कृषि कानूनों की वापसी के बाद क्या होगा राकेश टिकैत का भविष्‍य?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार सुबह 9 बजे राष्ट्र को संबोधित करते हुए देश के 3 नए विवादित कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान कर दिया। पीएम ने इस दौरान कहा कि हमारी नीयत साफ थी, पवित्र थी लेकिन हम शायद समझा नहीं पाए, हमारी तपस्या में कमी रह गई। इधर पीएम के ऐलान के बाद बीते एक साल से दिल्ली के बॉर्डर पर आंदोलन कर रहे किसानों खुशी की लहर दौड़ गई। किसान आंदोलन के अगुवा भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने कहा है कि वह संसद में कृषि कानूनों को रद्द किए जाने का इंतजार करेंगे। बहरहाल, ताजा घटनाक्रम के बाद सबकी निगाहें राकेश टिकैत पर टिक गई हैं। चर्चा शुरू हो गई है कि उनका भविष्य अब क्या होगा? दरअसल, ये सवाल इसलिए और भी अहम हो जाता है क्योंकि उत्तर प्रदेश में चुनाव होने जा रहे हैं और राकेश टिकैत कई बार अपनी सियासी महत्वाकांक्षा जाहिर कर चुके हैं। वह विधानसभा और लोकसभा चुनाव लड़ चुके हैं, राजनीतिक दल से जुड़े भी रहे।
…तो राकेश टिकैत आगे क्या करेंगे?
संभावनाओं से जुड़े इन्हीं सवालों की तलाश उनके अतीत में छिपी है। राकेश टिकैत का जन्म उत्तर प्रदेश में किसानों के बड़े नेता माने जाने वाले महेंद्र सिंह टिकैत के घर 1975 में हुआ। शुरुआत में वह किसान आंदोलन या सियासत से दूर थे। उन्होंने मेरठ यूनिवर्सिटी से एमए किया और फिर एलएलबी करने के बाद यूपी पुलिस में कांस्टेबल चयनित हुए।
इसी दौरान 1993-94 में महेंद्र सिंह टिकैत ने किसानों का बड़ा आंदोलन छेड़ा। ये वो दौर था, महेंद्र सिंह टिकैत से राज्य और केंद्र की सरकार घबराती थीं। इस आंदोलन की तपिश भी दिल्ली तक महसूस की जाने लगी। सरकार किसी भी तरह से इस आंदोलन को समाप्त कराना चाहती थी लेकिन महेंद्र सिंह टिकैत पीछे हटने को तैयार नहीं थे। कहा जाता है कि इसी प्रयास में दिल्ली पुलिस के अफसरों ने राकेश टिकैत पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। इसके बाद आखिरकार राकेश टिकैत ने नौकरी ही छोड़ दी और घर वापस आ गए।
यहीं से राकेश टिकैत का सामाजिक जीवन शुरू होता है। राकेश अपने पिता महेंद्र सिंह टिकैत की भारतीय किसान यूनियन में शाामिल हो गए और किसानों के लिए काम करने लगे। 2011 महेंद्र सिंह टिकैत की मृत्यु के बाद राकेश टिकैत ने अपने भाई नरेश के साथ भारतीय किसान यूनियन की बागडोर संभाल ली। नरेश टिकैत भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष बने, जबकि राकेश राष्ट्रीय प्रवक्ता बने। टिकैत परिवार बालियान खाप से है और इस खाप का नियम है कि परिवार का मुखिया घर का बड़ा ही होता है लिहाजा राकेश टिकैत भले ही संगठन के सारे फैसले लेते हों लेकिन अध्यक्ष नरेश को ही बनाया गया।
महेंद्र सिंह टिकैत हमेशा सियासत से दूर रहे, वह किसानों के बीच ही रहे और भारतीय किसान यूनियन को गैर-राजनीतिक संगठन के रूप में स्थापित किया लेकिन राकेश टिकैत की महत्वाकांक्षा कुछ और दिखी। राकेश टिकैत लगातार भारतीय किसान यूनियन के जरिए राजनीति में प्रवेश का ताना-बाना लगातार बुनने की कोशिश में रहे। इसी कोशिश में उन्होंने 2007 में मुजफ्फरनगर की खतौली विधानसभा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा लेकिन यहां उनकी बुरी हार हुई। यही नहीं महेंद्र सिंह टिकैत के कद के चलते राकेश की ये हार पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गई। वैसे राकेश टिकैत ने इसके बाद भी हार नहीं मानी और 2014 में आखिरकार उन्होंने राष्ट्रीय लोकदल का दामन थाम लिया और अमरोहा से लोकसभा चुनाव मैदान में उतरे लेकिन यहां भी नतीजे में उन्हें हार ही मिली।
एक तरफ राकेश टिकैत की चुनावों में हार और भारतीय किसान यूनियन की जन आंदोलनों से दूरी धीरे-धीरे संगठन की जड़ें कमजोर करती दिखी लेकिन अब पिछले एक साल से स्थितियां काफी बदल चुकी है। किसान आंदोलन ने भारतीय किसान यूनियन को बड़ी ताकत दे दी है। यही नहीं, राकेश टिकैत भी लगातार सुर्खियों में हैं और उनका कद भी अब काफी बड़ा हो गया है। उनके एक आह्वान पर किसान प्रदर्शन, धरना, आंदोलन कर रहे हैं।
अब राकेश टिकैत के भविष्य की करें तो किसान आंदोलन के दौरान ही एक इंटरव्यू में राकेश टिकैत ने यूपी चुनाव में उतरने के सवाल पर अहम बयान भी दिया था। उन्होंने कहा था कि आगे चुनाव लड़ने का इरादा नहीं है। हमें चुनाव नहीं लड़ना है। चुनाव लड़ना सबसे बड़ी बीमारी है। पर साथ ही उन्होंने ये बात भी जोड़ी थी कि हमें वोट देने का हक है, चुनाव लड़ने का भी हक है।
वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र कुमार कहते हैं कि इसमें कोई शक नहीं कि किसान आंदोलन ने राकेश टिकैत का कद काफी बढ़ा दिया है। ये उनके जीवन का भी टर्निंग प्वाइंट साबित हो सकता है। उनके चुनाव लड़ने के पिछले अनुभव अच्छे नहीं रहे, वहीं किसान नेता के तौर पर पूरे देश में उनकी छवि बनकर उभरी है। ऐसे में संभावना ज्यादा है कि वह अपने पिता महेंद्र सिंह टिकैत की राह पकड़ेंगे।
राजेंद्र कुमार कहते हैं कि राकेश टिकैत के बयान, ट्वीट पर नजर डालें तो उनकी हर अपील और बयान को पश्चिम उत्तर प्रदेश का किसान काफी गंभीरता से लेता है। ऐसी स्थिति में वह वेस्ट यूपी में किंगमेकर की भूमिका में नजर आ सकते हैं, उनके बयान से पार्टियों को समर्थन देने या नहीं देने पर किसान विचार कर सकते हैं। वहीं अगर वह राजनेता की तरह चुनाव में उतरते हैं तो इससे उनका कद कम होगा। अब देखना ये है कि किसान आंदोलन के बाद राकेश टिकैत किस राह को पकड़ते हैं? क्या वह अभी भी सियासत में ऊंचाइयां हासिल करने की हसरत रखते हैं या फिर पिता महेंद्र सिंह टिकैत का रास्ता ही उनका भविष्य है?
-एजेंसियां

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