Dabholkar परिवार के ‘परिवर्तन ट्रस्ट’ में हुए घोटालों पर कार्रवाई कब ?

विवेकवाद, वैज्ञानिक दृष्टि, अंधश्रद्धा निर्मूलन, धर्मचिकित्सा आदि शब्दोंका उपयोग कर, समाज को भ्रमित करनेवाले अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के (‘अंनिस’के) भ्रष्ट एवं नास्तिकतावादी कारनामे दिन प्रतिदिन सामने आ रहे हैं । दिनांक 20 ऑगस्ट 2013 को महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के कार्याध्यक्ष डॉ. नरेंद्र Dabholkar की हत्या के उपरांत ‘डॉ. दाभोलकर कितने महान समाजसेवक थे’, यह दर्शाने की प्रतियोगिता आरंभ हुई । Dabholkar के नाम पर कुछ ‘दिवस’ मनाने के आव्हान किए जाते हैं ।

वास्तव में डॉ. Dabholkar जब जीवित थे, उस समय ही उनके न्यास में हुए अनेक घोटालों और भ्रष्टाचारों के विषय में विविध जांच संस्थाओं ने जांच आरंभ की थी । साथ ही विवेकवाद का नकाब ओढ़नेवाले और दाभोलकर की हत्या की जांच में दबाव निर्माण करने हेतु पूरे राज्य में ‘जवाब दो’ का नगाड़ा बजानेवाले अंनिसवाले उनकी ट्रस्ट में किए घोटालों के विषयमें चुप्पी साधे बैठे हैं । दाभोलकर पर ‘श्रद्धा’ रखकर अंनिस को करोडों रुपए दान करनेवालों का पैसा कहां जाता है, इसका ‘जवाब’ अंनिस को ही देना चाहिए । दाभोलकर जब जीवित थे, तब कहते थे ‘खुशी से मेरी जांच करो ।’ ऐसे में आज उनके ‘उत्तराधिकारी’ ट्रस्ट की जांच से क्यों घबराते हैं ? जिस प्रकार दाभोलकर परिवार जानकारी देने से हिचक रहा है, उससे तो लगता है कि दाल में जरूर कुछ काला है । इसलिए वैज्ञानिक दृष्टि और विवेकवाद के नाम पर धर्मचिकित्सा करने का ढिंढोरा पीटनेवाली अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के विवेकवाद की और आर्थिक लेन-देन की चिकित्सा करनेका समय अब आ गया है । यही इस लेख का प्रयोजन है !

डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या की जांच करनेवाली जांच संस्थाओं को अंनिस के अनेक आर्थिक घोटाले और नक्सलवादी संबंधों के विषय में प्रमाण सौंपने के बाद भी उसकी गहन जांच नहीं की जाती । स्विट्जरलैंड का ‘स्विस एड’ संगठन एक मानचित्र प्रकाशित करता है, जिसमें वह दिखाता है कि ‘कश्मीर’ पाकिस्तान का भाग है । इस संगठन से कथित ‘जैविक खेती’ करने हेतु दाभोलकर परिवार की ‘परिवर्तन’ ट्रस्टला (कि ‘परिवार’ ट्रस्ट) स्विट्जरलैंड से करोडों रुपयों का विदेशी धन मिलता है । आर्थिक वर्ष 2011 के उपरांत इस ट्रस्ट का हिसाब दाभोलकर के पुत्र डॉ. हमीद दाभोलकर अथवा उनके परिवार ने धर्मादाय आयुक्त को नहीं सौंपा । विदेश से आतंकवाद, देशविरोधी गतिविधियां और नक्सलवाद के लिए धन आता है, यह सर्वज्ञात है । क्या यहां भी ऐसा ही कुछ हो रहा है ? यह जांचने की नितांत आवश्यकता है । केवल धर्म की चिकित्सा क्यों ? विवेक की आवाज, आधुनिकतावाद, बुद्धिप्रमाणवाद की बातें करनेवाले दाभोलकर परिवार की ट्रस्ट के व्यवहार पारदर्शक हैं कि नहीं, इसकी भी जांच होनी चाहिए ।

1. दाभोलकर का ‘महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति’ न्यास भले ही सर्वपरिचित है, तब भी ‘परिवर्तन’ संगठन इतना परिचित नहीं है । इस संगठन के विश्‍वस्त (न्यासी) हैं नरेंद्र अच्युत दाभोलकर, देवदत्त अच्युत दाभोलकर, प्रसन्न देवदत्त दाभोलकर, शैला नरेंद्र दाभोलकर, हमीद नरेंद्र दाभोलकर, मुक्ता पटवर्धन, अनघा तेंडोलकर, अनिल गुंडोपंत तेंडूलकर आणि मंगला सुभाष वाघ । इनमें से प्रसन्न दाभोलकर ने त्यागपत्र दिया । इन नामों से यह स्पष्ट होता है कि यह न्यास सामाजिक नहीं, पारिवारिक है; क्योंकि शैला दाभोलकर अध्यक्ष हैं और नरेंद्र दाभोलकर कार्यवाह थे । इनमें से नरेंद्र दाभोलकर की मृत्यु के एक वर्ष उपरांत भी उनका नाम ट्रस्ट से हटाए बिना, मृत व्यक्ति को ही विश्‍वस्तपद पर रखकर कार्य किया जा रहा था ।

2. मूलतः व्यसनमुक्ति के आकर्षक नाम पर यह न्यास आरंभ किया गया । परंतु ‘जैविक खेती’के लिए इस संस्था को विदेश के देशों से स्विट्जरलैंड से करोड़ों रुपए प्राप्त हो रहे हैं । यह धन देनेवाला कोई महाराष्ट्र मंडल अथवा मराठी भाषी लोग नहीं, ईसाई संस्था है । दाभोलकर ने कितनी जैविक खेती की है एवं कितने किसानों की आत्महत्याएं रोकीं, यह शोध का तथा पत्रकारिता का विषय है । जो भारत का अविभाज्य भाग है एवं जिसके लिए हजारों सैनिकों ने अपना रक्त बहाया, वह ‘कश्मीर का हिस्सा’ पाकिस्तान में दर्शानेवाला मानचित्र छापनेवाला ‘स्विस एड’ संगठन परिवर्तन ट्रस्ट को धन की आपूर्ति करता है । हर वर्ष यह धन ‘जैविक खेती’ के नाम पर आता है । कानून के अनुसार जिस उद्देश्य से धन प्राप्त होता है, उसी हेतु उस धन का उपयोग होना बंधनकारी है; परंतु वैसा नहीं हो रहा ।

3. यह घरेलू संस्था क्या वास्तव में केवल व्यसनमुक्ति का कार्य करती है ? व्यसनमुक्ति के उद्देश्य में अब तो ‘साहित्य, सामाजिक क्षेत्र में कार्य, कार्यकर्ता, साहित्यकार, विविध अभियान आदि को पुरस्कार देना एवं उनकी सहायता करना’, ऐसी वृद्धि दाभोलकर परिवार ने की है । परंतु इस संस्था को धन स्विट्जरलैंड से मिलता है ।

4. वर्ष 2006-07 में 1,50,000 रुपये, वर्ष 2008-09 में 3,00,000 रुपये, वर्ष 2009-10 में स्विस एड की ओर से 3,00,372 रुपये एवं विदेश से प्राप्त अन्य 19,11,795 रुपये । कुल दान एवं अनुदान – 51,84,690 रुपये, वर्ष 2010-11 में स्विस एड की ओर से 10,44,000 रुपये, तथा विदेश से प्राप्त अन्य 40,43,627 रुपये । कुल दान एवं अनुदान मिलाकर 1,15,19,409 रुपये प्राप्त हुए हैं । यह विदेश से आनेवाला धन वर्ष 2011 तक का है । उसके उपरांत के कागजात दाभोलकर परिवार ने धर्मादाय आयुक्त कार्यालय में जमा नहीं किए हैं; हो सकता है कि आगे प्राप्त हुई राशियां इनसे भी बडी हों ।

ये सूत्र ध्यान में आने पर जब विश्‍वस्त डॉ. हमीद दाभोलकर से आवाहन किया गया, ‘देशभक्त हो, तो कश्मीर पाकिस्तान को देनेवाले विदेशी संगठन से पैसा लेकर उनके गुलाम मत बनो’; तो उनसे कुछ प्रतिसाद नहीं मिला । पुनः एक अवसर देते हुए आज भी हम उनसे आवाहन कर रहे हैं कि यह पूरा धन निश्‍चित रूप से किससे, किसलिए एवं कितना आया और आई हुई ऐसी सभी करोडों की राशियां कहां, कैसे एवं किसन खर्च की, ऐसा प्रत्येक पैसे का संपूर्ण ब्यौरा दाभोलकर अपने जालस्थल पर प्रसिद्ध करें । विवेकवाद के नाम पर अन्यों को चुनौती देनेवाले दाभोलकरवादी, इस आवाहन को स्वीकारकर क्या अपना विवेक सिद्ध करेंगे ? यह उनकी कृति से समाज को दिखाई देगा ।

-सुनील घनवट,
महाराष्ट्र एवं छत्तीसगढ राज्य संगठक,
हिन्दू जनजागृति समिति

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