उत्तर प्रदेश के खनन माफिया ने सोनभद्र की Renuka नदी में मचाई तबाही

Renuka नदी पर एशिया के विषालतम जलाशयों में एक रिहंद बांध स्थापित है

एनजीटी के आदेश भी रखे ताक पर रेणुका नदी की धारा रोकी

सोनभद्र। उत्तर प्रदेश के खनन माफिया ने सोनभद्र की Renuka नदी में तबाही मचाई हुई है जिससे  पावर कैपिटल कहे जाने वाले सोनभद्र-सिंगरौली में औद्योगिक अवशिष्टों वायु, मृदा और जल प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच चुका है। साथ ही जिले की लाइफलाइन सोन, Renuka नदी सहित अन्य नदियों में जीवन (जलीय जीव और ऑक्सिजन) भी खत्म होने की कगार पर है।

नवभारत टाइम्‍स की खबर के अनुसार कोयला राख पटाव के साथ ही बालू खनन के लिए जगह-जगह नदियों के बांधे जाने से स्थिति और भी खराब हो रही है लेकिन मामला अदालत में पहुंचने के बाद भी नदियों के बदलते स्वरूप और बिगड़ते जलीय पर्यावरण पर रोक नहीं लग पाई। वहीं, प्रदूषण नियंत्रण महकमा इससे पल्ला झाड़ने में लगा हुआ है।

जिले में सोन, कनहर, Renuka, बिजुल आदि प्रमुख नदियां हैं।Renuka नदी पर एशिया के विषालतम जलाशयों में एक रिहंद बांध स्थापित है। साथ ही इस पर 11 बिजली परियोजनाएं संचालित हैं। इन परियोजनाओं में 21 से 22 हजार मेगावाट विद्युत उत्पादन के लिए रोजाना करीब तीन लाख टन कोयला जलाया जाता है। इससे रोजाना सवा से डेढ़ लाख टन राख निकलती है। राख निस्तारण के नाम पर इसका बड़ा हिस्सा नालों और अन्य माध्यमों से सीधे रिहंद डैम या फिर रेणुका नदी में छोड़ दिया जा रहा है।

ओबरा परियोजना की पूरी राख रेणुका डैम में
ओबरा परियोजना से निकलने वाली पूरी राख ही रेणुका डैम में पाट दी जा रही है। ओबरा परियोजना से महज दो से तीन किलोमीटर पर रेणुका, बिजुल और सोन नदी का संगम स्थापित है। यहां से यह राख सोन नदी से होते हुए पटना में गंगा नदी तक पहुंच रही है। इससे पानी में ऑक्सिजन की मात्रा प्रभावित होने से नदी का जलीय जीवन पहले ही काफी हद तक समाप्त हो चुका है। अब बचे हुए जलीय जीव बालू खनन की भेंट चढ़ते जा रहा हैं।

एनजीटी के सख्त हिदायत के बाद भी नहीं सुधरे हालात
केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के स्पष्ट निर्देश और एनजीटी के सख्त हिदायत के बावजूद लगातार नदियों के जीवन से खिलवाड़ के इस घिनौने खेल पर लगाम नहीं लग पा रहा है। मौजूदा स्थिति यह है कि बालू खनन के लिए मीतापुर, खेवंधा, महलपुर, बरहमोरी आदि जगहों पर नदी की धारा को पूरी तरह बांध दिया गया है।

बालू खनन के लिए रोक दी नदी की धारा
बालू खनन के लिए नदी की धारा को रोकने से जलीय पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़ा है। विशेषज्ञों के अनुसार नदियों का बहाव जलीय पर्यावरण बनाए रखने के लिए जरूरी है, क्योंकि नदी का प्रवाह अविरल बने रहने से उसमें हवा के बहाव के साथ आक्सीजन घुलता रहता है। वहीं, नही का बहाव रोक दिए जाने पर पानी में आक्सिजन की मात्रा कम हो जाती है और जलीय जीवन समाप्त होता जाता है।

कछुआ सेंचुरी की योजना ने भी तोड़ा दम
सोनभद्र जिले में सोन नदी का अधिकांश हिस्सा कछुआ सेंचुरी के एरिया से होकर गुजरता है। इसके जलीय पर्यावरण को बचाने के लिए कछुआ सेंचुरी की योजना बनाई गई थी। अमलीजामा पहनाने के लिए बच्चे छोड़े गए। एक दो-साल स्थिति ठीक रही, लेकिन इसके बाद नदी में बढ़ते राख के पटाव और बालू खनन के लिए जगह-जगह बांधी जाती जलधारा ने योजना को अतीत बना दिया। सेंचुरी विभाग से जुड़े लोगों ने भी इस पर चुप्पी साध ली।

ऑक्सिजन की मात्रा घटने से हौ सकती है परेशानी
पर्यावरणविद और बनवासी सेवा आश्रम के अध्यक्ष अजय शेखर का कहना है कि सोनभद्र में जल, जंगल, जमीनों तीनों का अनियंत्रित दोहन हो रहा है। नदियों में पाटी जाती कोयले की राख और जगह-जगह बांधी जाती धारा से प्रदूषण बढ़ने के साथ नदियों का स्वरूप बिगड़ता जा रहा है। एनजीटी याचिकाकर्ता जगतनारायण का कहना कि राख के पटाव से नदियों के हालात पहले से खराब है। इसके बावजूद कुछ लोगों ने अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए नदी की धारा को बांध दी है, इससे जलीय पर्यावरण बिगड़ने के साथ ही भूजल में भी ऑक्सिजन की मात्रा लगातार घटती जा रही है।

जिला प्रशासन को प्रमाणिक रिपोर्ट का इंतजार
वहीं, सोनभद्र के जिलाधिकारी अमित कुमार सिंह इस मामले में प्रमाणिक वैज्ञानिक रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं। अमित कुमार सिंह ने कहा, ‘सोनभद्र में नदियों के जीवन को खतरे को लेकर कोई भी प्रमाणिक वैज्ञानिक रिपोर्ट हमें नहीं मिली है। बिगड़ते पर्यावरण की चिंता सबको है। अगर ऐसी कोई रिपोर्ट आती है तो नियमानुसार कार्रवाई करने में हम पीछे नहीं रहेंगे।’

-एजेंसी

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