अफगान-तालिबान शांति वार्ता में भारत को शामिल करने के लिए अमेरिका ने लिखा राष्‍ट्रपति अशरफ गनी को पत्र

वॉशिंगटन। अमेरिका के विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकेन ने अफगानिस्‍तान के राष्‍ट्रपति अशरफ गनी को एक पत्र लिखकर संयुक्‍त राष्‍ट्र के नेतृत्‍व में शांति वार्ता आयोजित करने का आग्रह किया है। इसमें उन्‍होंने भारत समेत सभी छह देशों को शामिल होने की बात कही है। आपको बता दें कि पूर्व राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप के कार्यकाल में अफगानिस्‍तान शांति वार्ता में भारत को शामिल नहीं किया गया था लेकिन बाइडन प्रशासन में इस बात पर जोर दिया गया है कि इसमें भारत को भी शामिल किया जाना चाहिए।
राष्‍ट्रपति गनी को लिखे इस पत्र में उन्‍होंने कहा है तुर्की ने इसको लेकर संपर्क किया है कि वो एक सीनियर लेवल पर बैठक आयोजित करे जिसमें शांति समझौते को अंतिम रूप दिया जा सके। इसके लिए तुर्की ने अफगान राष्‍ट्रपति से अपील की है कि उन्‍हें इस बैठक में शामिल होने का सौभाग्‍य मिलना चाहिए। अफगानिस्‍तान के टोलो न्‍यूज़ ने इस पत्र को प्रकाशित किया है। इसके मुताबिक संयुक्‍त राष्‍ट्र को रूस, चीन, पाकिस्‍तान, ईरान, भारत और अमेरिका के विदेश मंत्रियों की बैठक बुलानी चाहिए जिसमें अफगानिस्‍तान में शांति के लिए सभी की सहमति से रास्‍ता तलाशा जाना चाहिए।
इसमें आगे कहा गया है कि अमेरिकी दूत जाल्‍मे खलिजाद को इस बार में राष्‍ट्रपति गनी और तालिबान के नेताओं से बात कर लिखित ब्‍यौरा पेश करना चाहिए। इसका मकसद अफगानिस्‍तान में शांति वार्ता को आगे बढ़ाना और सीजफायर पर आगे बात करना होना चाहिए। इतना ही नहीं, इसमें शांति प्रक्रिया और शांति समझौते की बातें सामने आनी चाहिए।
अमेरिकी विदेश मंत्री के मुताबिक ये दस्‍तावेज अफगान सरकार और तालिबान के बीच अफगानिस्‍तान के विकास को लेकर साथ चलने की राह खोलेगा। उन्‍होंने 90 दिनों के अंदर हिंसा में कमी लाने और कूटनीतिक वार्ता का दौर शुरू करने का भी प्रपोजल दिया है। उन्‍होंने अपने इस पत्र में कहा है कि अमेरिका 1 मई तक अपने सभी जवानों की वापसी को लेकर विचार कर रहा है। इसके अलावा भी कुछ दूसरे विकल्‍प हैं।
उन्‍होंने ये भी कहा है कि अमेरिका अपने जवानों की वापसी की सूरत में अफगान सेना के जवानों को सुरक्षा के लिए तैयार करने के लिए आर्थिक मदद देने पर भी विचार कर रहा है। अमेरिका को इस बात का भी डर है कि कहीं अमेरिकी सेना की वापसी के बाद तालिबान फिर से अपनी ताकत का इजाफा आतंकवाद के लिए न करने लगे। इसलिए इस बारे में जल्‍द विचार कर फैसला किया जाना जरूरी है।
आपको बता दें कि फरवरी 2020 में पूर्व राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने तालिबान से मिलकर एक समझौता किया था जिसमें अफगानिस्‍तान से अपनी सेना की वापसी की बात कही गई थी। लेकिन इसमें ये भी शर्त रखी गई थी कि तालिबान अफगानिस्‍तान में आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए अलकायदा का साथ नहीं देगा और हिंसा में कमी लाएगा। हालांकि इसके बाद भी तालिबान ने अफगानिस्‍तान सेना के ऊपर हमलों में कोई कमी नहीं की थी। अमेरिका ने हर बार इसकी निंदा की है।
आपको बता दें कि अफगान शांति वार्ता को लेकर विदेश मंत्री एस जयशंकर और अफगानिस्तान के लिए विशेष अमेरिकी दूत जलमय खलीलजाद ने रविवार को टेलीफोन पर बातचीत भी की थी। इस दौरान पिछले वर्ष हुए तालिबान और अफगान सरकार के बीच हुए शांति समझौते समेत कई संबंधित मुद्दों पर विचार विमर्श हुआ। इसको लेकर जयशंकर ने को ट्वीट भी किया है। इसमें आपसी संपर्क में बने रहने की बात भी कही गई है। आपको बता दें कि भारत अफगानिस्तान में उभरती राजनीतिक स्थिति पर करीबी नजर रखे हुए है। इस समझौते से अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
भारत की मौजूदगी से पाकिस्‍तान की होगी बोलती बंद
अफगानिस्‍तान न सिर्फ भारत का मित्र देश है, बल्कि वहां पर होने वाली राजनीतिक सरगर्मियां भारत को भी प्रभावित करती हैं। खासतौर पर जब वहां पर बात तालिबान की हो। तालिबान का जब-जब जिक्र आता है, तब-तब कंधार विमान हादसा भी सामने आ जाता है। इसके अलावा तालिबान की पहचान एक क्रूर आतंकी संगठन की भी है। अफगानिस्‍तान के विकास में सबसे बड़ा रोड़ा भी वही है। पिछले वर्ष जब तत्‍कालीन अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने तालिबान के साथ अफगान शांति वार्ता के साथ समझौता किया तो उसमें पाकिस्‍तान तो शामिल था, लेकिन भारत शामिल नहीं थाा।
इस प्रक्रिया में अफगानिस्‍तान की सरकार को भी नहीं रखा गया था। तालिबान का कहना था कि वो अमेरिका से हुए समझौते के बाद अफगानिस्‍तान की सरकार से वार्ता और फिर समझौता करेगा। भारत के इस प्रक्रिया में शामिल न होने पर पाकिस्‍तान काफी खुश हुआ था। उस वक्‍त पाकिस्‍तान ने बार-बार ये कहा कि भारत को अमेरिका ने अफगान शांति वार्ता में तरजीह नहीं दी और पाकिस्‍तान की अहमियत को समझते हुए उसको इसमें शामिल किया। लेकिन अब अमेरिका में निजाम के साथ वक्‍त और सियासत बदल चुकी हैं।
दरअसल, अमेरिका के विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकन ने इस प्रक्रिया में भारत को शामिल करने की बात कहकर पाकिस्‍तान का मुंह बंद करने का काम किया है। जवाहरलाल नेहरू यूनवर्सिटी (जेएनयू) के प्रोफेसर एचएस प्रभाकर का मानना है कि भारत को अफगानिस्‍तान की शांति प्रक्रिया में पहले ही शामिल किया जाना चाहिए था। उस वक्‍त ट्रंप ने भारत को इससे अलग कर गलत फैसला लिया था। अफगानिस्‍तान में भारत जहां शांति का पक्षधर है, वहीं पाकिस्‍तान उन चंद देशों में शामिल है, जिसने अफगानिस्‍तान में तालिबान सरकार को मान्‍यता दी थी। ये उसकी केवल आतंकवाद को बढ़ावा देने की नीति की तरफ ही इशारा करती है।
प्रोफेसर प्रभाकर का ये भी कहना है कि भारत के इस प्रक्रिया में शामिल होने के बाद पाकिस्‍तान की अहमियत अपनेआप ही कम हो गई है। जब से अमेरिका ने तालिबान के साथ समझौता किया था, तब से ही भारत इसको लेकर असहज था। भारत कभी नहीं चाहेगा कि कोई भी आतंकी संगठन अफगानिस्‍तान या दुनिया के किसी भी कोने में सरकार का गठन करे या उसमें शामिल हो।
भारत ये भी नहीं चाहेगा कि कोई ऐसा वक्‍त आए, जब भारत इस तरह की सरकार के साथ चलने का फैसला करे। भारत हमेशा ही शांति का पक्षधर रहा है। भारत अफगानिस्‍तान में विकास का पक्षधर है। इसके लिए लेकर भारत ने वहां पर कई योजनाओं की शुरुआत की है। ऐसे में यदि तालिबान वहां की सत्ता पर काबिज होता है तो भारत जैसे किसी भी देश के लिए ये सही नहीं होगा।
अमेरिकी प्रशासन ने अफगान शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाकर ये बताने का काम किया है कि वो इस क्षेत्र में स्थिरता और शांति बनाए रखना चाहता है। हालांकि, प्रोफेसर प्रभाकर का कहना है कि इसके पीछे अमेरिका का निजी हित है। वो यहां से अपनी फौज को अब पूरी तरह से हटाना चाहता है, लेकिन वो ये भी जानता है कि तालिबान की मौजूदगी से यहां पर कौन-कौन से देश प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे में भारत को इस प्रक्रिया में शामिल करने का उसका फैसला सराहनीय कदम है। ऐसे में पाकिस्‍तान की बोलती बंद होनी तय है।
पाकिस्‍तान की हर संभव कोशिश है कि अफगानिस्‍तान में तालिबान की स्‍थायी मौजूदगी हो, जबकि भारत उसको इससे दूर करना चाहता है। अमेरिका द्वारा भारत को इस शांति प्रक्रिया का हिस्‍सा बनाने के बाद पाकिस्‍तान कुछ कहने लायक नहीं रहेगा। प्रोफेसर प्रभाकर ये भी मानते हैं कि भले ही भारत पूर्व में इस प्रक्रिया से दूर था, लेकिन उसकी निगाह इस पर जरूर थी। रविवार को भी भारतीय विदेश मंत्री ने इस संबंध में अमेरिका के विशेष दूत से बात की थी।
-एजेंसियां

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