अरबों में खरीदी जा रहीं IPL टीमों की कमाई का आखिर राज क्या है?

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड BCCI ने इंडियन प्रीमियर लीग यानी IPL के लिए दो नई टीमों की घोषणा कर दी। सोमवार 25 अक्टूबर को इन टीमों का ऐलान किया गया। लखनऊ और अहमदाबाद अब आईपीएल की दो नई टीमें हैं। कोलकाता के दिग्गज उद्योगपति संजीव गोयनका के आरपी-एसजी समूह ने सोमवार को इंडियन प्रीमियर लीग की लखनऊ फ्रेंचाइजी 7090 करोड़ रुपये में खरीदी जबकि अंतर्राष्ट्रीय इक्विटी निवेश फर्म सीवीसी कैपिटल ने अहमदाबाद फ्रेंचाइजी 5600 करोड़ रुपये की बोली लगाकर अपने नाम की।
सीसीआई को आईपीएल की शुरुआत में साल 2008 में सभी फ्रैंचाइजी बेचकर 2900 करोड़ रुपये की कमाई हुई। यह 14 साल पुरानी बात है। तब एक डॉलर की कीमत 40 रुपये थी।
आईपीएल की पहली नीलामी में मुंबई इंडियंस की टीम सबसे महंगी बिकी थी। इसके लिए उसने 111.9 मिलियन डॉलर रकम दी थी। वहीं राजस्थान रॉयल्स के लिए 67 मिलियन डॉलर के साथ सबसे सस्ती टीम थी। हम आगे जानेंगे कि हर फ्रैंचाइज का खर्च करने का मॉडल अलग था। मुंबई और चेन्नई की टीम बेस्ट खिलाड़ियों पर खर्च कर रही थीं वहीं पंजाब और राजस्थान का मॉडल अलग था।
लेकिन, चलिए फ्रैंचाइज ट्रेंड को अलग रखते हैं। शुरुआती 8 टीमों की नीलामी के बाद बीसीसीआई न दो नई फ्रैंचाइजी बेंची। सहारा पुणे वॉरियर्स और कोच्चि टस्कर्स। ये दोनों ही टीमें अब आईपीएल का हिस्सा नहीं हैं। इनसे बोर्ड को 3230 करोड़ रुपये की कमाई हुई। दोनों टीमें अलग कारणों से आईपीएल से अलग हुईं।
सहारा को बोर्ड से मैचों की संख्या और पेमेंट को लेकर विवाद था। वहीं कोच्चि को बोर्ड से कोई समस्या नहीं थी। उनकी समस्या अंदरूनी हिस्सेदारी को लेकर थी और इसका फाइनैंस को लेकर कोई विवाद नहीं था। यह गलत जानकारी है कि उनके पास पैसे की कमी थी और वे भुगतान नहीं कर पा रहे थे।
11 साल बाद बोर्ड ने दो नई फ्रैंचाइजी बेची हैं। सीवीसी ने अहमदबाद की टीम को 5625 करोड़ रुपये में खरीदा है। वहीं लखनऊ के लिए RPSG ने 7090 करोड़ रुपये दिए हैं। यह कुल मिलाकर 12715 करोड़ रुपये बनते हैं। अब फिलहाल इन दोनों टीमों को एक ओर रखते हैं और शुरुआती 8 टीमों को देखते हैं तो 14 साल से बनी हुईं हैं।
2008 में बीसीसीआई ने 8 टीमें बेची थीं। इसके साथ ही आईपीएल के प्रसारण अधिकार भी बेचे थे। हालांकि इसे लेकर कुछ विवाद थे- लेकिन हम बड़ी तस्वीर पर ध्यान लगाते हैं। 8200 करोड़ रुपये 10 साल के लिए फ्रैंचाइजी अधिकार दिए गए। रीयल एस्टेट कंपनी DLF को पहले पांच साल के लिए 200 करोड़ रुपये में टाइटल स्पॉन्सर बनाया गया।
जब आधिकारिक पार्टनर आ गए तो बीसीसीआई की शुरुआती कमाई 8400 रुपये थे। शुरुआत में बोर्ड की हिस्सेदारी कम थी। पहले 3 साल के लिए फ्रैंचाइजी को कमाई का 80 पर्सेंट और बोर्ड को 20 पर्सेंट मिलता था। इसके बाद अगले तीन साल के लिए बोर्ड को 30 और फ्रैंचाइजी को 70 पर्सेंट भागीदारी मिलती। उसके बाद अगले तीन साल के लिए बोर्ड की हिस्सेदारी बढ़कर 40 पर्सेंट और फ्रैंचाइजी की घटकर 60 पर्सेंट रह गई। उसके बाद से यह 50-50 मॉडल पर आ गया।
यही मॉडल अब भी काम कर रहा है। बोर्ड सेंट्रल रेवेन्यू का 50 पर्सेंट खुद लेता है और बाकी 50 प्रतिशत आठों फ्रैंचाइजी में बराबर बांटा जाता है। शुरुआत में बोर्ड ने फ्रैंचाइजी को ज्यादा हिस्सा दिया क्योंकि हर कोई इस बिजनेस में नया था।
फ्रैंचाइजी शुरू के 6-7 साल में मुश्किल से कमाई और खर्च को बराबर कर पा रहे थे। हर फ्रैंचाइजी अपना बिजनेस मॉडल अपना रही थी। फ्रैंचाइजी हर साल बीसीसीआई को फीस देते थे। उदाहरण के लिए अगर मुंबई ने टीम 111.9 मिलियन डॉलर खरीदा है तो उसे हर साल 11.9 मिलियन डॉलर हर साल देने थे।
हालांकि आईपीएल बहुत तेजी से बढ़ रहा था। साल 2017 में स्टार इंडिया ने 2018-22 के प्रसारण अधिकार के लिए 16347 करोड़ रुपये का भुगतान किया। वीवो ने टाइटल राइड्स के लिए 2200 करोड़ रुपये दिए। कुल मिलाकर चार आधिकारिक पार्टनर साथ आए और करीब 40 करोड़ रुपये देने को राजी हुए इसलिए आईपीएल की कमाई जो साल 2008 में 8400 करोड़ रुपये थी वह 2017 में 19500 करोड़ रुपये हो गई। कोच्चि और सहारा अब साथ नहीं थे, इसका अर्थ था कि 19500 करोड़ रुपये बीसीसीआई और आठों फ्रैंचाइजी में बराबर बंटनी थी।
सोमवार तक यही स्थिति थी। अब लखनऊ और अहमदाबाद की टीमें आने से कमाई में जबर्दस्त बढ़ोत्तरी होने वाली है लेकिन फिलहाल उसे हम एक ओर रखते हैं। अब देखते हैं कि 2017-18 से 2021-22 के बीच रेवेन्यू मॉडल कैसे काम करता है।
सबसे पहले आईपीएल एक ऐसा बिजनेस मॉडल है जिसमें आप फ्रैंचाइजी की पूरी एक साथ नहीं देनी होती। यानी टीम के मालिक 10 साल तक इसका भुगतान करते हैं। और वह भी बिना किसी ब्याज के। और जैसे ही आप टीम खरीदते हैं, आपकी कमाई पहले साल से ही शुरू हो जाती है।
50:50 अनुपात पर बात करें तो 9750 करोड़ रुपये का आधा हिस्सा बोर्ड के पास रहेगा और बाकी आधा आठों फ्रैंचाइजी में बराबर बंटेगा। यानी हर फ्रैंचाइजी को पांच साल के लिए 1218 करोड़ रुपये की कमाई हो रही थी।
तो, कुल मिलाकर हर फ्रैंचाइजी 2018 से 2022 के बीच हर साल 244 करोड़ रुपये कमाई कर रहा है। दो नई फ्रैंचाइजी आ रही हैं तो नंबर्स में बदलाव होगा लेकिन फिलहाल 244 करोड़ रुपये को ही आधार बनाते हैं।
आईपीएल में कमाई के दो जरिए हैं। सेट्रल और स्थानीय। सेंट्रल को हम पहले ही बता चुके हैं। जिसमें एक टीम को हर सीजन में 244 करोड़ रुपये की कमाई हो रही थी। अब लोकल रेवेन्यू पर बात करते हैं। यह वह रेवेन्यू है जो फ्रैंचाइजी अपने स्तर पर बनाती हैं। यह उनका अपना बिजनेस मॉडल होता है।
तो स्थानीय रेवेन्यू क्या होता है? इसमें टिकट से होने वाली कमाई। जर्सी स्पॉन्सरशिप, हॉस्पीटेलिटी आदि से होने वाला रेवेन्यू है। कोरोना के कारण टिकटों की बिक्री नहीं हुई। चलिए बाकी चीजें देखते हैं। मुंबई इंडियंस ने अतिरिक्त 50 करोड़ की स्पॉन्सरशिप जुटा ली। कई अन्य टीमों को परेशानी हुई।
गेट मनी जो हर मैच में करीब 25-30 लाख रुपये होती है भी मैदान पर निर्भर करती है। इसमें मैदान का आकार और शहर के लोगों की खर्च करने की क्षमता भी मायने रखती है। हर फ्रैंचाइजी का इस हॉस्पीटेलिटी को लेकर अलग अंदाजा होता है। ये नंबर्स बदलते रहते हैं।
कुल मिलाकर- चलिए मानकर चलते हैं कि लोकल रेवेन्यू लगभग 40 से 70- करोड़ रुपये के बीच होगा। हिसाब लगाने के लिए इसे 50 करोड़ रुपये औसत मान लेते हैं। इतना फ्रैंचाइजी अपने जरिए कमाई करते हैं।
अब इस 50 करोड़ को 244 करोड़ रुपये की उसकी सेंट्रल रेवेन्यू की कमाई में जोड़ दें। तो यह रकम 295 करोड़ रुपये हो जाती है। इसमें बीसीसीआई से आने वाली कमाई को जोड़ दें तो टॉप 4 टीमें हर साल 300 करोड़ रुपये से ज्यादा कमा रही हैं।
अब टीमों के खर्चे की बात करते हैं। टीमों को प्लेयर्स पर 90 करोड़ रुपये खर्च करने होते हैं। इसके अलावा 35-50 करोड़ रुपये की रकम ऑपरेशंस पर खर्च होती है। यह फ्रैंचाइजी के काम के स्केल पर निर्भर करता है। कुल मिलकर यह एक सीजन में 130 करोड़ रुपये का औसत बनता है।
फ्रैंचाइजी को हर मैच के आयोजन के लिए 50 लाख रुपये की फीस देनी होती है। यानी सात मैचों के लिए 3.5 करोड़ रुपये- हर सीजन। फ्रैंचाइजी को अपने टॉपलाइन रेवेन्यू का 20 पर्सेंट बीसीसीआई को देना पड़ता है। बोर्ड इस रकम को घरेलू क्रिकेट पर खर्च करता है।
20 पर्सेंट टॉप लाइन का अर्थ है हर साल 12 से 15 करोड़ रुपये। यानी कुल मिलकर हर फ्रैंचाइजी का औसत खर्च करीब 145 करोड़ रुपये है। इसका अर्थ है कि हर फ्रैंचाइजी करीब 145 करोड़ रुपये की कमाई (जिसमें टैक्स शामिल नहीं है) कर रहा है।
जो संख्या मैंने ली है वह कम से कम है। मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसी फ्रैंचाइजी ज्यादा रकम कमाती हैं। इसकी वजह स्पॉन्सरशिप और अन्य लॉन्ग टर्म ऐक्टिविटीज शामिल हैं। कुछ विश्व-स्तरीय अकदामिक और कुछ सारा साल ब्रांड में खर्च करती हैं।
-एजेंसियां

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