अब्दुल्ला ने तंबाकू वाला पान देते हुए कहा कि इसे खाओ खां साहब, मुंह कुछ देर बंद रहेगा, फिर एक और खा लेना.
-वुसअतुल्लाह ख़ान

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