फंड रोकने वाली ट्रंप की धमकी का WHO ने दिया जवाब

विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO ने अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनल्‍ड ट्रंप की उस धमकी का जवाब दिया है, जिसमें उन्‍होंने WHO को दिए जाने वाले अमरीकी फंड पर रोक लगाने की बात कही थी.
जेनेवा में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान WHO के डायरेक्टर जनरल टेडरोस अधानोम गेब्रियेसस ने कहा कि कोरोना वायरस का ‘राजनीतिकरण’ नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने ऐसा ना किए जाने की अपील की.
डायरेक्टर जनरल टेडरोस ने ये बात अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा फंड पर रोक लगाए जाने के एक सवाल के जवाब में कही.
उन्होंने कहा, “अभी सभी राजनीतिक दलों का ध्यान अपने लोगों को बचाने पर केंद्रित होना चाहिए.”
डायरेक्टर जनरल टेडरोस ने कहा कि राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर दरारें ही वायरस और संक्रमण को सफल बनाती हैं.
उन्होंने कहा, “भगवान के लिए, हम दुनिया के 60 हज़ार लोगों को खो चुके हैं. हम क्या कर रहे हैं? अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षाओं के लिए कोविड 19 का इस्तेमाल करने की कोई आवश्यकता नहीं.”
हालांकि थोड़ी ही देर बाद ट्रंप अपने बयान से मुकर गए थे और कहा कि ”मैंने यह नहीं कहा कि मैं अभी ये करने जा रहा हूं लेकिन इतना ज़रूर है कि आने वाले दिनों में हम इसे देखेंगे और जांच करेंगे.”
वैसे ये पहला मौक़ा नहीं है जब अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने WHO पर चीन के प्रति सहानुभूति रखने का आरोप लगाया है. इसके पहले 28 जनवरी को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिलने के बाद जब WHO के मुखिया टैड्रोस ऐडरेनॉम ग़ैबरेयेसस ने कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए उनके प्रयासों की सराहना की थी, तब भी अमरीका समेत विश्व के कई देशों ने उन पर सवाल उठाए थे.
WHO के मुखिया टैड्रोस ऐडरेनॉम ग़ैबरेयेसस ने 2017 में डब्लूएचओ की कमान संभाली थी. टैड्रोस पहले अफ्रीकी हैं जो इस पद पर पहुंचे हैं. उन पर ऐसे आरोप लगते आए हैं कि उन्हें ये पद, चीन के प्रयासों की वजह से ही मिला है.
अमरीकी राष्ट्रपति के ताज़ा बयान से सवाल उठ रहे हैं कि क्या अमरीका वाक़ई में WHO का फंड रोक सकता है?
और अगर ऐसा होता है तो WHO पर इसका कितना असर पड़ेगा?
ये जानने और समझने के लिए सबसे पहले ये समझना होगा कि WHO का बजट आख़िर तय कैसे होता है? और अमरीका की इसमें कितनी हिस्सेदारी है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO का फंड
विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO की बेवसाइट पर मौजूद दस्तावेज़ के मुताब़िक, इस संगठन को फंड दो तरह से मिलते हैं. एक होता है असेस्ड कंट्रीब्यूशन- ये फंड इस संगठन के सदस्य देश देते हैं. कौन सा सदस्य देश कितना फंड देगा, ये पहले से तय होता है. ये इस बात पर निर्धारित होता है कि देश की अर्थव्यवस्था और जनसंख्या कितनी है.
दूसरा होता है वॉलेंटरी कंट्रीब्यूशन – इसके तहत सदस्य देश अपनी क्षमता के अनुसार अपनी तय सीमा के बाद कोई मदद के तौर पर फंड देना चाहे तो दे सकते हैं. इसके आलावा कुछ बड़ी संस्थाएं और लोग भी WHO को पैसों से मदद कर सकते हैं. उस तरह की मदद को इस श्रेणी में गिना जाता है.
असेस्ड कंट्रीब्यूशन को WHO की ‘कोर’ फंडिंग मानी जाती है. इस फंड का इस्तेमाल संगठन अपने रोजमर्रा के ख़र्चे और ज़रूरी प्रोग्राम चलाने के लिए करता है.
बाक़ी वॉलेंटरी कंट्रीब्यूशन का इस्तेमाल संगठन उन्हीं कुछ एक विशेष कामों के लिए करती है, जिसके लिए वो फंड बता कर दिए जाते हैं.
साल 2016-17 के आँकड़ों की बात करें तो 80 फ़ीसदी फंड WHO के पास वॉलेंटरी कंट्रीब्यूशन से आया था. महज़ 18 फ़ीसदी ही असेस्ड कंट्रीब्यूशन के ज़रिए मिला था और बाक़ी दो फ़ीसदी अन्य सोर्स से मिले थे.
WHO और अमरीका की फंडिंग
WHO अमरीका को दोनों तरह के फंड देता है. ये बात भी सही है कि अमरीका WHO को सबसे ज्यादा फंड देता है.
एक रिपोर्ट के मुताबिक़ सालों तक अमरीका WHO के असेस्ड कंट्रीब्यूशन का सबसे बड़ा हिस्सा अकेले देते आया है, जो कुल जमा राशि का 22 फ़ीसदी होता था.
साल 2010 से 2017 के बीच ये धनराशि 107 मिलियन डॉलर से 114 मिलियन डॉलर के बीच ही रही है.
वहीं वॉलेंटरी कंट्रीब्यूशन की बात करें तो अमरीका ने वर्ष 2017 में 401 मिलियन डॉलर का फंड डब्लूएचओ को दिया था. 2016-17 में डब्लूएचओ को मिलने वाले कुल वॉलेंटरी कंट्रीब्यूशन का ये 17 फ़ीसदी हिस्सा था.
अमरीका के कुल फंडिंग को देखे तो ये स्पष्ट है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन फंड के मामले में अमरीका पर काफ़ी हद तक निर्भर है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन में अमरीका की हिस्सेदारी
फंडिंग के आलावा अमरीका विश्व स्वास्थ्य संगठन के कार्यकारी बोर्ड का सदस्य भी है. इसके आलावा अमरीका अपने वर्ल्ड हेल्थ एसेंब्ली का भी सक्रिय सदस्य है जो दूसरे देशों में अपने लोगों को किसी भी स्वास्थ्य मसलों पर या आपदा की स्थिति में काम करने के लिए भेजता है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के कार्यकारी बोर्ड में 34 सदस्य देश हैं, जिसमें अफ्रीका, अमरीका, दक्षिण-पूर्वी एशिया, यूरोप जैसे महाद्वीप के कई देश शामिल है. लेकिन भारत उसमें नहीं है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के फंड में चीन की हिस्सेदारी
चीन भी अमरीका की तरह विश्व स्वास्थ्य संगठन का कार्यकारी सदस्य है.
आँकड़ों के मुताबिक़ पिछले कुछ सालों में चीन ने भी डब्लूएचओ में अपनी फंडिंग बढ़ाई है. साल 2014 से लेकर 2018 तक चीन के फंड में 52 फ़ीसदी का उछाल आया है.
ज़ाहिर है चीन की अर्थव्यवस्था और जनसंख्या दोनों ही मामलों में इन सालों में बढ़ा है, इसलिए डब्लूएचओ की फंडिंग में उसका हिस्सा वैसे भी बढ़ जाता है.
हाल में चीन का असेस्ड कंट्रीब्यूशन तकरीबन 86 मिलियन डॉलर रहा है. वहीं वॉलेंटरी कंट्रीब्यूशन साल 2019 में तकरीबन 10.2 मिलियन डॉलर रहा है.
स्पष्ट है कि दोनों ही मामलों में चीन, डब्लूएचओ को अमरीका से कम फंड देता है.
और यही सबसे बड़ी वज़ह है कि अमरीका विश्व स्वास्थ्य संगठन को लेकर ऐसे बयान दे रहा है.
-BBC

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »