“सिंगल पार्टी सोसाइटी” है पश्‍चिम बंगाल, सत्ता के साथ बदल जाती है लोगों की निष्‍ठा

कोलकाता में तेज़ बारिश हो रही थी और तंग गलियों की कीचड़ से भरी सड़क के किनारे एक हनुमान मंदिर के बाहर हम विकास कुमार का इंतज़ार कर रहे थे.
विकास का ये असली नाम नहीं है, उनके मुताबिक सालों तक उन्होंने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के काउंसलर के लिए चुनाव में गोली चलाने, अवैध वसूली, लोगों को धमकाने, पीटने जैसे काम किए हैं.
इसके बदले उन्हें निर्माण कार्य के लिए कच्चा माल ऊँचे दाम पर बेचने की छूट थी जिससे महीने में कभी-कभी उनकी तीन से साढ़े तीन लाख रुपये तक की कमाई हो जाती थी. बिल्डर उन्हीं से कच्चा माल ख़रीदने के लिए मजबूर थे, नहीं तो उनकी खैर नहीं थी.
इस राजनीतिक और आर्थिक रैकेट को पश्चिम बंगाल में ‘सिंडिकेट’ कहा जाता है और कमाई का हिस्सा नीचे से होते हुए कई स्तरों तक ऊपर जाता है.
विकास जैसे लड़ाके पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा के ज़मीनी सूत्रधार हैं. विकास बताते हैं कि उनके जैसे युवा पहले सत्ता में रहे वामपंथी दलों के लिए काम करते थे. सत्ता बदली तो उनकी वफ़ादारी भी बदल गई.
मुलाक़ात से पहले फ़ोन पर विकास की आवाज़ में डर था कि कहीं किसी को पता न चल जाए. कोलकाता के बाहर पुरुलिया, बीरभूम में भी लोगों ने मुझे इस ‘डर’ के बारे में बताया था.
रबिंद्रनाथ टैगोर से जुड़े विश्व प्रसिद्ध शांति निकेतन में जब हमने एक राजनीतिक कार्यकर्ता से संपर्क करने की कोशिश की तो जवाब मिला, “अगर लोगों को इस मुलाकात के बारे में पता चला तो मेरे पूरे परिवार को मार दिया जाएगा.”
राजनीति पर बात करते हुए क्यों डरते हैं लोग
बीरभूम ज़िले के शांति निकेतन में एक अध्यापक ने बेहद धीमी आवाज़ में मुझसे कहा, “डर जैसे हमारी नसों में घुस गया है. पंचायत चुनावों के दौरान टीएमसी कार्यकर्ताओं ने लोगों को धमकी दी कि अगर उन्होंने पार्टी को वोट नहीं दिया तो उनकी माँ-बेटियों के साथ बलात्कार किया जाएगा. आजकल जब हम राजनीति पर बात करते हैं तो पलट कर देख लेते हैं कि कहीं कोई सुन तो नहीं रहा. मैं गैर-राजनीतिक हूँ तब भी डरा हुआ हूँ.”
मई में हुए पंचायत चुनाव में क़रीब तीस प्रतिशत सीटों पर विपक्षी पार्टियों ने उम्मीदवार खड़े नहीं किए और टीएमसी के उम्मीदवार को निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया गया, विपक्ष का कहना है कि ऐसा ‘टीएमसी के आतंक’ की वजह से हुआ.
पंचायत चुनाव में विपक्षी दलों ने आरोप लगाया था कि टीएमसी ने उनके उम्मीदवारों को हिंसा का डर दिखाकर नामांकन पत्र दाखिल करने से रोका था. बीरभूम के देबुराम अनायपुर गांव में हमें भाजपा उम्मीदवार देबब्रत भट्टाचार्य मिले जिनका आरोप था कि टीएमसी समर्थकों ने उन्हें एक पुलिस स्टेशन में घुसकर इतना पीटा कि उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा.
उन्होंने स्थानीय टीएमसी नेता गदाधर हाजरा का नाम लिया, लेकिन हाजरा ने किसी हिंसा से इनकार किया और कहा “बंगाल के लोग टीएमसी के अलावा किसी को वोट नहीं देना चाहते.”
हाजरा कहते हैं, “यहां सीपीएम, कांग्रेस और भाजपा नेता सभी हैं, लेकिन किसी के पास ज़मीन पर कार्यकर्ता नहीं हैं. हमने यहां साढ़े सात साल में जो विकास किया वो सीपीएम के 35 सालों में नहीं हुआ. हमने विपक्षी दलों से कहा कि अगर कोई नामांकन दाखिल करना चाहता है तो हम उसकी मदद करेंगे, लेकिन कोई सामने नहीं आया. हम लोगों पर अपने ख़िलाफ़ खड़ा होने के लिए दबाव नहीं डाल सकते.”
‘डराने-धमकाने की बात झूठ है’
‘केश्टो’ के नाम से जाने जाने वाले विवादास्पद टीएमसी नेता अनुब्रत मंडल को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का नज़दीकी बताया जाता है. एक वीडियो क्लिप में अनुब्रत मंडल एक राजनीतिक सभा को संबोधित करते दिखाई देते हैं, जिसमें उन्हें बलात्कार की धमकी देते सुना जा सकता है, लेकिन वे इसे ग़लत बताते हैं.
वीडियो कॉल पर बीबीसी से बातचीत में बीरभूम में टीएमसी के ज़िला प्रमुख अनुब्रत मंडल ने कहा, “नहीं, बिल्कुल नहीं. ये सब झूठ है. आप बीरभूम आइए, घरों में जाइए तो आपको ये सब कभी सुनने को नहीं मिलेगा. अगर कोई ऐसा कहता है तो मैं राजनीति छोड़ दूँगा.”
उन्होंने कहा, “मेरे ज़िले बीरभूम में 11 विधानसभा क्षेत्र हैं और यहां कभी हिंसा नहीं हुई. सभी खुश हैं और शांति से रह रहे हैं. जो हल्की-फुल्की हिंसा हुई है वो भाजपा का किया-धरा है क्योंकि सीपीआई (एम) के सभी चोर और गुंडे भाजपा में शामिल हो गए हैं.”
भारत के दूसरे हिस्सों में जहाँ जाति या धर्म को लेकर हिंसा होती है, पश्चिम बंगाल में “लोगों का अस्तित्व राजनीतिक पार्टियों पर निर्भर है.” पार्टी से नज़दीकी की वजह से हर सरकारी काम आसान हो जाता है, हालांकि हर सेवा की क़ीमत होती है. ये परंपरा पुरानी है.
कुछ साथियों के साथ हुई मारपीट के कारण विकास कुमार ने हाल ही में पुराना रास्ता छोड़ दिया. लंबे इंतज़ार के बाद 20 साल के विकास हमारी गाड़ी तक पहुंचे.
कैसे डराया धमकाया जाता है?
बारिश से उनके बाल सिर से चिपके हुए थे. भीगे चेहरे पर अनिश्चितता के भाव थे. टी-शर्ट, जींस और स्पोर्ट शूज़ पहने विकास किसी कॉलेज स्टूडेंट जैसे लग रहे थे हालांकि उन्होंने आठवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी.
हम उनके दोस्त सुरेश (बदला हुआ नाम) के घर पहुंचे. सुरेश के मुताबिक़ वो भी टीएमसी के लिए काम कर चुके थे. सुरेश बताते हैं, ”कई लड़के नशे का ख़र्च पूरा करने के लिए ये काम करते हैं. हमें काम के बदले दारू या ड्रग्स मिल जाती थी. पुलिस परेशान करती थी तो काउंसलर उसे फ़ोन कर देता था.”
डराने-धमकाने के लिए सुरेश और उनके साथियों ने चाकू, डंडे, बम और बंदूकों का इस्तेमाल किया. सुरेश के मुताबिक़ एक बार उन्होंने एक इमारत के मालिक को तीसरे माले से धक्का दे दिया था.
विकास बताते हैं, “हम 25-30 लोग पोलिंग बूथ के सामने खड़े हो जाते थे और जो लोग वोट डालने आते थे, उनसे कहते थे कि उनका वोट तो पहले ही पड़ चुका है और वो घर चले जाएँ, मैंने कई बार सीपीएम के दफ़्तरों में तोड़फोड़ की.”
“जब मेरे पास बंदूक थी तो मुझे लगता था मेरे हाथों में ताक़त है, हम मीडिया को भी नज़दीक नहीं आने देते थे.”
‘लोगों की पहचान पार्टी के आधार पर होती है’
सुरेश कहते हैं, “जो लोग पहले ये काम सीपीआई(एम) के लिए करते थे, वही आज टीएमसी के लिए काम करते हैं.”
बदलती वफ़ादारियों और पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा के तार लाखों करोड़ों के संस्थागत सरकारी बजट पर कब्ज़े की होड़ और अतीत के राजनीतिक ढांचे से जुड़े हैं.
पश्चिम बंगाल की जनसंख्या के हिसाब से यहां उद्योग और आर्थिक मौके कम हैं, इसलिए लोगों की राजनीतिक दलों पर निर्भरता बहुत ज़्यादा है.
कोलकाता में राजनीतिक विश्लेषक डॉक्टर मइदुल इस्लाम पश्चिम बंगाल को “सिंगल पार्टी सोसाइटी” बताते हैं जहां वामपंथियों ने 33 साल राज़ किया और अब तृणमूल सात सालों से सत्ता में है.
वो कहते हैं, “पश्चिम बंगाल में लोगों की पहचान पार्टी के आधार पर होती है कि आप किस पार्टी से जुड़े हैं. उनका हिंदू या मुसलमान होना बैकग्राउंड में चला जाता है.”
चुनावी हार का मतलब करोड़ों का नुकसान
लड़कियों के लिए सरकारी सुविधा हासिल करना हो, या फिर सरकारी नौकरी ढूंढना, जब तक पार्टी साथ खड़ी न हो, सुविधा मिलना आसान नहीं. पार्टियों के साथ ये जुड़ाव सीपीएम के ज़माने से है.
ज़िला परिषद, पंचायत समिति और ग्राम पंचायत से बनी तीन परतों वाली पंचायती राज प्रणाली के करोड़ों के बजट पर नियंत्रण के लिए लड़ाई होती है क्योंकि चुनावी हार का मतलब है करोड़ों का नुकसान.
डॉक्टर इस्लाम कहते हैं, “दांव पर बहुत कुछ है इसलिए हिंसा भी बहुत ज़्यादा है.”
पुरुलिया ज़िले में भाजपा कार्यकर्ताओं–त्रिलोचन महतो और दुलाल कुमार–दोनों के परिजन उनकी मौत को राजनीतिक हिंसा का ताज़ा उदाहरण बता रहे हैं.
राजनीतिक हत्या
त्रिलोचन महतो का शव एक पेड़ से लटका मिला जबकि दुलाल का एक पावर ट्रांसमिशन लाइन से. स्थानीय पुलिस और प्रशासन मौत के कारणों पर खामोश हैं.
कोलकाता से पुरुलिया तक जहां सड़कें, इमारतें, टोल प्लाज़ा, दुकानें तृणमूल के झंडों से पटे पड़े थे, पुरुलिया में घुसते ही भाजपा का कमल चुनाव निशान लोगों के घरों, दुकानों पर दिखना शुरू हो जाता है. दुलाल के गांव ढाभा के पास ही 18 वर्षीय त्रिलोचन का सुपर्डी गांव है.
त्रिलोचन महतो शाम को ग़ायब हुए और अगले दिन तड़के उनका शव पेड़ से लटका मिला.
त्रिलोचन की सफ़ेद टीशर्ट पर एक संदेश लिखा था-“इतनी कम उम्र में भाजपा में शामिल होने के कारण तुम्हारी मौत हुई.”
त्रिलोचन के घर की अंदरूनी और बाहरी दीवारों पर भाजपा का चुनाव चिह्न कमल बना था जिसे उन्होंने ख़ुद बनाया था.
कमज़ोर और बीमार लग रहे त्रिलोचन के पिता हरिराम महतो पड़ोसियों से घिरे पास ही चारपाई पर बैठे थे. वो निराशा भरी नज़रों से ज़मीन की ओर एकटक देखे जा रहे थे.
वो कहते हैं, “त्रिलोचन मेरा सबसे छोटा बेटा था. कॉलेज में उसकी परीक्षा चल रही थी. आज भी उसकी परीक्षा थी. अगर उसकी जगह मुझे मार देते तो कम-से-कम मेरा बेटा ज़िंदा रहता. कोई भी उस पिता का दर्द नहीं समझ सकता जिसने अपना बेटा न खोया हो.” ऐसा कहकर वो रोने लगते हैं.
गांव से ग़ायब होने के कुछ देर बाद त्रिलोचन के भाई शिवनाथ को एक फ़ोन आया. फ़ोन की दूसरी तरफ़ त्रिलोचन थे.
शिवनाथ बताते हैं, “मेरा भाई रो रहा था और हाँफ रहा था. वो बार-बार कह रहा था कि उसे माँ से बात करनी है. उसने मुझे बताया कि उसे मोटरसाइकिल सवार पांच लोगों ने उठा लिया है, उसके हाथों को बांध दिया गया है और वो उन्हें अटकट्ठा के जंगल ले जा रहे हैं. उसने बताया कि उसकी आंखों पर कपड़ा बंधा था, पिटाई की गई थी और उन्हें जान से मार देने की धमकी दी गई थी.”
‘टीमएमसी के लोगों से धमकियां मिलती थीं’
शिवनाथ के मुताबिक ये बातचीत तीन से चार मिनट चली. जब तक शिवनाथ मां तक पहुंचते फ़ोन कट गया. शिवनाथ के अनुसार पुलिस ने कॉल लोकेशन के आधार पर रात भर त्रिलोचन को ढूंढने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली. अगले दिन तड़के गांव के बाहर खेतों के बीच उनका शव एक पेड़ से लटका मिला.
घर के अंदर एक साड़ी में लिपटी उनकी मां पाना महतो एक कुर्सी पर बैठी थीं. भारी पलकें, चेहरे पर गहरी उदासी के भाव.
पाना महतो ने कहा, “मेरा बेटा हमेशा कहता था कि उसे टीमएमसी के लोगों से धमकियां मिलती हैं, लेकिन उसने किसी का नाम नहीं लिया. मैंने कभी भी ज़ोर लगाकर नहीं पूछा.”
पास ही के ढाभा गांव में दुलाल कुमार का परिवार रहता है. उनकी मौत की परिस्थितियाँ त्रिलोचन से बहुत अलग नहीं हैं.
गाँव में घुसते ही एक तालाब है जिसके सामने बिजली का एक ट्रांसमिशन टावर है जहां एक जून की सुबह तीन बच्चों के 32 साल के पिता दुलाल कुमार का शव लटका पाया गया था. उनकी कमर में एक अंगोछा बंधा था.
‘बेटे की मौत की सीबीआई जांच हो’
मौत के बाद ख़ौफ़ का ये आलम है कि लोग रात में गांव में पहरा देते हैं.
दुलाल के पिता महावीर कहते हैं, “पुलिस का कहना है कि उसने आत्महत्या की, लेकिन क्या किसी ने उसे आत्महत्या करते देखा? मौत की सीबीआई जांच होनी चाहिए.”
महावीर कुमार की गांव में एक दुकान है जहां दुलाल दिन में तीन बार खाना पहुंचाने जाते थे. दुलाल 31 मई शाम से ग़ायब थे. उनकी मोटर साइकिल तालाब के किनारे मिली.
पेड़ के नीचे एक चारपाई पर बैठे महावीर के मुताबिक ग़ायब होने से एक दिन पहले ही कुछ टीएमसी सदस्यों ने गांव के निकट दुलाल को धमकाते हुए कहा था, “तू बहुत नेतागिरी दिखा रहा है. हम तुझे देख लेंगे.”
आसपास के इलाकों में रात भर दुलाल को खोजा गया, लेकिन उनका पता नहीं चला. अगले दिन तड़के सुबह उनका शव टावर से लटका मिला.
महावीर कहते हैं, “मैं अपने बेटे से बहुत प्यार करता था. पूरे बलरामपुर इलाके में कोई भी उसे नापसंद नहीं करता था. आप पुलिस से पूछ लीजिए. राजनीति के कारण मेरे बेटे की मौत हुई.”
‘सीपीएम शासन में ऐसी हिंसा नहीं देखी’
भाजपा से पहले सीपीएम को तीन दशक तक समर्थन देने वाले और पांच सालों तक सीपीएम के लिए काम करने वाले महावीर के मुताबिक, “हमने 33 साल सीपीएम का शासन देखा लेकिन कभी भी इलाके में ऐसी हिंसा नहीं देखी. क्या टीएमसी को हमेशा सत्ता में रहने का अधिकार है?”
पुरुलिया के डीएम आलोकेश प्रसाद राय ने कहा वो इस मामले पर कुछ नहीं कहेंगे, उन्होंने एसपी आकाश मघारिया से मिलने की सलाह दी. आकाश मघारिया ने कहा कि वो भी कुछ नहीं कहेंगे क्योंकि मामला सीआईडी के पास है.
टीएमसी के एक स्थानीय नेता सृष्टिधर महतो ने मामले में किसी पार्टी कार्यकर्ता की भूमिका से इंकार किया. टीएमसी नेता और सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने ट्वीट किया और कहा कि बंगाल से लगे झारखंड सीमा की भी जाँच होनी चाहिए.
उन्होंने कहा, ”भाजपा, बजरंग दल के कौन से लोग शामिल थे? जाँच में ये बातें सामने आनी चाहिए.”
अपनों को खोने का दर्द दूसरी ओर भी है
पुरुलिया से लगे बीरभूम ज़िले में दिलदार शेख़ का परिवार रहता है. परिजनों का आरोप है कि भाजपा कार्यकर्ताओं ने दिलदार शेख़ की हत्या कर दी. दिलदार की मौत से उनकी मां अंगूरा बीबी को जैसे दुनिया का होश नहीं है.
जब हम उनके कोठरीनुमा घर में पहुंचे तो सामने बरामदे में बदहवास-सी घूम रही थीं.
उनके मुँह से कुछ शब्द निकले, “मेरा बेटा घर के बाहर गया और उसके बाद मैंने उसकी लाश देखी. मैं अपने बेटे के दर्द के साथ ही मर जाऊंगी.” उनके परिवार ने घर से दिलदार की तस्वीरें हटा दी हैं क्योंकि वो उस तस्वीर को देखकर घंटों रोया करती थीं.
दिलदार के एक रिश्तेदर रोशन ख़ान के मुताबिक जब दिलदार टीएमसी कार्यकर्ताओं के साथ नामांकन दाखिल करने जा रही एक भीड़ में शामिल थे तब ”भाजपा समर्थकों ने बम और पिस्तौल से हमला किया” जिसमें दिलदार मारे गए.
दिलदार ठेकेदारी का धंधा करते थे और अपने परिवार में एकमात्र कमाने वाले व्यक्ति थे. उनका परिवार पहले कांग्रेस समर्थक था और 1998 से टीएमसी के साथ था.
रोशन ख़ान ने बताया, “ममता बनर्जी ने हमें कन्याश्री, रूपश्री जैसी सरकारी योजनाओं के अलावा ढेर सारी मेडिकल सुविधाएँ मुहैया करवाई हैं.”
पश्चिम बंगाल में हिंसा का इतिहास पुराना है.
प्रोफ़ेसर इस्लाम कहते हैं, “बंगाल में 1910, 1920 से ही क्रांति का सिलसिला है, खुदीराम बोस, बिनय, बादल, दिनेश से लेकर, सूर्य सेन को देखिए तो पश्चिम बंगाल में हिंसा का असर था. बंगाली समाज दूसरे समाज से अलग है. नक्सल पीरियड में पश्चिम बंगाल में काफ़ी हिंसा हुई.”
प्रोफ़ेसर इस्लाम के मुताबिक पश्चिम बंगाल में भद्रलोक (अभिजात्य वर्ग) जहाँ शहरों के कुछ हिस्सों तक सीमित रह गए हैं, राज्य के नए राजनीतिक खिलाड़ी ग़रीब और निचले मध्यम-वर्गों से आ रहे हैं और ये नए वर्ग बदले राजनीतिक माहौल में अपना दावा बलपूर्वक पेश कर रहे हैं.
पुरुलिया में भाजपा के नेता अपने भाषणों में राज्य की तुलना सीरिया और इराक़ से कर रहे हैं. वो ममता बनर्जी को ‘हिंदू विरोधी’ बताकर भरोसा जता रहे हैं कि आने वाले 2019 चुनाव में उन्हें इस घटना से राजनीतिक फ़ायदा ज़रूर होगा.
उधर टीएमसी नेताओं का दावा है कि भाजपा लोकसभा चुनाव की तैयारियों के तहत मामलों को तूल दे रही है क्योंकि ”भाजपा को पता है कि पश्चिम बंगाल में पार्टी का नामोनिशान ही नहीं है.”
-BBC

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