आसान नहीं था सज्जन कुमार को दुर्जन साबित करना, 1992 से गायब थी दंगों की चार्जशीट

नई दिल्ली। 1984 के सिख विरोधी दंगों की चार्जशीट 1992 से गायब थी। इसी बात के कारण हाई कोर्ट को अंदाजा हुआ कि ‘दिल्ली पुलिस किस हद तक गुप्त रूप से आरोपी का साथ दे रही है।’
कोर्ट ने पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार को दोषी ठहराया और उम्रकैद सुनाई। जस्टिस एस मुरलीधर और विनोद गोयल ने दंगाइयों का बचाव करने को लेकर दिल्ली पुलिस को भी खूब फटकारा।
कोर्ट ने कहा, ‘सज्जन कुमार के नाम वाली चार्जशीट एक फाइल में रखी गई और उसे कभी कोर्ट में पेश नहीं किया गया। यह कोई साधारण केस नहीं है।’
कोर्ट ने कहा, ‘इस केस में आगे बढ़ना मुश्किल था क्योंकि यहां सज्जन कुमार के खिलाफ के मामलों को दबाने की कोशिश की गई, उन्हें दर्ज ही नहीं किया गया। मामले दर्ज हुए तो उनकी जांच ठीक तरीके से नहीं हुई और अगर हुई तो उस नतीजे तक पहुंची कि चार्जशीट फाइल की जा सके।’
हाई कोर्ट ने कहा कि 1987 में नांग्लोई थाने में दर्ज एफआईआर के बाद जांच की गई और 1992 में चार्जशीट तैयार की गई, लेकिन फाइल नहीं की गई। बल्कि 1991 के एक केस के साथ उसके क्लब होने के बाद वह कोर्ट के रिकॉर्डों से गायब हो गई, जिसमें आरोपी के रूप में सज्जन कुमार का नाम नहीं था।
कोर्ट की बेंच के मुताबिक नांग्लोई पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR नंबर 67/1987 की जांच के दौरान गुरबचन सिंह का बयान दर्ज था, जिसने सज्जन कुमार का नाम लिया था। गुरबचन ने जस्टिस रंगनाथ मिश्रा के सामने सितंबर 4 और 5, 1985 को दो हलफनामे भी दिए थे। दोनों हलफनामों में उन्होंने सज्जन कुमार का नाम लिया था लेकिन पुलिस ने केस बंद करने की सिफारिश की। जब इस पर असहमति बनी तो पुलिस ने गुरबचन के हलफनामे के आधार पर दूसरा केस दर्ज किया जिसमें सज्जन कुमार का नाम नहीं था। इस FIR का नंबर था 491/1991.
साल 2010 में अचानक हाई कोर्ट द्वारा नियुक्त टीम ने 1984 के सिख विरोधी दंगों के केस रिकॉर्डों की स्कूटनी की, जिसमें चार्जशीट मिली, जिसमें सज्जन कुमार का नाम दर्ज था। इसके बाद विशेष सरकारी वकील बीएस लून ने कोर्ट में एक ऐप्लिकेशन डालकर बताया कि ऐसे दस्तावेज मिले हैं जो सज्जन कुमार के खिलाफ केस आगे बढ़ाने के लिए अहम सबूत हैं, लेकिन इन दस्तावेजों को कोर्ट के सामने पहले कभी पेश नहीं किया गया था।
-एजेंसियां

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