“गूंगे” ने “बहरे” से जो कुछ कहा, उसे “अंधे” ने देखा

चकरा गए न! मैं भी इसी प्रकार चकरा गया था जब उसने बिना किसी राम-राम या दुआ-सलाम के सीधे-सीधे मुझसे यही कहा था।
मैंने उससे कुछ बेरुखी के साथ पूछा- ये क्‍या बक रहे हो। ऐसा कैसे संभव है ?
वह भी उतनी ही बेरुखी बरतते हुए प्रत्‍युत्तर में बोला- संभव हो या असंभव… मुझे इससे क्‍या ?
मैं तो संविधान प्रदत्त अपनी अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता का इस्‍तेमाल कर रहा हूं। इससे तुम्‍हें आपत्ति क्‍यों हो रही है?
इस बार मैंने उसे समझाने की कोशिश की- भाई मेरे, यह अभिव्‍यक्‍ति की आजादी नहीं हैं। इसे अफवाह फैलाना कहते हैं, और अफवाह फैलाना एक जुर्म है। अफवाह फैलाने वाले देश के दुश्‍मन होते हैं।
मेरे समझाने पर वह और भड़क उठा। कहने लगा- तुम इसे दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहते हो। ये है तुम्‍हारा लोकतंत्र, जहां मुझसे मेरी बोलने की आजादी छीनी जा रही है।
बोलने की ही क्‍यों… मेरे रहन-सहन की आजादी, खाने-पीने की आजादी, और तो और घूमने-फिरने की भी आजादी पर पाबंदी लगाई जा रही है।
मैंने उसकी भावनाओं का आदर करते हुए उससे यह जानने की कोशिश की कि आखिर तुम चाहते क्‍या हो, थोड़ा विस्‍तार में बताओ।
इस पर वह बोला- देखिए जनाब, मैं सिर्फ संविधान से प्राप्‍त अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्‍तेमाल करना चाहता हूं। और इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
मुझे मेरे भरोसेमंद सूत्रों ने जानकारी दी कि “गूंगे” ने “बहरे” से जो कुछ कहा, उसे “अंधे” ने देखा। अब मैं इस जानकारी को अधिक से अधिक लोगों के बीच फैला देना चाहता हूं लेकिन आप जैसे लोग हैं कि मेरी जुबान पर भी लगाम लगाना चाहते हैं।
यह सुनकर अब मेरा धैर्य थोड़ा चुकने लगा तो मैंने उससे कहा- देखो भाई… संविधान ने बेशक देश के सभी नागरिकों को अभिव्‍यक्‍ति की, रहन-सहन की, खाने-पीने की और घूमने-फिरने की भी आजादी दी है परंतु हर आजादी की कोई सीमा तो होती ही है न।
संविधान में ऐसी किसी सीमा का कोई उल्‍लेख भले न हो परंतु इसके लिए हमें अपने बुद्धि-विवेक का प्रयोग खुद करना होता है। जो लोग खुद नहीं करते, उन्‍हें कानून कराता है। या यूं कहें कि कानून को कराना पड़ता है क्‍योंकि कोई भी आजादी अराजकता फैलाने का अधिकार नहीं देती।
जैसे कि अभिव्‍यक्‍ति की आजादी के नाम पर कोई खुलेआम किसी को गाली तो नहीं दे सकता क्‍योंकि गाली देना अपराध कहलाता है। लोगों को भड़काने-उकसाने का काम भी नहीं कर सकता क्‍योंकि वह भी अपराध की श्रेणी में आता है।
इसी प्रकार संविधान ये भी अधिकार नहीं देता कि आप मुंह में हर वक्‍त पेट्रोल भरकर घूमते रहें ताकि जहां भी चिंगारी नजर आ जाए वहीं उसे आग के शोलों में तब्‍दील कर सकें। आप ऐसा करेंगे तो कानून भी अपना काम करेगा।
रहन-सहन की आजादी भी लोकतंत्र देता है परंतु इसका भी यह मतलब नहीं कि आप निर्वस्‍त्र निकल पड़ें और किसी के रोकने-टोकने पर दुहाई देने लगें संविधान की।
सरेआम निर्वस्‍त्र निकल पड़ने पर आपके साथ दो किस्‍म की दुर्घटनाएं हो सकती हैं। पहली कानून सम्‍मत और दूसरी वो जिसे आप जैसे लोग अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता कहते हैं। मसलन जनता जनार्दन आपको ”पगलैट” समझकर दौड़ा सकती है। आपके ऊपर ईंट-पत्‍थर फेंक सकती है या ऐसा कुछ कर सकती है जिसे आप जैसा ”इलीट वर्ग” मॉब लिंंचिंग कहता है और आम आदमी जनाक्रोश। चुनाव आपका है, आप जिस तरह भी समझ सकें।
इसके बाद नंबर आता है खाने-पीने की आजादी का। तो भाई यहां भी कानूनन तय है कि आप कितनी आजादी के हकदार हैं। आप अपने घर में बैठकर निरामिष भोजन करें या आमिष यानी मांसाहारी अथवा शाकाहारी, ये आपका अधिकार है परंतु यदि आप कहें कि मैं तो बीच सड़क पर उसे काटकर और पकाकर ”गिद्ध-भोज” करूंगा तो ये अधिकारों का दुरुपयोग ही नहीं, कुत्‍सित एवं कुंठित मानसिकता का परिचायक भी होगा।
आपको अपने घर या कुछ निर्धारित स्‍थानों पर मदिरापान करने की भी आजादी है परंतु सार्वजनिक तौर पर नहीं।
आपको यह आजादी भी नहीं कि आप मदिरापान करके मनमर्जी करने लगें। किसी के भी कपड़े फाड़ दें या अपने कपड़े फाड़कर समाज को शर्मिंदा करें, क्‍योंकि लिमिट सबकी तय है। लिमिट क्रॉस की नहीं कि कानून अपना काम करने लगता है।
शेष रह जाती है बात घूमने-फिरने की आजादी की तो उसके लिए भी कहीं कोई रोक-टोक नहीं है, परंतु विषम परिस्‍थितियों में शांति व सद्भाव बनाए रखने के लिए कानून में ऐसे प्रावधान हैं जिनका इस्‍तेमाल किया जा सकता है।
ऐसा इसलिए कि संविधान और लोकतंत्र ने सिर्फ अधिकार ही नहीं दिए, कुछ कर्तव्‍य भी निर्धारित किए हैं।
इन कर्तव्‍यों में हर इंसान के जीवन की रक्षा करना भी शामिल है। इसीलिए जीवन जीने का अधिकार तो सबको है परंतु जीवन लेने का किसी को नहीं। चाहे वह आपका खुद का ही क्‍यों न हो। ऐसा न होता तो ”खुदकुशी” भी अपराध न होता। वह एकमात्र ऐसा अपराध है जिसमें सफल हो जाने पर तो आदमी कानून से बच निकलता है परंतु असफल रहने पर शिकंजे में फंस जाता है।
आप कल को यह कहने लगें कि भाई जब जीवन मेरा है तो उसे छीनने का अधिकार मुझे क्‍यों नहीं है।
कुछ गुणी लोग इसके लिए कानून को चुनौती देते रहे हैं और देते रहेंगे किंतु फिलहाल खुदकुशी करने की कोशिश अथवा उसके लिए प्रेरित करना दोनों ही कृत्‍य अपराध हैं।
तो यार, न खुद खुदा से मिलने की इतनी जल्‍दी में रहो और न दूसरों को उसके लिए उकसाओ।
संविधान और लोकतंत्र से मिले अधिकारों का सम्‍मान करो व उनका लुत्‍फ उठाओ। अपमान करोगे तो अपमानित होना पड़ेगा।
संविधान प्रदत्त अधिकार हों या लोकतंत्र प्रदत्त, उनकी व्‍याख्‍या अपने मनमाफिक करने की कोशिश भी आत्‍मघात से कम नहीं है।
जितनी आजादी और जैसी आजादी मिली है, उसके लिए शुक्रिया अदा करो संविधान निर्माताओं का, लोकतंत्र का और उस जनता जनार्दन का जो तुम्‍हें ‘झेल’ रही है।
कानून को अपना काम करने दो क्‍योंकि वो भी संविधान की देन है। उसे भी आपके ही पूर्वजों ने स्‍थापित किया है। समय और परिस्‍थितियों को समझो।
सब-कुछ संविधान प्रदत्त नहीं होता, कुछ ईश्‍वर प्रदत्त भी होता है। ईश्‍वर ने बुद्धि-विवेक दिया है तो उसका भी थोड़ा इस्‍तेमाल कर लो और फिर सोचो कि क्‍या गूंगा बोल सकता है, क्‍या बहरा सुन सकता है, क्‍या अंधा देख सकता है ?
नहीं न…तो फिर ऐसी अफवाहें क्‍यों फैलाते हो। क्‍यों अभिव्‍यक्‍ति की आजादी का ढोल गले में लटकाकर देश का ढोल बजाने में लगे रहते हो।
क्‍यों रहने-खाने-पीने-घूमने-फिरने की आजादी के बहाने अपने दिमाग का दिवालियापन जाहिर करते हो।
याद रखो… ये जो जनता है, सब जानती है। तुम्‍हें भी और तुम्‍हारी हरकतों को भी।
कहते हैं किसी खास जीव को ”घी” हजम नहीं होता। बाकी आप समझदार हैं।
डिस्‍क्‍लेमर: यह कहावत हर उस व्‍यक्‍ति पर खरी उतर सकती है जो प्राप्‍त सुविधाओं का दुरुपयोग करने में लगा रहता है। सिर्फ अधिकारों की बात करता है, कर्तव्‍यों की नहीं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

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