वीर अब्दुल हमीद की आज 52वीं death anniversary मना रहा है देश

परमवीर चक्र विजेता व 1965 युद्ध के नायक वीर अब्दुल हमीद ने जब अकेले ही किए थे दुश्‍मन के तीन टैंक तबाह

गाजीपुर। अपनी तोपों से दुश्मनों के दांत खट्टे कर 1965 के भारत-पाक युद्ध परिणाम को देश के पक्ष में निर्णायक भूमिका निभाने वाले परमवीर चक्र विजेता वीर अब्दुल हमीद की 52वीं death anniversary आज सारा देश मना रहा है।

जखनियां तहसील के तहत धामूपुर गांव के निवासी रहे वीर अब्दुल हमीद ने मात्र 32 वर्ष की उम्र में दुश्मनों के दांत खट्टे कर 1965 के युद्ध का परिणाम देश के पक्ष में करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। देश की आन बान और शान के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर कर राष्ट्र की रक्षा मे अपने को समर्पित करने वालों रणबांकुरो की कड़ी में उनका विशेष स्थान रहा है।

एक जून 1933 को मोहम्मद उस्मान के घर जन्मे अब्दुल हमीद अपनी अदम्य वीरता,साहस और पराक्रम को अपनी ढाल बना पिता के मशवरे के विपरीत सेना मे जाने का निर्णय लिया और इक्कीस वर्ष की उम्र में 27 दिसम्बर 1954 को ग्रेनेडियर इन्फैन्ट्री में भर्ती हो गए। अपने साहस और तीव्र मेधा के बल पर कश्मीर में नियुक्ति के दौरान आतंकी इनायत अली को गिरफ्तार कराया फलस्वरूप अधिकारियों ने प्रोन्नति देकर लांस नायक और फिर पांच वर्षों की सेवा के बाद क्वार्टर मास्टर के पद पर तैनाती दे दी।

1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध मे पाक सेना जब अमृतसर को सब तरफ से घेर कर अपने कब्जे में करने की चाल को अमली जामा पहनाने की नियत से गोली बारी करती हुई खेमकरन सेक्टर के चिया गांव की ओर बढ़ रही थी, उसी क्षेत्र मे मौजूद अब्दुल हमीद अपने सीमित साधनों के बावजूद पाकिस्तानी फौज को आगे बढऩे से रोकने में जिस अदम्य साहस का परिचय दिया वह भारत के स्वर्णिम इतिहास के सुनहरे पन्नों मे दर्ज है।

वह दस सितम्बर 1965 का वक्त था जब अभेद्य अमेरिकी पैटन टैंको से लैस पाकिस्तानी फौज नापाक इरादों के साथ गोले बरसाते हुए आगे बढ़ रही थी। दुश्मन फौज के इरादों और समय की नजाकत को भांप अब्दुल हमीद ने मादरे वतन के लिए कुछ कर गुजरने के मंसूबे के साथ उनकी बढ़त रोकने के लिए अभेद्य पैटन टैंक को लक्ष्य कर गोले दागे फलस्वरूप पैटन टैंकों की गति थम गई।

पाकिस्तानी फौज इस अप्रत्याशित हमले से किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई और जब तक वह सम्भलती तब तक गाजीपुर की शहीदी धरती के इस लाल ने एक एक कर तीन पैटन टैंको को नेस्तनाबूत कर दिया। अपने अभेद्य टैंकों की ऐसी दुर्गति देख बौखलाई पाकिस्तानी फौज ने अपनी तोपों का मुंह उधर कर दिया जिधर से उनके टैंक को निशाना बना उसे आग के शोलों मे तब्दील किया जा रहा था। 3 टैंकों को नेस्तनाबूत करने के बाद अब्दुल हमीद जब चौथे पैटन टैंक को मटियामेट करने के लिये निशाना साध रहे थे तभी पाकिस्तानी टैंक से निकले गोले से वे शहीद हो गए।

अपने फौजी साथी अब्दुल हमीद की हिम्मत को देख भारतीय फौज दोगुने उत्साह से दुश्मनों पर टूट पड़ी और पाकिस्तानी सेना को मैदान छोड़ भागना पड़ा। साहस और अपने मंसूबों के धनी इस महावीर को मरणोपरांत 16 सितम्बर 1965 को भारत सरकार ने सेना के सर्वोच्च मेडल परमवीर चक्र देने की घोषणा की और गणतंत्र दिवस के अवसर पर 26 जनवरी 1966 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्व पल्ली राधा कृष्णन ने उनकी पत्नी रसूलन बीबी को यह सम्मान सौंपा था।

उनके पैतृक गांव में बने शहीद स्मारक पर हर साल दस सितम्बर को भव्य समारोह आयोजित कर death anniversary पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। अभी तक इस शहीद स्मारक पर देश प्रदेश की अनेक राजनीतिक हस्तियों के साथ साथ सेना के उच्चाधिकारी गण अपना श्रद्धा सुमन अर्पित कर अपने को गौरवान्वित कर चुके हैं।

 

उनकी याद में ही पंजाब के खेमकरन सेक्टर में पैटन नगर बनाया गया है, जहां उस वक्त के पैटन टैंक नुमाइश के तौर पर रखे गए हैं जिसे देखकर उस वीर की शख्सियत जेहन में उतर आती है।

हर साल दस सितम्बर death anniversary को पंजाब के उत्तरी हिस्से में जिस स्थान पर अब्दुल हमीद ने वीरगति पाई थी, वहां बनी उनकी समाधि पर  मेला आयोजित होता है।