सामूहिक आत्महत्या के रास्ते पर चल पड़े हैं हम इंसान

इस धरती पर रहने वाले हम इंसान सामूहिक आत्महत्या के रास्ते पर चल पड़े हैं। इससे भी भयानक बात यह है कि हम चार अरब वयस्क तीन अरब बच्चों और निर्दोष युवाओं को भी मौत की तरफ घसीट कर ले जा रहे हैं।
याद कीजिए पिछले दिनों बेहद लोकप्रिय हुई फिल्म सीरीज अवेंजर्स का खलनायक थैनोस धरती सहित ब्रह्मांड की आधी आबादी को खत्म कर देता है।
थैनोस का मानना है कि इस आबादी ने पर्यावरण और संसाधनों को बर्बाद करके ब्रह्मांड के लिए खतरा पैदा कर दिया है लिहाजा ब्रह्मांड को बचाने के लिए आधी आबादी को खत्म कर दिया जाना चाहिए।
इस सीरीज के सुपर हीरो ब्रह्मांड को थैनोस से बचाने के लिए महायुद्ध लड़ते हैं और आखिर में कामयाब होते हैं। लेकिन हकीकत में जो हो रहा है, वह इसके एकदम उलट है। पहली बार कम से कम इस धरती पर आश्चर्यजनक रूप से हकीकत ने कल्पना को हरा दिया है।
तमाम भविष्यवाणियां यह दिखा रही हैं कि खतरे की घंटियां हर तरफ से बज रही हैं। सभी को इस बात का अंदाजा है कि हमारे लालच और जुल्म के आगे धरती की सहनशक्ति खत्म हो गई है। हवा और पानी जहरीले हो रहे हैं। भूगर्भ के खजाने खाली हो रहे हैं। तापमान चढ़ रहा है। धरती के सुरक्षा कवच टूट रहे हैं। विशाल ग्लेशियर पिघल रहे हैं और समुद्र धरती को निगलने के लिए बढ़ रहा है। मौसम का चक्र गड़बड़ा रहा है। बाढ़ और सूखे के अचानक हमलों से हाहाकार मच रहा है। विडंबना देखिए कि हम दो-चार दिन दिल्ली के स्मॉग या केरल की बाढ़ की चर्चा करते हैं और फिर अपनी नींद में लौट जाते हैं। महाविनाश के कदमों की गूंजती आहट को हम सुनने से इंकार कर देते हैं। पृथ्वी की लाखों प्रजातियों में अकेले हम ही हैं, जो खुद को इस तरह आत्महत्या के लिए तैयार कर सकते हैं और उन लोगों को भी इस ओर ले जा सकते हैं जो इस पाप में फिलहाल भागीदार नहीं हैं।
हमारी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं को देखिए। वहां हमारे लीडर अब भी इस बात पर बहस में खोए हैं कि धरती खतरे में है या नहीं, है तो क्या किया जाना चाहिए, कौन इसकी जिम्मेदारी उठाए और कैसे इस जिम्मेदारी से बचा जाए। बहुतों को लगता है कि यह सिर्फ हमारा वहम है और अगर हम कुछ देर आंखें बंद करके बैठे रहेंगे तो सब कुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन आशंका इस बात की है कि शायद वह समय कभी न आए। वापसी की कोई गुंजाइश ही न बचे और महाविनाश अपना रथ आगे बढ़ा दे। कोई नहीं जानता कि धरती के प्राकृतिक संतुलन का बिगड़ना कितनी बड़ी आपदा लाएगा। हो सकता है कि खुशकिस्मत और साधन संपन्न लोग खुद को बचा ले जाएं जबकि एक बड़ी आबादी इसके गर्भ में समा जाए। तो जो बचेंगे, वे क्या करेंगे, वे क्या सोचेंगे? क्या वे इस बात से तसल्ली करेंगे कि धरती का बोझ खत्म हो गया? या वे मृत्यु के भय में जीने के लिए अभिशप्त रहेंगे क्योंकि धरती फिर कभी उनकी मां नहीं बन सकेगी।
अगर हम सबको इस सामूहिक आत्महत्या से बचना है तो नींद से जागना होगा। ब्रह्मांड के अनंत टाइम और स्पेस के बीच यह नन्ही-सी पृथ्वी एक कमजोर किश्ती की तरह टिकी है। 30 साल पहले छह अरब किलोमीटर दूर सौर मंडल के आखिरी छोर से वायजर स्पेसक्राफ्ट ने पीछे मुड़कर एक फोटो खींची थी, जिसमें पृथ्वी एक धुंधले नीले बिंदु की तरह रोशनी की एक किरण पर टिकी नजर आ रही थी। उस क्षण को याद करते हुए साइंटिस्ट कार्ल सैगन ने जो कहा था, उसे आज फिर याद करने की जरूरत है, ‘इस विराट अंतरिक्ष में ऐसा कोई संकेत नहीं है कि हमें खुद को खुद से ही बचाने के लिए कहीं और से मदद मिलेगी। अब तक की जानकारी में धरती ही ऐसी इकलौती दुनिया है, जहां जीवन फल-फूल रहा है। कोई और ऐसी दुनिया नहीं है, जहां मानव जाति शरण पा सके।’ कोई भी और प्रजाति ऐसे में जिंदगी को चुनती। लेकिन इंसान?
-एजेंसियां

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