बच्चों को संस्कारों का ज्ञान कराएँ परन्तु अपना ज्ञान उन पर थोपें नहीं

किसी गाँव में रहने वाले दो परिवारों में ज़मीन को लेकर विवाद बना रहता था। ज़मीनों को लेकर प्रायः विवाद बने ही रहते हैं और जब तक ज़मीन पर रहेंगे , ये झगड़े ख़त्म भी नहीं होने वाले। इतना झगड़ा था कि दोनों परिवार के मुखिया एक-दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहाते थे। समीप के रास्तों से भी नहीं गुजरते थे कि कहीं एक-दूसरे का सामना न हो जाए। दोनों के दो बच्चे थे, उन्होंने उनको एक दूसरे के अनेक दोष बता कर समझा रखा था कि भूल कर भी एक दूसरे से बात मत करना क्योंकि वो परम्परा से हमारे दुश्मन हैं।

कहीं बच्चे एक दम से बुड्ढों की बात मानते हैं? और यदि मान लें तो समझ लेना कि इनमें बचपन नहीं बचा है। वह दोनों बच्चे भी नहीं मानते थे। कभी-कभी मौके-बेमौके अकेले में मिल जाते थे तो बात कर लेते थे। बच्चों को घृणा और दुश्मनी समझाने में समय लगता है क्योंकि उनको तो ज़मीनों का हिसाब किताब ही नहीं आता है और वह अपने ही संसार में रहते हैं।

एक दिन दोनों रास्ते में मिल गए बातचीत होने लगी। छत से एक मुखिया , दोनों को आपस में बात करते देख आग बबूला हो गया। उसने अपने लड़के को बुला कर पूछा कि तुमने पड़ोसी के बच्चे से क्या बात की?
बच्चे ने बताया कि मैंने पूछा कहाँ जा रहे हो? उसने कहा जहां हवाएँ ले जाएँ, आगे मुझे नहीं समझ आया कि क्या बोलूँ , कुछ सूझा ही नहीं। पिता बोला तुम तो हार कर चले आए, खुद तो हारे ही और हमको भी शर्मिंदा करवा दिया है। उसको जवाब मिलना ही चाहिए हमारे पुरखों की इज्जत का सवाल है, दो सौ साल से हमारा विवाद चल रहा है और हार हमें स्वीकार नहीं है। कल उससे यही प्रश्न करना और जब वह कहे कि “जहां हवाएँ ले जाएँ” तो कहना यदि हवाएँ चलना बंद हो जाएँ तो कहीं जाओगे कि नहीं? यह सत्य बात है कि जो उत्तर तैयार करके जाते हैं, उनकी बुद्धि की प्रखरता सदैव संदिग्ध रहती है। पहले से तैयार उत्तर तो औसत दर्जे की बुद्धि के लक्षण है। प्रश्न आया नहीं और उत्तर पहले ही खोज लिया, यह बुद्धिमान मनुष्य का लक्षण तो नहीं है। बुद्धिमान तो प्रश्न सामने आए, फिर उत्तर खोजता है और सत्य यही है कि प्रायः लोग, प्रश्न जानने से पहले ही उत्तर तैयार रखते हैं। पुनः दोनों बच्चों की मुलाक़ात हुई, प्रश्न किया कि मित्र कहाँ जा रहे हो ? वह बच्चा होशियार था बोला “जहां पैर ले जाएँ”।

पहला बच्चा अवाक! अपना ज्ञान तो शून्य और रटा रटाया ज्ञान धोखा दे गया।
दुखी भाव से घर वापस आया, पिता को बताया कि लड़का तो बेईमान निकाला, जब मैंने प्रश्न किया तो बोला “जहां पैर ले जाएँ”। पिता बोला बड़े होशियार हो तुम, पकड़ लिया कि वो लोग बड़े बेईमान हैं। उसका तो सारा परिवार ही पूरा बेईमान है और ऐसे बेईमानों का कोई भरोसा नहीं है , सुबह कुछ कहेंगे और शाम को कुछ, पूरे पलटू हैं परन्तु उसको हराना तो पड़ेगा ही।
कल फिर उससे मिलो और जब वह लड़का कहे कि जहां पैर ले जाएं, तो कहना, भगवान न करे कि लंगड़े हो जाओ। अगर लंगड़े हो गए तो कहीं जाओगे कि नहीं? वह लड़का खुश हो गया क्योंकि उसे पता ही नहीं कि फिर कल वाली भूल दोहरा रहा है, प्रश्न से पहले ही उत्तर तैयार है।
अगले दिन फिर मुलाक़ात हुई। पूछा मित्र कहाँ जा रहे हो? दूसरे ने उत्तर दिया कि बुआ से मिलने जा रहा हूँ। सारा ज्ञान व्यर्थ हो गया, जितना शास्त्र रट कर आया था, कुछ काम नहीं आया। सामान्यतः रटे रटाए उत्तर सारहीन ही निकलते हैं ।

कहानी के भाव को देखें तो क्या सिखा रहे हैं बच्चों को झगड़ा, दुश्मनी, बैर , हार-जीत, यह कौन सी शिक्षा है ? यह शिक्षा नहीं थोपना है, एक सरल बाल्यजीवन में, अपनी कुंठा, बैर और अहंकार। उनको सचेत करो – संस्कारित करो और जीने दो उन्हें अपना बचपन – खोजने दो विराट में बिखरे मोती।
बच्चों को ज्यादा सिखाओ मत क्योंकि खुद सिखाएँगे क्या ? कुछ उसको खुद सीखने दें, खोजने दें स्वयं! करने दें स्वयं कुछ रचनात्मक। क्या सिखा रहे हैं? धन कैसे कमाओगे! पैसा कैसे जोड़ोगे!
बड़े आदमी अथवा बड़े अधिकारी कैसे बन सकते हो अथवा कहोगे बन कर दिखाना है। इन सबसे क्या सीख रहा है वह ? मात्र ईर्ष्या, चालबाज़ी, झगड़ा, द्वेष। उसको विराट से खींच कर संकीर्णता में बांध रहे हैं। स्कूल अभी शुरू भी नहीं हुआ है और समझा रहे हैं कि फ़र्स्ट आना है, नम्बर एक रहना है ! थोप दी अपनी मानसिकता बिना उसको समझे, बिना उसको जाने, अब वो समझ रहा है कि जो नम्बर एक पर है, वही श्रेष्ठ है और वह तो अभागा है। यह कोई शिक्षा नहीं है, तुम्हारी मानसिक विक्षुब्ता है, इच्छायें हैं जो उस पर थोपे जा रहे हो। किसी अधिकारी को देख कर, हो सकता है कि अपने अंदर हीनभावना आयी अथवा उसके प्रभामंडल ने प्रभावित किया हो, अपने को छोटा समझा और सोच लिया कि इसको तो अधिकारी ही बनना है। धकेल दिया उसको नंबर एक की दौड़ में, बिना यह देखे या समझे कि जो नम्बर एक के पायदान पर खड़े हैं, क्या अपनी उपलब्धियों से खुश – सन्तुष्ट हैं? समझ सकते हैं कि संसार के सबसे ताकतवर राष्ट्र अमेरिका का राष्ट्रपति भी असंतुष्ट और अशांत ही दिख रहा है।

जो हम सिखा रहे हैं बच्चों को, उसका परिणाम क्या निकल रहा है? चूँकि बच्चों को निरन्तर भौतिकवाद की ओर धकेल रहे हैं, तो भौतिक सम्पन्नता तो निरन्तर बढ़ रही है किंतु मानसिक दीनता भी बढ़ती जा रही है, विचारों में संकीर्णता आती जा रही है और इसने मानवता को ख़तरनाक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। दोष शिक्षा में ही है जब तक हम बचपन को भारमुक्त नहीं करेंगे तब तक उनके नैसर्गिक गुण प्रकट ही नहीं हो सकते। यह भी नहीं भूल सकते कि भौतिक प्रगति की भूख में विनाश के ख़तरे ज्यादा हैं।
समुद्र के किनारे खड़े शंख और सीप बीनते रहे। बहुत मन था कि कुछ रत्न -कुछ मोती भी मिल जाते सागर से और मिला कुछ नहीं। कुछ पाने के लिए तो गहरा गोता लगना पड़ेगा और कभी गहराई में जाने का साहस ही नहीं किया क्योंकि जानते थे कि डूब जाएँगे।

कभी गोता लगाना सीखा ही नहीं क्योंकि यह मान बैठे थे कि मेरे तो बस की ही नहीं है। यदि कदाचित समुद्र में गए भी तो नाव को ही पकड़े रखा क्योंकि किनारों का ज्ञान कभी हुआ नहीं और तूफ़ानों से भयभीत बने रहे। भय और भ्रम के लबादे को पहने कहाँ सागर में गोता लगा पाते ? यदि रत्न -मोती की कामना थी तो इस लबादे को फेंक कर सागर की गहराइयों में खोजना पड़ता। भला कभी किसी ने लबादे पहन कर गोते लगाए हैं। समुद्र के किनारों पर दलदल में ही तलाशते रहे और जो मिल गया सीप-शंख , उसी से मन को भरमा लिया कि बहुत कुछ पा लिया है और भ्रम में ही स्वयं ही अपनी पीठ ठोक रहे हो, मिथ्या संतोष के सागर में गोते मार रहे हो, संतोष भाव का झूठा प्रदर्शन कर रहे हो। संसार के सामने तो पूरी शक्ति से अपनी सांसारिक उपलब्धियों का बखान कर ही रहे हो, बच्चों को भी भरमा रहे हो। सागर की कीचड़ में लोटपोट होते रहे, सीप – शंख पकड़े हो, क्या सिखाओगे बच्चों को?
सिखाना छोड़ो, पहले बच्चों से ही कुछ सीख लो और यदि सिखाना है तो उनको सजग कर के बताओ ; वह सिखाओ जो तुम उससे छुपा रहे हो। बताओ उसको जो अनमोल है उनके लिए, समझाओ उनको कि जो यह उसकी मासूमियत है, जो उसके कपट रहित हृदय में प्रेम है, यह बहुत अनमोल है और बताओ कि जो तुम्हारे पास है, यह दो टके का ज्ञान है, इससे आजीविका मिल जाएगी-जीवन नहीं, रोटी मिल जाएगी – तृप्ति नहीं।

बच्चों को सिखाते हैं, उदार बनो, दयालु बनो, जीव मात्र से प्रेम करो और यदि वास्तव में देखें तो बचपन से ही उसमें प्रतियोगिता – प्रतिस्पर्धा का भाव भर रहे हैं। जहां प्रतियोगिता -प्रतिस्पर्धा है वहाँ कौन सी उदारता और कौन सा प्रेम टिक सकता है। यदि प्रतियोगिता जीतनी है तो उसे अनुदार और कठोर हृदय होना पड़ेगा, प्रतिस्पर्धा कभी दया भाव से नही जीती जातीं क्योंकि प्रतिस्पर्धा तो ईर्ष्या और ग्लानि पर टिकी है। जब कोई बच्चा प्रथम आता है तो उस एक बच्चे के लिए सैकड़ों बच्चों को प्रताड़ित कर रहे हैं, कहते हैं देखो वो निकल गया आगे और तुम अभागे पिछड़ गए और यह तो उनके जले पर नमक छिड़कना ही है, जब उनसे कहते हैं क‍ि जो तुमको पीछे ठेल कर आगे गया है, उसके लिए ताली बजाओ। अभी तो उसका हृदय कोमल है और वह प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार ही नहीं है। क्यों उसके अन्दर हीन भावना भर रहे हो ? उनको सजग करो – लज्जित नहीं।

सत्य को विस्मृत किए हुए हैं, बच्चों को सिखाते हैं कि लोभ मत करो, निर्भय बनो-बहादुर बनो, परन्तु हर समय उनको लोभ और भय में ही धकेलते रहते हैं क्योंकि सारी व्यवस्था दंड अथवा पुरस्कार के इर्दगिर्द घूम रहीं हैं। जहां दंड अथवा पुरस्कार निश्चित कर रहे हैं, वहीं भय अथवा लोभ प्रकट हो रहे हैं। ”पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब ” यही सुनते रहे कि पढ़ोगे तो कलक्टर बन जाओगे, लालच ही तो दे रहे हैं ! “खेलोगे कूदोगे तो होगे ख़राब” यदि नहीं पढ़ पाए तो घास खोदोगे, यहाँ भय उत्पन्न कर रहे हैं और इन दोनों ही उक्तियों में कोई सत्यता भी नहीं है। अपने आसपास यदि ध्यान से देखोगे तो समझ जाओगे कि कोई बहुत सटीकता इसमें है नहीं।

जब किसी एक बच्चे को किसी दूसरे बच्चे की तरह बनने के लिए कहते हैं तो यह स्वयं की नासमझी है। कभी दो लोग एक जैसे हुए हैं अथवा हो सकते हैं ?
जो गुलाब को फ़ूल है वह गुलाब का फ़ूल है और जो घास का फ़ूल है वो घास का फ़ूल है! जो छोटा पौधा है वो छोटा पौधा है और जो बड़ा वृक्ष है वो बड़ा वृक्ष है। प्रकृति दोनों को समान रूप से पोषण देती है बिना भेदभाव के और यदि मनुष्य का दृष्टिकोण अलग कर दिया जाए तो दोनों अपने अपने स्वरूप के अनुरूप हैं, दोनों का समान अस्तित्व है, कोई छोटा अथवा बड़ा है ही नहीं। सभी अपनी अपनी विशेषता, क्षमता और गुणों को धारण करते हैं, यह तो मनुष्य का भाव है “छोटा-बड़ा” जो थोप रहे हैं प्रकृति पर।

दो बच्चों की आपस में तुलना बुद्धिमानी नहीं है। यह तो बच्चों में एक ग़लत धारणा उत्पन्न कर देगी क्योंकि न तो कभी दो एक जैसे बने हैं और न बन सकते हैं। परब्रह्म परमात्मा श्री विष्णु के अनेकों अवतार हुए हैं। यदि मनुष्य रूप में हुए अवतारों का स्मरण करें तो क्या किन्ही दो अवतारों में समानता है ? मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम एवं लीलपुरूषोत्तम भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का ही स्मरण -मनन कर लें तो यह स्पष्ट हो सकता है।

बच्चों को सचेत करें – संस्कारों का ज्ञान कराएँ परन्तु अपने ज्ञान को उनपर थोप कर उनको महान बनाना असम्भव है। अभिनय और वास्तविकता में बहुत अन्तर होता है, हो सकता है कि रामलीला में उसको राम बना दें किंतु मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम जैसा कभी कोई दूसरा नहीं होगा। ज़िंदगी में तो नित्य नयी परिस्थितियाँ खड़ी रहती हैं, ज़िंदगी संघर्ष माँगती है और उनके सामने तो अपनी चेतना को खड़ा करना पड़ेगा, अपना दीपक स्वयं बनना पड़ेगा। सार्थक और परिस्थितिजन्य समाधान तभी निकलेंगे जब चेतना बोझिल न हो, उसपर कोई भार न हो। यहाँ तो पूरा चित्त ही बोझिल है, इतने महापुरुष हुए, संत – साधु-सन्यासी हुए हैं, वह इतना ज्ञान दे गए हैं कि उसके अलावा अपना कोई चिंतन ही नहीं कोई अस्तित्व ही नहीं है और कभी उसके आगे सोचा ही नहीं। पूर्वजों के एक मंज़िला मकान को चार मंज़िला कर इतरा रहे हैं कि जैसे उनकी सम्पदा -उनकी प्रतिष्ठा में बड़ी भारी वृद्धि कर दी, कभी सोचा है उनकी आध्यात्मिक और मानसिक सम्पन्नता के समीप भी पहुँचने का ? सोच भी नहीं सकते क्योंकि बहुत बौने लगेंगे और मिथ्याभिमान चूरचूर हो जाएगा।
भाग्यशाली हैं कि जुड़े हैं, सनातन धर्म की पुण्य पवित्र भूमि से, जहां निरंतर दिव्य शास्त्रों का जन्म हुआ है, जहां ऋषि- मुनि, संत, महापुरुषों का दिव्य ज्ञान सहज सुलभ है, देख सकते हैं कि उसी सनातन धर्म कि पवित्र भूमि पर निरन्तर चिंतन-मनन और शास्त्रों की रचनाएँ होती रही हैं किंतु आज कहाँ है वह नवीन चिंतन – मनन और शास्त्रों की रचनाएँ? सत्य तो यह है क‍ि लम्बे अंतराल से कोई नवीन चिंतन और मनन हुआ ही नहीं है, तो नित्य नयी चुनौत‍ियों से निपटे भी कैसे ? यह भी एक कारण हैं कि कभी विश्वगुरु की पदवी पर प्रतिष्ठित रहा भारत निरन्तर पिछड़ता चला गया अथवा कहें तो पराधीन भी हुआ क्योंकि वर्तमान में उत्पन्न समस्याओं का समाधान, अपनी सुविधाओं के अनुरूप पुस्तकों और धारणाओं में ही खोजते रहे और दुर्जन आक्रांताओं को जवाब उसके अन्दाज़ में दिया ही नहीं।

यदि अहंकार को छोड़ उदार बन सके तो हम बच्चे से भी बहुत कुछ सीख सकते हैं और हम बच्चे से सीखेंगे जीवन के वह रहस्य जो हम भूल चुके हैं । उसकी आंखों से छलकता प्रेम, विमुग्ध भाव, उसकी सरलता, ध्यानमग्न हो जाने की कला। तितली देख ली, कोई चिड़िया देख ली तो ऐसा एकचित-एकाग्र हुआ कि जगत विस्मृत हो रहा है। किसी फ़ूल को देख ऐसा ठिठका और मुग्ध हो खोजने लगा उसकी सुंदरता का रहस्य। इसलिए बच्चे प्रश्नों की झड़ी लगा देंगे, उनके प्रश्नों का अंत नहीं है क्योंकि उनकी जिज्ञासा-मुमुक्षा अनंत है , थका देंगे तुम्हें और तुम्हारे उत्तर जल्दी निपट जाएँगे। यदि सीखने की इच्छा हो तो बच्चों से भी सिख सकते हैं , उनकी सरलता , सहजता , प्रेम , निर्दोष और कपट रहित भाव को।
यदि समझ सके तो शायद हमारा भी हृदय भर उठे एक नए रस से। फिर नाच सकें बाल गोपाल के साथ, उन्हीं की तरह, उसी परमानन्द में। यही परमानन्द जीवन में शाश्वत लीलाओं का प्राकट्य करेगा, सम्भव है उस लीलापुरुषोत्तम, कृष्ण के लीलामय भाव में तुम भी डूब जाओ और लीलापुरुषोत्तम भगवान कृष्ण की दिव्य लीलाओं में छुपे भावों को समझ सको। खोज सको आनन्दमय जीवन के शाश्वत सूत्रों को और उनको धारण कर सको अपने जीवन में। यदि बालकृष्ण के रस सागर में डूब गए तो ब्रजरज से भरे मुख में ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के दर्शन हो जाएँगे और जीवन के सभी रहस्य प्रकट हो उठेंगे।

दृष्टि का विस्तार कर सोच को यथार्थ से जोड़ने का समय

 

-कप‍िल शर्मा ,
सच‍िव, श्री कृष्ण जन्मस्थान ,
मथुरा

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