किसानों को मालामाल कर रहा है गाय के गोबर से बना Waste Decomposer

Waste Decomposer पैसा बचाकर आमदनी करवाने का माध्‍यम बना,
ना बाजार से खाद खरीदने का झंझट और ना ही गोबर को ठिकाने लगाने का

गाजियाबाद। गाय के गोबर से बनाये गए Waste Decomposer की 20 रु. की शीशी पूरे गांव के लिए खाद बना सकती है। इसमें सूक्ष्म जीवाणु हैं, जो फसल अवशेष, गोबर, जैव कचरे को खाते हैं और तेजी से बढ़ोतरी करते हैं, जिससे जहां ये डाले जाते हैं एक श्रृंखला तैयार हो जाती है, जो कुछ ही दिनों में गोबर और कचरे को सड़ाकर खाद बना देती है, जमीन में डालते हैं, मिट्टी में मौजूद हानिकारक, बीमारी फैलाने वाले कीटाणुओं की संख्या को नियंत्रित करता है।

Waste Decomposer को किसानों के लिए बहुउपयोगी बताते हुए इसे बनाने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि ये दही में जामन की तरह काम करता है। एक बोतल से एक ड्रम और एक ड्रम से 100 ड्रम बना सकते हैं। दरअसल सूक्ष्मजीव सेल्लुलोज खाकर बढ़ते हैं, और फिर वो पोषक तत्व छोड़ते हैं जो जमीन के लिए उपयोगी हैं। मिट्टी में पूरा खेल कार्बन तत्वों और पीएच का होता है। ज्यादा फर्टीलाइजर डालने से पीएच बढ़ता जाता है और कार्बन तत्व (जीवाश्म) कम होते जाते हैं, बाद में वो जमीन उर्वरक डालने पर भी फसल नहीं उगाती क्योंकि वो बंजर जैसी हो जाती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार पहले किसान और खेती का रिश्ता बहुत मजबूत था लेकिन अब उसका सिर्फ दोहन हो रहा है। किसान लगातार फर्टीलाइजर और पेस्टीसाइड वीडीसाइड डालता जा रहा है, उससे जमीन के अंदर इन तत्वों की मात्रा बढ़ गई है। उर्वरकों के तत्व पत्थर जैसे एकट्ठा हो गए हैं क्योंकि उन्हें फसल-पौधों के उपयोग लायक बनाने वाले जीवाणु जमीन में नहीं बचे हैं।

Waste Decomposer एक तो ऐसे तत्व फसल अवशेषों से खुद लेकर बढ़ाता है, दूसरा जो जमीन में उर्वरक के पोषक तत्व (लोहा, बोरान, कार्बन आदि) पड़े हैं उन्हें घोलकर पौधे के लायक बनाते हैं क्‍योंकि जिस जमीन में जीवाश्वम नहीं होंगे वो फसल बहुत दिनों तक उर्वरक के सहारे उत्पादन नहीं दे सकती। इसलिए किसानों को चाहिए हर हाल में खेत में गोबर, फसल अवशेष आदि आदि जरूर डाले।

गत वर्ष केंद्रीय कृषि कल्याण मंत्री और राधामोहन सिंह ने गाजियाबाद स्‍थित कृषि कल्याण मंत्रालय भारत सरकार के राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र का दौरा कर वैज्ञानिकों से ज्यादा से ज्यादा वेस्ट डीकम्पोस्ट बनाने की बात कही थी।

केंद्र के मुताबिक इसमें किए गए दावे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है, कई सरकारी संस्थाओं ने ही इस पर रिसर्च की है। वेस्ट डीकम्पोजर को सीधे खेत में न उपयोग करके पहले इसका कल्चर बनाया जाता है। कुछ ग्राम की इस शीशी में मौजूद तरल पदार्थ को 200 लीटर पाने से भरे एक ड्रम में डाला जाता है, जिसमें दो किलो गुड़ डाला जाता है। रोजाना इसे दो बार लक़ड़ी से मिलाना पड़ता है। पांच-6 जिनों में घोल में मौजूद ऊपरी सतह पर झाग बन जाए तो उपयोग लायक हो जाता है।

राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. जगत बताते हैं, “एक शीशी से 200 लीटर तरल खाद तैयार होती है, इसे खेत में छिड़काव कर सकते हैं। गोबर-कचरे पर डालकर उसे खाद बना सकते हैं। इससे बीज का शोधन कर सकते हैं। अगर फसल में फफूंद जैसे रोग लगे हैं तो भी उस पर छिड़काव किया जा सकता है। फिलहाल सही मात्रा में छिड़काव, सिंचाई के साथ प्रयोग से कोई नुकसान की ख़बर नहीं मिली है हमें।”

गाजियाबाद के इस सेंटर से रोजाना करीब 400 बोतलें देश भर के किसानों को भेजी जाती हैं, कई किसान खुद वहां पहुंचते हैं

गुजरात के एक गौशाला संचालक बताते हैं कि मेरी खुद की गोशाला है और देश की 10 हजार ज्यादा गोशालाओं से जुड़ा हूं। इनमें से हजारों शहरों में हैं। गोबर हमारे लिए बड़ी समस्या थी, इतनी गंदगी हो जाती है कि आसपास के लोग परेशान हो जाते हैं, इसका उपाय मुझे वेस्ट डीकम्पोजर में मिला। अब वो गोबर खाद बनता है, और गोशालोँ की आमदनी बढ़ा रहा है। वो गुजरात में शिविर लगाकर किसानों को ये कल्चर बंटवा रहे हैं। किसी गांव के एक किसान को दिया जाता हो वो ज्यादा कल्चर बनाकर दूसरे किसानों को देता है।
वेस्ट डीकम्पोजर जमीन की उर्वरा शक्ति को बढ़ाता है, मिट्टी को नया जीवन देता है, इसमें कोई शक नहीं।

किसान ये करें

देसी खादों का इस्तेमाल करता रहे, ताकि जमीन में जीवाश्म (कार्बन तत्व) कम न हों। जिस जमीन में कार्बन तत्व .5 होते हैं वो जमीन उपजाउ होती है और जिसमें ये तत्व 0.75 होते हैं वो जैविक खेती योग्य हो जाती है। मिट्टी की जांच जरुर कराएं और जमीन में जिस तत्व की कमी हो, सिर्फ वो ही तत्व (फर्टीलाइजर) के रुप में डालें। यानि जिनती जरूरत है। हरी खादों (देसी खाद, तरल खाद या किसी रुप में) में जरुर डालें जैसे ढैंचा आदि। मिश्रित खेती करें और फसल चक्र अपनाएं। खेत में कुछ पौधे धरातल पर तो कुछ ऊंचाई वाले हिस्से पर हों ऐसी फसलें ले, इससे खेत में लगी फसलें प्रकाश संस्लेषण (फोटो सिंथेसिस) का पूरा उपयोग कर जमीन में पोषक तत्व खुद बढ़ा लेंगी।

अब तक 20 लाख किसानों को फायदा मिला
देश के करीब 20 लाख किसानों को इसका फायदा मिल चुका है। जल्द ही ये संख्या 20 करोड़ तक पहुंचानी हैं। Waste Decomposer की खास बात है इसकी एक शीशी ही पूरे गांव के किसानों की समस्याओं का समाधान कर सकती है। इससे न सिर्फ तेजी से खाद बनती है, जमीन की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है, बल्कि कई मिट्टी जमीन बीमारियों से भी छुटकारा मिलता है।”

साभार: गांव कनेक्‍शन

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